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लखनऊः कराहती राजधानी और ध्वस्त होती स्वास्थ्य सेवाएं

कहीं वैंटिलेटर के अभाव में जिंदगियां दम तोड़ रही हैं तो कहीं समय पर एम्बुलेंस न मिलने के कारण करोना मरीज अस्पताल पहुंचने से पहले ही जान गंवा रहे हैं तो कहीं मरीजों को ऑक्सीजन नहीं मिल पा रहा। अस्पतालों में बेड की भारी किल्लत का खामियाजा लोगों को भुगतना पड़ रहा है। एक तरफ अस्पतालों में बेड और वैंटिलेटर के लिए करोना मरीज तड़प रहे हैं तो दूसरी तरफ होम आइसोलेशन में दवा और एम्बुलेंस के इंतजार में कराहते लोग हैं। ये खौफ़नाक तस्वीर है उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की, जहां कोरोना संक्रमण के बेतहाशा बढ़ते मामलों के बीच स्वास्थ्य सेवाएं चरमराती नजर आ रही हैं, स्थिति इस हद तक भयावह हो चली है कि घर पर करोना से हुई मौत के बाद बार-बार बुलाने पर भी कोई शव उठाने तक नहीं आ रहा। एक तरफ करोना विकराल रूप लेता जा रहा है तो दूसरी तरफ इस भारी अव्यवस्था के बीच करोना संक्रमितों का दर्द भी बढ़ता जा रहा है।

लखनऊ, अलीगंज के रहने वाले आशीष श्रीवास्तव कहते हैं कि उनके पिता करोना से पीड़ित हो गए थे, वे उन्हें एडमिट करने के लिए पूरे दिन शहर के अस्पतालों के चक्कर काटते रहे लेकिन कहीं भी उन्हें अपने बीमार पिता के लिए एक बेड तक न मिल पाया और आखिरकार उनकी मौत हो गई। वहीं लखनऊ, गोमती नगर निवासी 67 वर्षीय पूर्व जिला जज रमेश चन्द्रा जी की कहानी भी कम भयावह नहीं। जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के नाकाम सिस्टम के चलते उनकी 65 साल की करोना पीड़ित पत्नी मधु चंद्रा की जान चली गई। पति पत्नी दोनों ही करोना पॉजिटिव थे। उनके मुताबिक 12 अप्रैल को दोनों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई। तब से उन्होंने जिलाधिकारी से लेकर सीएमओ और कोविड कंट्रोल रूम समेत अन्य अधिकारियों को इतने फोन कर डाले, जिसकी कोई गिनती नहीं लेकिन हर जगह से जल्द से जल्द व्यवस्था कराने और एंबुलेंस भेजने का झूठा आश्वासन ही मिलता रहा। अंततः 15 अप्रैल को उनकी पत्नी ने दम तोड़ दिया। हद तो तब हो गई जब शव उठाने तक के लिए कोई नहीं आया और थक हार कर जब उनके मुहल्ले वालों ने इसकी सूचना मुख्यमंत्री पोर्टल पर दी तब जाकर हरकत में आए अफसरों ने शव वाहन भेजा। सचमुच लखनऊ में करोना मरीजों की कहानियां बेहद डरावनी हो चली हैं।

शहर के लोहिया संस्थान के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती तीन कोविड मरीजों को ऑक्सीजन नहीं मिलने से तीनों की 17 अप्रैल को मौत हो गई। संस्थान के निदेशक डॉ. एके सिंह ने बताया कि सुबह कंपनी ने ऑक्सीजन की खेप समय से नहीं भेजी, जिससे मरीजों की मौत हो गई। हालांकि ऑक्सीजन सिलिंडर की आपूर्ति करने वाली कंपनी को नोटिस जारी किया गया है और जांच के भी आदेश दे दिए गए हैं।

गोमती नगर स्थित लोहिया संस्थान में गंभीर मरीजों के लिए 54 बेड में से दस बेड आइसीयू के हैं। जानकारी के मुताबिक इमरजेंसी से लेकर आइसीयू वार्ड करोना मरीजों से फुल था। कई मरीज होल्डिंग एरिया में स्ट्रेचर पर ऑक्सीजन सपोर्ट पर थे। जब सुबह 6 बजे हॉस्पिटल ब्लॉक में ऑक्सीजन सिलेंडर खत्म हो गया तो हर तरफ अफरा तफरी मच गई। तीमारदार अपने मरीजों की हालत बिगड़ती देखकर हंगामा करने लगे। इसी बीच वैंटिलेटर पर भर्ती तीन अति गंभीर मरीजों ने दम तोड़ दिया।

