Thursday, January 20, 2022

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यूपी की राजनीति के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित होगी मुजफ्फरनगर में किसानों की महापंचायत

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राकेश टिकैत के बेबस आँसुओं से मर्माहत होकर एक विशाल जन-सैलाब इसी साल 29 जनवरी को मुज़फ़्फ़रनगर के गवर्नमेंट इंटर कॉलेज के मैदान में ख़ुद-ब-ख़ुद उमड़ पड़ा था। कुछ महीनों बाद कल पूरी तैयारी के साथ इसी मैदान में होने जा रही किसान महापंचायत में जन-सैलाब का कोई ओर-छोर शायद ही पकड़ में आए। मुज़फ़्फ़रनगर कई बड़े राष्ट्रव्यापी बदलावों की शुरुआत का गवाह रहा है। सवाल यही है कि संख्य़ा की दृष्टि से अभूतपूर्व होने जा रहा यह जन-जुटान राजनीतिक बदलाव के लिहाज़ से कितना कारगर साबित होगा।  

मुज़फ़्फ़रनगर की महापंचायत कई वजहों से क़ाबिल-ए-ज़िक्र है। महेंद्र सिंह टिकैत के ज़माने में जो भारतीय किसान यूनियन एक बड़ी ताक़त मानी जाती थी, वह कालांतर में अपना रुतबा खोकर छोटी-मोटी बार्गेनिंग और सत्ता के साथ के रास्ते तलाशते रहनी जैसी तोहमतों से घिरती रही थी। थोड़ा पीछे देखें तो सितंबर 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर-शामली में भयानक साम्प्रदायिक हिंसा से पहले जिस पटकथा पर काम चल रहा था, उसमें राकेश और नरेश टिकैत बंधु थोड़ा-बहुत इधर-उधर हाथ-पाँव मारकर अप्रासंगिक से हो गए थे और अंतत: भाकियू के हिन्दू-मुस्लिम एकता वाले जैसे-तैसे भरम को भी बरक़रार नहीं रख सके थे। आठ साल बाद 2021 के नवंबर में तीन नये कृषि क़ानूनों को लेकर पंजाब और हरियाणा की किसान यूनियनों के दिल्ली कूच के बाद पैदा हुई परिस्थितियों के दबाव में राकेश टिकैत यूपी-दिल्ली बॉर्डर पर पहुँचे तो उनकी विश्वसनीयता पर शक किया जा रहा था।

लेकिन 28 जनवरी की रात में जब अचानक पुलिस की घेराबंदी के बीच राकेश टिकैत सरेंडर की मुद्रा में थे तो सरकार समर्थक चैनलों और भाजपा समर्थकों के उत्पात से बेबस होकर उनकी आँखों से आँसू बह निकले थे और रुंधे गले से निकली उनकी बातों ने किसानों ख़ासकर हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों के दिलों में तूफ़ान खड़ा कर दिया था। हरियाणा जो उनके असर की ज़मीन भी नहीं थी, के गाँवों से रातोंरात किसानों के रेले के रेले उनके समर्थन में गाजीपुर ब़ॉर्डर पहुँच गए थे। 29 जनवरी को उनके जिले मुज़फ्फरनगर में मुख्यालय पर स्थित गवर्नमेंट इंटर कॉलेज में एक बड़ा जन-सैलाब जो यहाँ अब तक का सबसे बड़ा स्वत: स्फूर्त जमावड़ा था, उमड़ पड़ा था। यह किसान आंदोलन के लिए भी और राकेश टिकैत के लिए भी एक टर्निंग पॉइंट था। अब हरियाणा के किसानों की पहली पसंद राकेश थे और आंदोलन में वे प्रमुखतम चेहरे बन चुके थे। आज भी भले ही बहुत से लोग कहें कि आंदोलन में उनकी स्थिति `बाय चॉइस` न होकर परिस्थितिजनक है, पर सच यह है कि वे अपने जिले में शान के साथ एक असरदार उपस्थिति के रूप में लौटे हैं। 

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव से पहले हो रही यह किसान महापंचायत इस आंदोलन के भविष्य और देश-प्रदेश के सियासी मंज़र के लिहाज़ से बेहद अहम है। आंदोलन में हस्तक्षेपकारी दिल्ली के आसपास के प्रदेशों से बहुत दूर बंगाल के नतीजों पर किसान नेताओं का असर कितना था, यह बात अब पुरानी हो चुकी है। अब सवाल य़ही है कि उत्तर प्रदेश जो भाजपा के उभार और पुनर्जीवन दोनों के लिए उर्वर साबित होता रहा है, वहाँ किसान आंदोलन क्या बदलाव लाने में कामयाब होगा? यूँ भी आंदोलन के बाहर और भीतर दोनों जगहों से बार-बार यह सवाल उठाया जा रहा था कि राकेश टिकैत गाजीपुर बॉर्डर पर भले ही जितने बड़े सूरमा हों पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपने जिले तक में उनका असर ज़्यादा मायने नहीं रखता है। माना जा सकता है कि इसी जिले में कल की महापंचायत उनके आलोचकों के लिए एक जवाब होने जा रही है। अपराजेय माने जाने लगी भाजपा जैसी ताक़त के सामने जब राजनीतिक दल आंदोलन खड़े करने का साहस खो चुके हों तब किसान आंदोलन प्रतिरोध की अकेली मिसाल और मशाल की तरह मक़बूल हुआ। माना जा रहा है कि एक नये इलाक़े में होने जा रही महापंचायत की क़ामयाबी संयुक्त किसान मोर्चे और उसके विभिन्न राज्यों के समर्थकों के मनोबल को भी मज़बूत करेगी।  

