Tuesday, April 16, 2024

आकार लेते अकाली-भाजपा गठबंधन के मायने

घटनाक्रम पुख़्ता संकेत दे रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल में गठबंधन एकबारगी फ़िर आकार ले रहा है। महज़ औपचारिक घोषणा बाकी है। चंडीगढ़ से लेकर दिल्ली तक दोनों दलों के बीच बैठकों के कई दौर हो चुके हैं। बस अंतिम नतीज़ा आना बाक़ी है। गठबंधन साकार करने के लिए भाजपा की ओर से केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, पार्टी के पंजाब मामलों के प्रभारी विजय रुपानी, कैप्टन अमरिंदर सिंह और प्रदेशाध्यक्ष सुनील जाखड़ तथा शिरोमणि अकाली दल की ओर से सुखबीर सिंह बादल व नरेंद्र कुमार गुजराल ने कमान संभाली हुई है।

24 साल पुराना अकाली-भाजपा गठबंधन किसान आंदोलन के चलते 2020 में टूट गया था। हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। 2022 के विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियों को पंजाब में करारी हार मिली थी। 2024 के लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र गठबंधन के लिए तक़रीबन एक साल से दोबारा कवायद हो रही थी; जो अब सिरे चढ़ने को है।

दरअसल, गठबंधन में फ़ौरी गतिरोध ‘किसान आंदोलन-2’ के चलते भी आया। दोनों दलों के बीच वार्ताओं का सिलसिला जारी था कि पंजाब के किसान संगठनों ने 13 फ़रवरी से आंदोलन की घोषणा कर दी। यह आंदोलन समूचे तौर पर केंद्र और भाजपा सरकार के ख़िलाफ़ है। सो ऐसे आलम में शिरोमणि अकाली दल, भाजपा के साथ गठबंधन करके किसानों को नाराज़ नहीं करना चाहता था।

तीन मार्च को किसान संगठनों ने अपने आगामी कार्यक्रम घोषित कर दिए तो शिरोमणि अकाली दल फिर से एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) का हिस्सा बनने की दिशा में सक्रिय हो गया। इस दौरान वह किसानों को विश्वास दिलाता रहा है कि शिअद अपने तौर पर, उनकी मांगें पूरी करवाने के लिए केंद्र की भाजपा सरकार पर हरसंभव दबाव बनाएगा।

आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस ने आक्रमक तेवरों के साथ आंदोलनरत किसानों की खुली हिमायत की है लेकिन शिरोमणि अकाली दल केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ कमोबेश ‘उदार नीति’ पर चला। जबकि वह ख़ुद को किसान हितों का राजनीतिक प्रवक्ता और अभिभावक प्रचारित करता आया है। दीगर है कि सूबे के किसान अब उस मानिंद रिवायती अकाली दल के साथ नहीं हैं, जैसे पहले थे। उनका भरोसा पिछले किसान आंदोलन के वक्त टूटा था जब गठबंधन तोड़ने में शिरोमणि अकाली दल ने लंबा अरसा लगा दिया। इसका खामियाजा अकाली दल को बीते विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ा। कभी हार का मुंह नहीं देखने वाले दिवंगत दिग्गज अकाली नेता रहनुमा प्रकाश सिंह बादल तक चुनाव हार गए। सुखबीर सिंह बादल को भी तगड़ी शिकस्त मिली। तब का टूटा शिरोमणि अकाली दल का मनोबल अभी भी पूरी तरह बहाल नहीं हो पाया है।

विधानसभा चुनाव में अकलियों के ऐसे हश्र की एक वजह भाजपा के साथ गठबंधन टूटना भी था। भाजपा को भी बराबर का नुकसान हुआ। दोनों पार्टियों ने अपने-अपने तौर पर मंथन किया कि पंजाब में वजूद बचाने के लिए गठबंधन अपरिहार्य है। बेशकिमती दोनों पार्टियों के नेता अब तक लगातार कहते रहे कि गठजोड़ नहीं होगा लेकिन भीतर ही भीतर कोशिशें जारी रहीं। गठबंधन की संभावनाओं ने तब जोर पकड़ा जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, कैप्टन अमरिंदर सिंह और सुनील कुमार जाखड़ ने कहा कि भाजपा का शिरोमणि अकाली दल से फिर गठबंधन हो सकता है। कैप्टन और जाखड़ ने तो अकाली दल को पंजाब के लिए ‘जरूरी पार्टी’ तक बताया।