हालात काबू से बाहर होते जा रहे हैं। उतने मरीज बीमारी से नहीं मर रहे हैं, जितने स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी से जान गंवा रहे हैं। कहीं बेड नहीं है तो कहीं ऑक्सीजन नहीं तो कहीं कोई सुनने वाला नहीं। होम आइसोलेशन में पड़े मरीजों की स्थिति तो और दयनीय चरण में है, जहां उनको कोई यह तक पूछने वाला नहीं है कि आप तक दवा पहुंची या नहीं।

अब तो प्रदेश का स्वास्थ्य विभाग भी मान रहा है कि मरीजों को अस्पताल मुहैया नहीं हो पा रहे हैं जिसके चलते विभाग ने पांच अप्रैल से रोजाना भर्ती होने वाले मरीजों के आंकड़े भी जारी करना बंद कर दिया है। मरीजों के अंतिम संस्कार में भी काफी दिक्कतें आ रही हैं। आलम यह है कि कुछ दिन पहले पुलिसकर्मियों ने लखनऊ के हजरतगंज चौराहे पर मौजूद एक पेट्रोल पंप पर कोवि‍ड पॉजिटि‍व मरीज को आइसोलेट कर दिया। सोशल मीडिया पर किरकिरी होने के बाद जिला प्रशासन ने उसे कोविड अस्पताल में भर्ती कराया।

बहरहाल ऑक्सीजन की कमी से हो रही मौतों को देखते हुए अब लखनऊ जिला प्रशासन ने अन्य स्थानों पर ऑक्सीजन की सप्लाई पर तत्काल रोक लगाने के निर्देश दिए हैं। अब उत्पादनकर्ता केवल अस्पतालों को ही ऑक्सीजन सप्लाई करेंगे। लगातार ऑक्सीजन की कमी से अस्पताल जूझ रहे थे तो वहीं कोविड दवाओं की कालाबाजारी रोकने के लिए डीएम ने सभी दवा दुकानों के स्टॉक की जांच करने के निर्देश ड्रग इंस्पेक्टरों को दिए हैं। डीएम ने अपने सख्त आदेश में कहा है कि कहीं भी कोई दवा दुकानदार कालाबाजारी करने का दोषी पाया जाए तो तुरंत उसका लाइसेंस रद्द कर दिया जाए।

संक्रमण की चपेट में आते डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ
राजधानी लखनऊ में कोरोना के बढ़ते विस्फोट के बीच किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू), संजय गांधी चिकित्सा आयुर्विज्ञान संस्थान (एस जीपीजीआई), लोहिया, बलरामपुर अस्पताल, सिविल, लोकबंधु सहित अन्य अस्पतालों के डॉक्टर्स, रेजिडेंट तथा सहयोगी स्टॉफ लगातार बड़ी संख्या में संक्रमित होते जा रहे हैं। हालत यह है कि पीजीआई में करीब 100 तो  केजीएमयू में 250 के लगभग स्टॉफ पॉजिटिव हो चुका है। इससे स्थिति और चिंताजनक हो गई है। पीजीआई में संक्रमित होने वालों में सबसे ज्यादा 73 संख्या नर्सेज की हैं तो वहीं केजीएमयू में 125 से ज्यादा रेजिडेंट, दो इंटर्न, 20 फैकल्टी और 100 के करीब अन्य स्टॉफ है। सबसे ज्यादा मामले सर्जरी विभाग में हैं। यहां संक्रमितों की संख्या 30 के करीब है। इसके बाद मानसिक रोग विभाग के 15 लोग संक्रमित हैं। इसके अलावा लगभग हर विभाग से डॉक्टर, रेजिडेंट तथा अन्य स्टॉफ पॉजिटिव हो चुका है। (ये आंकड़ा रिपोर्ट लिखे जाने तक का है संक्रमितों की संख्या और अधिक हो सकती है)। खास बात यह है कि संक्रमित होने वाले सभी डॉक्टर्स वैक्सीन की दोनों डोज ले चुके थे।