गौरतलब है कि मुज़फ़्फ़रनगर कई बड़े बदलावों की शुरुआत में शामिल रहा है। कांग्रेस में अपने नेता राजीव गाँधी के ख़िलाफ़ बोफोर्स और स्विस बैंक खातों जैसे मसलों पर तूफ़ान खड़ा कर देने वाले और अंतत: कांग्रेस को रसातल की तरफ़ खिसका देने वाले वीपी सिंह ने पहली बगावती रैली गवर्नमेंट इंटर कॉलेज, मुज़फ़्फ़रनगर के मैदान में ही की थी। माना जाता है कि 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर में ही बड़े पैमाने पर हुई साम्प्रदायिक हिंसा के असर ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद पर पहुँचा दिया था। अब भाकियू समर्थक दावा कर रहे हैं कि 2013 की साम्प्रदायिक हिंसा ने किसान राजनीति में जाटों और मुसलमानों के बीच जो खाई पैदा कर दी थी, उसे किसान आंदोलन ने पाट दिया है। दावा किया जा रहा है कि जो मुज़फ़्फ़रनगर भाजपा की ताज़पोशी की वजह बना था, अब वही विदाई का भी कारण बनेगा। लेकिन इन दावों और हकीकत के बीच एक बेहद कड़ा इम्तहान है। 

यह सही है कि दिल्ली और आसपास के कई राज्यों में कम से कम जाटों के बीच भाजपा के प्रति 2013 जैसी स्थिति नहीं है। मुज़फ़्फ़रनगर के जाट बाहुल्य वाले गाँवों तक में किसान आंदोलन के असर ने आज एक बड़ा फ़र्क़ पैदा किया है। भाजपा गैर जाट वोटों के अपने पक्ष में ध्रुवीकरण का हवाला देकर भले ही निश्चिंतता प्रदर्शित करे पर हकीकत में ऐसा भी नहीं है। किसानों की हालत बद से बदतर हुई है। जिस इलाक़े में रैली होने जा रही है, वहाँ की मुख्य फ़सल गन्ने के भाव और भुगतान को लेकर ही हालत निराशाजनक है।

खेती-किसानी के मुद्दों को लेकर ज़्यादा जागरूक और संवेदनशील माने जाने वाले जाटों के बीच नए कृषि क़ानूनों को लेकर भी दूसरी किसान जातियों के मुक़ाबले बहस-मुबाहिसे ज़्य़ादा हैं जो विपक्ष कोशिश करे तो संक्रामक भी हो सकते हैं। सवाल यही है कि किसान आंदोलन से पैदा माहौल का लाभ उठाने में विपक्षी पार्टियां कितनी सक्षम हैं या किसान मोर्चा के पास ही क्या ऐसी क़ुव्वत है कि वह विमर्श को गैर जाट किसान जातियों के बीच ले जा सके। खेती-किसानी पर संकट के बावजूद सवर्ण किसानों में तो भाजपा का असर है ही, ओबीसी में आने वाले हिन्दू किसान, मज़दूर, कारीगर तबके भाजपा की ज़्यादा बड़ी ताक़त माने जाते हैं। यह भी मानना भूल होगा कि जाटों के बीच भाजपा का आधार ख़त्म हो गया है। 

चुनाव की बात करें तो विपक्ष की संभावनाएं विपक्षी पार्टियों के गठबंधन पर भी बहुत ज़्यादा निर्भर करेंगी। लोकसभा चुनाव के बाद से बसपा ने प्रो-बीजेपी रास्ता अख़्तिय़ार कर रखा है। किसान आंदोलन से उम्मीद पर निर्भर विपक्षी पार्टियां ख़ुद निष्क्रिय़ ही बनी हुई हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो यह भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि क्या महापंचायत की मेगा सक्सेस टिकैत बंधुओं की राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को तो हवा नहीं दे देगी। जाटों के बीच भाकियू और खाप नेताओं की मास अपील तो रहती आई है पर उनके सीधे राजनीतिक होने को स्वीकार नहीं किए जाने का चलन रहा है। सवाल यही है कि क्या टिकैत सीधे राजनीति में उतरने का लोभ संवरण कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी को अपनी पारी खेलने देंगे जो इस आंदोलन की बदौलत सपा से गठबंधन में ज़्यादा से ज्यादा सीटों की उम्मीदें कर रहे हैं।

और सबसे बड़ी चुनौती तो यही है कि किसान आंदोलन और विपक्षी पार्टियों के पास आक्रामक साम्प्रदायिक अभियानों की क्या काट होगी। 

(धीरेश सैनी जनचौक के रोविंग एडिटर हैं।)

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