पिंजरे का तोता सीबीआई को स्वायत्त बनाये केंद्र सरकार: मद्रास हाईकोर्ट

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आठ साल से उच्चतम न्यायालय के स्टे पर चल रहे सीबीआई पर मद्रास हाईकोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि पिंजरे का तोता सीबीआई को रिहा करो, सीबीआई केवल संसद को रिपोर्ट करने वाला स्वायत्त निकाय होना चाहिए। हाईकोर्ट का कहना है कि सीबीआई को सीएजी की तरह होना चाहिए जो केवल संसद के प्रति जवाबदेह है। मौजूदा व्यवस्था में बदलाव करने की बात करते हुए हाईकोर्ट ने 12 सूत्री निर्देश दिए हैं।

दरअसल, विपक्ष भी आरोप लगाता रहा है कि सीबीआई बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के हाथों का पोलिटिकल टूल बन गया है। पिछले कुछ सालों ने सीबीआई ने विपक्ष के काफी नेताओं के खिलाफ केस दर्ज कर जांच आगे बढ़ाई है, जिसे लेकर भी उस पर मोदी सरकार के नियंत्रण का आरोप लगता रहता है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तो स्पष्ट रूप कहती रही हैं कि ये पीएम द्वारा कंट्रोल की जाने वाली साजिश ब्यूरो ऑफ इंवेस्टिगेशन है।

मौजूदा व्यवस्था में बदलाव करने की बात करते हुए 12 प्वाइंट्स के निर्देश में हाईकोर्ट ने कहा है कि यह आदेश ‘पिंजरे में बंद तोते (सीबीआई)’ को रिहा करने का प्रयास है।  वर्ष 2013 में कोलफील्ड आवंटन मामलों की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई पर टिप्पणी की थी और उसे “पिंजरे के तोते” के रूप में वर्णित किया था। उस समय विपक्ष में रहने वाली भाजपा ने एजेंसी पर कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा नियंत्रित होने का आरोप लगाया था।

हाईकोर्ट ने कहा की एजेंसी की स्वायत्तता तभी सुनिश्चित होगी, जब उसे वैधानिक दर्जा दिया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि भारत सरकार को सीबीआई को अधिक अधिकार और शक्तियां देने के लिए एक अलग अधिनियम बनाने के लिए विचार करके निर्णय का निर्देश दिया जाता है, ताकि सीबीआई केंद्र के प्रशासनिक नियंत्रण के बिना कार्यात्मक स्वायत्तता के साथ अपना काम कर सके।

हाईकोर्ट का कहना है कि एजेंसी की स्वायत्तता तभी सुनिश्चित होगी जब उसे वैधानिक दर्जा दिया जाएगा। मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाता है कि सीबीआई को ज्यादा ताकत और अधिकार क्षेत्र के साथ वैधानिक दर्जा देने के लिए अलग कानून बनाने पर विचार और उस पर फैसला करे। हाईकोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार को सीबीआई को कार्यात्मक स्वायत्तता के साथ स्वतंत्र बना देना चाहिए और सरकार का उस पर प्रशासनिक नियंत्रण नहीं होना चाहिए।

हाईकोर्ट ने ये टिप्पणी तमिलनाडु में एक कथित पॉन्जी स्कैम की सीबीआई जांच की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सीबीआई डायरेक्टर के पास सरकार के सचिव जैसी पावर होनी चाहिए और वो सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करें।

गौरतलब है की वर्ष 2013 में गुवा‌हाटी हाईकोर्ट ने सीबीआई के गठन को ही असंवै‌धानिक ठहराते हुए उसे समाप्त करने का आदेश ‌दिया था। 6 नवंबर, 2013 को दिए फैसले में हाईकोर्ट ने सरकार के उस प्रस्ताव को समाप्त करते हुए, जिसके जरिए सीबीआई का गठन हुआ था, जांच एजेंसी के अस्तित्व को ही समाप्त कर दिया था।

गुवा‌हाटी हाई कोर्ट के फैसले के व्यापक प्रभावों की संभावना ने केंद्रीय संस्‍थानों में खलबली पैदा कर दिया था क्योंकि इस फैसले के बाद सीबीआई द्वारा हजारों मामलों में ‌किए गए अन्वेषण और अभियोग निष्‍प्रभावी हो जाते। उस वक्‍त तत्‍कालीन एटॉर्नी जनरल गुलाम ई वाहनवती तब के चीफ जस्‍टिस ऑफ इं‌डिया पी सदा‌‌श‌िवम से मिलने उनके आवास पहुंच गए थे, क्योंकि उच्चतम न्यायालय  में उस दिन छुट्टी थी। चीफ जस्‍टिस अपने आवास पर ही शीघ्र सुनवाई के लिए तैयार हो गए और गुवा‌हाटी हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।

गुवा‌हाटी हाईकोर्ट का ये फैसला नवेंद्र कुमार की याचिका पर आया था, जिन पर सीबीआई द्वारा दाखिल एक फाइनल रिपोर्ट के आधार पर मुकदमा चलाया जा रहा था। अपनी याचिका में नवेंद्र कुमार ने सीबीआई गठन को ही चुनौती देते हुए कहा था कि सीबीआई विधि द्वारा गठित संस्‍थान नहीं है, बल्‍कि कार्यकारी आदेश द्वारा गठित निकाय है। इसलिए इसके पास गिरफ्तारी, खोजबीन, जब्ती, आपराधिक जांच और मुकदमे अधिकार हो ही नहीं सकते।

दरअसल केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कथित रूप से दिल्‍ली पुलिस इस्टैब्लिश्मेन्ट एक्ट 1946 द्वारा प्रदत्त शक्तियों के आधार पर एक विशेष प्रस्ताव के जरिए सीबीआई का गठन 1 अप्रैल 1963 को किया था।

 (वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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