किसान आंदोलन के अतिरिक्त भी कुछ वजहें रहीं कि बावक्त अकाली-भाजपा भाजपा गठबंधन नहीं हो पाया। अकाली चाहते थे कि केंद्र सरकार उनकी मध्यस्थता के साथ किसानों की कुछ मांगें तत्काल मंज़ूर करे। समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दे। सिख बंदियों की रिहाई भी गठबंधन के लिए शिरोमणि अकाली दल की एक बड़ी शर्त रही है।

पंजाब में लोकसभा की 13 सीटें हैं। शिरोमणि अकाली दल 9 सीटें चाहता है। भाजपा 8 देने पर राज़ी है। इससे पहले गठबंधन के तहत शिअद 10 पर तो भाजपा तीन पर लड़ती आई है। विधानसभा की 117 में से शिरोमणि अकाली दल 95 तो भाजपा 22 सीटों पर चुनाव लड़ती रही। भाजपा की बदौलत अकालियों को हिंदू समुदाय के वोट मिलते रहे तो भाजपा प्रत्याशियों को शिरोमणि अकाली दल की वजह से सिख वोट।

2020 में दो दशक से ज्यादा की लंबी दोस्ती टूटी तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा ने अपने तईं पंजाब में जड़ें मजबूत करने की कोशिशें शुरू कीं। (संघ परिवार की ऐसी कोशिशें बहुत पुरानी हैं और शिरोमणि अकाली दल बाकायदा इसका विरोध भी करता आया है। गठबंधन का हिस्सा होते हुए और बाहर आकर भी)। आरएसएस और भाजपा ने सिख तबके के बीच पैठ बनाने के एजेंडे पर बड़े पैमाने पर काम किया लेकिन अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली।

ग्रामीण पंजाब और किसानों ने संघ परिवार का खुला बहिष्कार किया। ज़मीनी हकीकत से वाक़िफ होने के बाद फिर से शिरोमणि अकाली दल को साथ लेने की नीति पर दिल्ली से कानपुर तक मंथन हुआ। शिरोमणि अकाली दल बेशक पंजाब और हरियाणा तक सीमित है लेकिन उसे अल्पसंख्यक सिख समुदाय का सबसे बड़ा राजनीतिक दल माना जाता है। उससे गठबंधन करके भाजपा देश भर में फैले सिखों के बीच भी एक संदेश देना चाहती है। भाजपा अपने मूल में कितनी सिख (अल्पसंख्यक) हितैषी है?, इस पर अलग से चर्चा की दरकार है।

संभावना है कि अकाली-भाजपा गठबंधन की घोषणा आज-कल में हो जाएगी। ऐसा होने पर दोनों पार्टियों को पंजाब में पहले सरीखा फायदा मिलेगा, इसमें गहरा संदेह है। किसानों के बग़ैर शिरोमणि अकाली दल का अस्तित्व अधूरा है। गठबंधन के बाद अगर केंद्र सरकार ने किसानों के प्रति नरमी और हमदर्दी नहीं दिखाई तो इसका सीधा नुकसान पंजाब में शिरोमणि अकाली दल को होना तय है। किसानों से शिअद को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक ऑक्सीजन मिलती है। यानी किसानों की बदौलत यह पार्टी जिंदा है। गठबंधन के बाद उसे साबित करना होगा कि वह केंद्रीय सत्ता के गलियारों में बखूबी किसानों की वकालत कर सकती है।

यह सच भी अपनी जगह है कि एक क्षेत्रीय पार्टी अपने मूल वोटरों के हितों से समझौता करके ज़्यादा दिन तक नहीं चल सकती। संघीय ढांचे को लेकर भाजपा के रुख़ में पिछले पांच सालों में नागवार तब्दीली आई है। यह अकाली दल को स्वाभाविक तौर पर असहज कर सकती है। तो विधिवत गठबंधन करके शिरोमणि अकाली दल को भाजपा के साथ-साथ कई मुश्किलों को भी गले लगाना पड़ेगा!

(पंजाब से अमरीक की रिपोर्ट।)

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