Monday, October 18, 2021

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प्रशांत मामले में जस्टिस कृष्ण अय्यर का हवाला मानो किसी सत्याग्रही को सजा देने के लिए गांधी को उद्धृत करना है

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प्रशांत भूषण ने एक ट्वीट में सर्वोच्च न्यायालय के हालिया चार चीफ़ जस्टिस नामित किए थे कि उनके कार्यकाल में लोकतंत्र का हनन हुआ है। विडम्बना ही कहेंगे कि सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों की पीठ ने भूषण को अवमानना का दोषी ठहराने की अपनी शक्तियों के समर्थन में जिस पूर्व जज के कथन को उद्धृत करने के लिए चुना, वे लोकतांत्रिक मूल्यों के पुरोधा माने गए जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर हैं। 

हमारी न्याय व्यवस्था को लंबे समय से सामने वाले की शक्ल और हैसियत देखकर निर्णय करने की आदत पड़ती गयी है। यह पक्षपातपूर्ण आयाम सिर्फ़ गाहे-बगाहे पुलिस के निरंकुश बर्ताव या मनमाने अदालती व्यवहार के रूप में ही नहीं सामने आता, बल्कि इसमें राजनीति भी गहरे घर कर गयी है। आज के दौर में सर्वोच्च न्यायालय तक में भी इस प्रवृत्ति के दर्शन जब-तब हो जाना अपवाद नहीं रह गया है।  

प्रशांत भूषण को अवमानना का दोषी ठहराया जाना बताता है कि कैसे इस क्रम में जज सर्वोच्च न्यायालय के पर्याय मान लिए जाते हैं। भूषण ने तो सिर्फ़ कोविद काल में आम मामले सर्वोच्च न्यायालय में न सुने जाने की शिकायत की थी जो वर्तमान चीफ़ जस्टिस बोबडे की कार्यप्रणाली पर एक तल्ख़ टिप्पणी थी। लेकिन तीन जजों की बेंच ने इसे पूरी अदालत के विरुद्ध दुर्भावनापूर्ण (malicious) और शर्मसारी (scandalous) करार दिया है। 

इसके बरक्स, याद कीजिए जब जनवरी 2018 में विवादास्पद रंजन गोगोई समेत अदालत के चार वरिष्ठतम जजों ने तत्कालीन चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा पर मनमाने तरीक़े से रोस्टर तय कर लोकतंत्र को ख़तरे में डालने यानी न्यायिक प्रक्रिया में दुर्भावनापूर्ण हस्तक्षेप का आरोप ऐतिहासिक प्रेस वार्ता आयोजित कर लगाया था। तब जज लोया हत्या का मामला जस्टिस अरुण मिश्रा को देने पर असंतोष का फ़ौरी सबब था। अब जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने भूषण को अवमानना का दोषी ठहराया है। इस मामले में अपनाए मानदंड के हिसाब से तो वह प्रेस वार्ता सौ गुना बड़ी अवमानना का मामला बनना चाहिए था!

इस प्रकरण में एक और ग़ौरतलब आयाम भी संदर्भित होना चाहिए। वह है जस्टिस कर्णन का जिन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के कई जजों को भ्रष्ट बता कर जाँच की माँग की थी। मई, 2017 में जब सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कर्णन को अवमानना में सज़ा सुनाई, उसी शाम प्रशांत भूषण ने ट्वीट कर कहा था, “बेहद खुशी हो रही है कोर्ट अवमानना के आरोप में जस्टिस कर्णन को सज़ा सुनाई गई। इस आदमी ने माननीय जजों पर बेफ़िक्र होकर बेबुनियाद आरोप लगाए और जजों के खिलाफ बेतुका आदेश पास किया।”

फ़र्क़ यह है कि इस बार 30 वर्ष से सर्वोच्च न्यायालय में वकालत कर रहे प्रशांत भूषण ने स्वयं सर्वोच्च न्यायालय को उसी के आईने में उसका अक्स दिखाया है; बेशक एक सीमित नज़रिए से। जबकि प्रेस वार्ता कर विरोध जताने वाले चार जजों ने महज़ बतौर चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा की कार्यप्रणाली को निशाना बनाया था। उनमें से एक जस्टिस रंजन गोगोई ने तो चंद महीनों बाद चीफ़ जस्टिस बन कर स्वयं भी उसी तरह रोस्टर का दुरुपयोग किया।

देश का आम नागरिक हैरान तो होगा कि कोरोना समय में जब सामान्य अदालतों के सामान्य कार्यकलाप भी ठप जैसे हैं, सर्वोच्च न्यायालय बजाय उसके लिए न्याय सुलभ कराने के प्रशांत भूषण के दो हताश ट्वीट से अपनी तथाकथित अवमानना पर इतना ध्यान क्यों दे रहा दीखता है? सर्वोच्च न्यायालय की आलोचना का एक सतत पहलू यह भी रहा है कि भारतीय नागरिक को बरसों, कभी कभी तो दशकों, न्यायिक फ़ैसलों का इंतज़ार करना होता है और केवल एक छोटा सा संपन्न वर्ग ही इस बेहद खर्चीले न्यायिक मंच का लाभ उठा पा रहा है। क्या इससे बड़ी भी कोई अवमानना हो सकती है?

जस्टिस कृष्ण अय्यर को फली नरिमन जैसे सर्वमान्य जूरिस्ट ने ‘सुपर जज’ कह कर याद किया था। अपने महान मौलिक और संवेदनापूर्ण व्यक्तित्व के चलते वे सर्वोच्च न्यायालय से 1990 में रिटायर होने पर भी 2014 में निधन तक भारत में न्यायपालिका की अंतरात्मा के रखवाले की आवाज रहे। बाद में केरल उच्च न्यायालय में उनके विरुद्ध भी अवमानना का एक मामला आया। उन्होंने एक टिप्पणी में न्यायिक रवैये को सभ्य बर्ताव से स्वतंत्र करार दिया था। 

उच्च न्यायालय का निर्णय था कि उनकी टिप्पणी किसी निंदक की टिप्पणी नहीं है जो दुर्भावनापूर्ण कही जा सके। बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की जो न्यायिक समस्याओं के प्रति लोगों के नज़रिए में क्रांतिकारी बदलाव का आह्वान कर रहा है। ऐसे में, प्रशांत भूषण को अवमानना का दोषी ठहराने के क्रम में जस्टिस अय्यर को उद्धृत करना कुछ ऐसा ही हुआ जैसे किसी सत्याग्रही को सजा देने के लिए गांधी को उद्धृत किया जाए।

(विकास नारायण राय राष्ट्रीय पुलिस अकादमी के पूर्व निदेशक हैं।)

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