करोना वॉरियर भी हैं हालात के शिकार
हालात इस कदर खराब है कि आमजन ही नहीं डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टॉफ भी अपनों को अस्पतालों में भर्ती कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। वे रो रहे हैं।  विनती कर रहे हैं। हाथ तक जोड़ रहे हैं, लेकिन उनकी फरियाद सुनने वाला कोई नहीं है। मरीज एंबुलेंस की राह तकते रहते हैं। इसी लापरवाही ने लोकबंधु अस्पताल के एक डॉक्टर के पिता की जान ले ली तो वहीं, एसजीपीजीआई के कर्मचारी की मासूम बच्ची की भी भर्ती नहीं हो पाने से मौत हो गई। श्यामा प्रसाद मुखर्जी अस्पताल (सिविल) के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. दीपक के मुताबिक, वे अपने 74 वर्षीय बुजुर्ग पिता के इलाज के लिए गुहार लगाते रह गए, लेकिन समय पर उनको भर्ती नहीं करा सके और वे सिस्टम से हार गए।

वे कहते हैं कि डॉक्टर होते हुए भी वे अपने पिता को नहीं बचा पाए। सीएमएस डॉ. एसके नंदा कहते हैं कि डॉ. दीपक के पिता पहले आइसोलेशन में रहे, मगर तबीयत बिगड़ी तो अस्पताल में भर्ती होने के लिए परेशान होने लगे। उन्हें समय पर बेड नहीं मिल पाया। आखिरकार, उन्हें निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन उनके पिता ने दम तोड़ दिया। वे कहते हैं आइएम सॉरी पापा… मैंने कई लोगों की जिंदगियां बचाईं, लेकिन आपको नहीं बचा सका। आइसीयू में इलाज करते-करते खुद भी संक्रमण की चपेट में आ गया। इसके बाद घर में पिता समेत परिवार के चारों सदस्य कोरोना संक्रमित हो गए।

एसजीपीजीआई में नर्स सीमा, संस्थान में कार्यरत अपनी एक सहेली की बच्ची को भर्ती कराने के लिए सीएमएस से लेकर अन्य डाक्टरों से मिन्नतें करती रहीं, लेकिन बच्ची को भर्ती नहीं किया गया। लिहाजा, घर वाले बच्ची को लेकर निजी अस्पताल भागे, लेकिन उसने दम तोड़ दिया। बच्ची की मौत से बेहद आहत सीमा का गुस्सा कुछ इस रूप में सामने आया… “आप सभी को बता दें, जिस बच्ची को लेकर मैं शाम से परेशान थी, वो भी चली गई। संस्थान की लापरवाही की हद हो गई। ऐसे तो हमारे अपने मरते रहेंगे। मेरे पास इमरजेंसी से फोन आया कि कर्मचारी सरिता की आठ माह की बच्ची गंभीर है। उसे कोई भर्ती नहीं कर रहा है। इसलिए वह उसे निजी अस्पताल ले जा रही हैं। मैंने सीएमएस मैडम से बात की, लेकिन वही ढाक के तीन पात। उन्होंने भी पल्ला झाड़ लिया। मैं उनसे बात कर ही रही थी, तभी मेरे पास बच्ची की मौत की सूचना आई। मैं उस बच्ची के लिए कुछ नहीं कर पाई। मैं सविता से हाथ जोड़कर माफी मांगती हूं। मुझे क्षमा कर दो। डॉयलिसिस कर्मचारी की बच्ची को इलाज नहीं मिल सका। अब डॉयलिसिस स्टाफ में सभी को काम बंद कर देना चाहिए। मैं किसी को नहीं छोडूंगी।”

अंतिम संस्कार में आती दिक्कतें… लचर व्यवस्था के चलते घरों में दम तोड़ते मरीज
मरीजों की मौतों का सिलसिला बढ़ने के बाद से शवों के अंतिम संस्कार में भी दिक्कतें आ रही हैं। शवों की संख्या बढ़ने से दिन भर दूर-दूर से आए लोगों को दाह संस्कार के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। आए दिन लखनऊ के भैसाकुंड स्थ‍ित विद्युत शवदाह गृह में लंबी लाइनें लगी हैं। यहां रोजाना रात में दो-दो बजे तक अंतिम संस्कार हो रहा है। हालात इस क़दर खराब हैं कि बीते दोनों जब एक परिवार को भैंसा कुंड श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार करने की जगह नहीं मिल पाई तो उसने लोगों के बैठने के लिए बनाए चबूतरे पर ही शव जला दिया। संक्रमित शवों की अधिक संख्या को देखते हुए लकड़ी से भी अब अंतिम संस्कार किया जा रहा है।

