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मी लॉर्ड, इससे अच्छा आप राष्ट्रपति के दरबान बन जाते

पूर्व चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई के राज्यसभा सदस्य मनोनयन की ख़बर सुनकर कल से ही मन बेहद बेचैन है। हिक़ारत, घृणा और वितृष्णा समेत तरह-तरह के भाव ज़ेहन में उमड़-घुमड़ रहे हैं। किसी की जान तक लेने का अधिकार रखने वाले शख़्स का इतनी छोटी सौदेबाज़ी का शिकार होना बताता है कि हम पतन के किस गटर में पहुँच गए हैं। कभी संविधान की रक्षा की ज़िम्मेदारी उठाने वाला शख़्स एक अदने से सांसदी के लिए अपना ईमान और ज़मीर बेच देगा यह किसी के लिए सोच पाना भी मुश्किल है। इससे अच्छा तो मी लॉर्ड, आप राष्ट्रपति के दरबान बन जाते। वह एक संवैधानिक पद के साथ जुड़ा काम था। हम लोगों ने शायद बेवजह इन संस्थाओं से इतनी बड़ी-बड़ी उम्मीदें पाल रखी हैं। दरअसल ये सभी सड़-गल गयी हैं। लिहाज़ा वहां से पैदा भी इसी तरह के रीढ़ विहीन नाशुकरे होंगे।

अनायास नहीं है कि जब पूरे देश में लोकतंत्र की अर्थी उठ रही है और संविधान को सरकारें पैरों तले रौंद रही हैं। तब उसका संरक्षक न केवल मौन है बल्कि इन सब करतूतों का खुला भागीदार बन गया है। और अगर उसमें जस्टिस मुरलीधर और इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस गोविंद माथुर सरीखे कुछ जज पहल भी कर रहे हैं तो उनके साथ सर्वोच्च अदालत किस तरह का व्यवहार कर रही है वह जगज़ाहिर है।

संस्थाओं के पतन का आलम यह है कि दिल्ली नरसंहार पुलिस के संरक्षण में संचालित किया गया। यह बात अब किसी से छुपी नहीं है। तीन दिलों तक दिल्ली जलती रही। रोकने की जगह ख़ाकी वर्दी धारी दंगाइयों के साथ खड़े रहे। और दिलचस्प बात यह है कि 78 हज़ार की संख्या वाले पुलिस बल में कोई एक भी संजीव भट्ट नहीं दिखा जो अपने संवैधानिक कर्तव्यों को निभाने के लिए आगे आया हो।

दरअसल अंग्रेजों के समय भी इसी तरह की नौकरशाही थी। कम से कम उनके पास अंग्रेजों का साथ देने का अपराधबोध तो था। लेकिन मौजूदा नौकरशाही ने तो मानो सब कुछ उतार कर फेंक दिया हो। अगर अंदरूनी सूत्रों की मानें तो दिल्ली हिंसा में ज़्यादातर मौतें पुलिस की गोलियों से हुई हैं। और बचाने की जगह उसके द्वारा मुसलमानों को दंगाइयों के हवाले करने की ख़बरें ज्यादा हैं। यहाँ पुलिस अपनी भूमिका में अपवाद स्वरूप ही दिखी है। कहीं अगर वह दिखी तो उसे उपलब्धि मानी जा रही है।

विडंबना यह है कि संघी हिंदुत्व के आदर्श दौर की अगर यह तस्वीर है तो उसके पतित दौर में क्या होगा उसका किसी के लिए अंदाज़ा लगा पाना भी मुश्किल है। तब शायद ही कोई पीड़ित अदालतों की चौखट पर दस्तक देना चाहेगा। न्याय की चिड़िया डायनासोर का रूप लेकर शायद फुर्र हो चुकी होगी। दरअसल पीएम मोदी और संघ का यही मक़सद भी है। इन संस्थाओं की भूमिका को ख़त्म कर उन्हें पंगु बनाना उनके प्राथमिक लक्ष्यों में शुमार है। देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था के पूर्व सर्वोच्च मुखिया को अपने सामने एक अदना कुर्सी पर बैठाकर दरअसल वह इन संस्थाओं में बैठे लोगों को ही संदेश देना चाहते हैं। और उन्हें बताना चाहते हैं कि तुम्हारी यही हैसियत है।

ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि अपनी निगाहों में शर्मिंदा कोई शख्स या फिर संस्था उसके सामने कभी खड़े होने की हिम्मत भी नहीं कर सकेगी। और एक प्रक्रिया में शर्म और हया के सागर में डूबकर ख़ुद ही मर जाएगी। वैसे भी संविधान को ख़त्म करने के लिए बारी-बारी से उसके अंगों को ख़त्म करना उसकी बुनियादी शर्त है। मोदी सरकार संघ की इसी ज़रूरत को पूरा कर रही है। क्योंकि इन संस्थाओं के खात्मे के रास्ते से ही लोकतंत्र का ख़ात्मा होगा और फिर उसके बाद ही ब्राह्मणवादी सनातनी व्यवस्था की शुरुआत हो सकेगी। जो संघ का लक्ष्य है।

रही बात चीजों को दुरुस्त करने की तो अब इन पुरानी संस्थाओं और उनमें बैठे लोगों से आशा की बजाय देश और समाज  के हर क्षेत्र में अपनी नई पौध विकसित करनी पड़ेगी। यह वह जमात होगी जिसको किसी बलिदान से भी परहेज़ नहीं होगा। यह अपने क़िस्म की दूसरी आज़ादी की लड़ाई है। जिसमें किसी बाहरी अंग्रेज की जगह दुश्मन अपने ही देश के भीतर के लोग हैं। एक तरह से कहा जाए तो इन संस्थाओं के जीवन का आक्सीजन ख़त्म हो गया है।

यहां भ्रष्टाचार, लालच और हर तरह के गलत कामों की कार्बन डाईऑक्साइड की भंडार है। लिहाज़ा इन्हें फिर से रिचार्ज करना होगा। और यह काम इतना आसान नहीं है। क्योंकि राजनीतिक तंत्र और इन संस्थाओं के बीच नाभि नाल की एकता है जिसको समाज के एक बड़े हिस्से का समर्थन हासिल है। लिहाज़ा इस नापाक गठजोड़ के ख़िलाफ़ लड़ते हुए देश और समाज को इन काली ताक़तों से मुक्त कराना देश के हर नागरिक का प्राथमिक कर्तव्य बन जाता है। यह लोकतंत्र का एक नया चरण होगा।

एक सामान्य नियम है कि किसी भी पद पर बैठा कोई व्यक्ति उस पद की गरिमा को तभी सुरक्षित रख सकता है जब उसमें बलिदान की भावना का भी वही स्तर हो। लेकिन आज की सच्चाई यह है कि एक तिनके भर का भी अपना नुक़सान सहने के  लिए कोई तैयार नहीं हैं। रंजन गोगोई की राज्यसभा सीट की स्वीकारोक्ति इसी का नतीजा है। लेकिन यह देश न तो रंजन गोगोई तक सीमित है और न ही मोदी इसके आख़िरी भाग्य विधाता हैं। बहरहाल सत्ता द्वारा रचित व्यवस्था का यह कलंक देश के माथे पर हमेशा-हमेशा के लिए चस्पा हो गया है।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

This post was last modified on March 17, 2020 12:11 pm

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