इसके लिए कान्हा उपवन की गोशाला के कंडे भी लखनऊ नगर निगम उपलब्ध करा रहा है। नगर निगम के मुख्य अभियंता विद्युत यांत्रिक राम नगीना त्रिपाठी ने बताया कि विद्युत शवदाह गृह के अंतिम संस्कार पर एक से डेढ़ घंटे लगता है। इसमें 45 मिनट मशीन में लगते हैं और उतना ही वक्त सैनिटाइेजशन और तैयारी में। इस समय बैकुंठधाम पर दो और गुलाला घाट पर एक विद्युत शवदाह गृह है इसके अलावा संक्रमित शवों को जलाने के लिए आठ-आठ अतिरिक्त लकड़ी वाले स्थल भी शुरू किए गए हैं।

भैंसाकुंड श्मशान घाट के महापात्र राजेंद्र मिश्र कहते हैं कि अभी तक सामान्य दिनों में 15 से बीस शव ही आते थे। पिछले साल कोरोना काल में तो यह संख्या भी घट गई थी और अधिकांश शव कोविड के विद्युत शवदाह गृह पर ही आते थे, लेकिन इस बार मामला काफी बिगड़ा है। प्रत्येक दिन ज्यादा संख्या में सामान्य शवों के पहुंचने से महापात्र भी हैरान हैं। वह कहते हैं कि आख़िर यह कैसे हो रहा है?

सचमुच यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है कि कोविड के साथ-साथ नॉन कॉविड मरीजों का शव आखिर इतनी बड़ी संख्या में कैसे आ रहे हैं, कुल मिलाकर महापात्र का यह सवाल ही इस हकीकत पर भी मुहर लगा रहा है कि कोरोना संक्रमण की जांच न होने और इलाज मिलने के अभाव में भी लोग घरों में दम तोड़ रहे हैं। घर वाले भी नॉन कोविड शव बताकर उनका दाह संस्कार सामान्य श्मशान घाट पर कर रहे हैं। महापात्र कहते हैं कि अधिकांश पर्चे पर लिखकर आ रहा है कि हार्ट अटैक से या सामान्य मौत बता रहे हैं पिछले सात दिनों में चालीस से लेकर 55 तक नॉन कोविड शव आ रहे हैं।

गुलालाघाट पर भी सामान्य दिनों में सात से आठ शव ही पहु़ंचते थे, लेकिन करोना के इस कहर के बीच नॉन कोविड शवों की संख्या में कई गुना वृद्धि हुई है। वहां के महापात्र विनोद पांडेय का कहना है कि पहली बार इतने शव आ रहे हैं। वैसे गुल्लालाघाट पर सामान्य दिनों में सात से आठ शव ही आते थे और कभी-कभी यह संख्या दस के करीब हो जाती थी लेकिन हर दिन चालीस से पैंतालीस शव आ रहे हैं और एक दिन तो यह आंकड़ा 61 तक पहुंच गया था। सरकारी तंत्र के लचर इंतजाम से लोग घरों में ही दम तोड़ रहे हैं। ऐसे लोगों की कोरोना जांच न होने से उनकी मौत का कारण भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। जांच रिपोर्ट कई दिन बाद आने से पहले ही लोगों का दम निकल रहा है। ऐसे में कोविड से मौत का प्रमाण न होने से उसे नगर निगम भी कोविड संक्रमित शव नहीं मान रहा है और कोविड शवों के अंत्येष्टि स्थल पर जाने से रोका जा रहा है।

राजधानी में करोना कहर बनकर टूट रहा है। अस्पतालों के बाहर करोना मरीज बेड मिलने के इंतज़ार में दिन गुजार रहे हैं तो श्मशान घाटों से उठता काला धुआं शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। हर तरफ अफरा तफरी का माहौल है और इन सब के बीच आती कोविड की दवाओं की कालाबाजारी की ख़बरें बेहद परेशान करने वाली हैं। हम जानते हैं कि चुनौती बहुत बड़ी है पर लड़ाई यह हम सबकी साझा है।

(सरोजिनी बिष्ट स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल लखनऊ में रहती हैं।)

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This post was last modified on April 20, 2021 9:48 am

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