Friday, January 27, 2023

अमेरिकी संसद में नरेंद्र मोदी को नया ‘पिनोशे’ बताया गया

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अमेरिका की सत्ताधारी डेमोक्रेटिक पार्टी की एक सांसद इल्हान उमर ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नया ‘ऑगस्टो पिनोशे’ बताया है। उन्होंने अमेरिकी संसद में दिये अपने भाषण में भारत में मानवाधिकार की स्थिति को लेकर नरेंद्र मोदी पर हमला बोलते हुए कहा, “मुझे इस बात की चिंता है कि इस बार हम मोदी को अपना ‘नया पिनोशे’ बनने देना चाहते हैं।”

सोमालियाई मूल की अमेरिकी सांसद इल्हान उमर चीन में मानवाधिकार हनन को रिकॉर्ड ‘अत्याचारी’ बता रही थीं कि तभी उन्होंने सवाल पूछा कि भारत में मोदी के बारे में हमारी क्या राय है? हम मोदी का समर्थन करके उन्हें बढ़ावा दे रहे हैं? उन्होंने आरोप लगाया कि मानवाधिकारों पर मोदी सरकार की आलोचना करने के लिए बाइडेन प्रशासन अनिच्छुक दिखता है। पीएम मोदी के आलोचकों का कहना है कि ‘उनकी हिंदू राष्ट्रवादी सत्ताधारी पार्टी ने 2014 में सत्ता में आने के बाद से धार्मिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया है।’

राष्ट्रपति जो बाइडेन की डेमोक्रेटिक पार्टी की ही सांसद इल्हान उमर यहीं नहीं रुकीं, इसके अलावा उन्होंने एक ट्वीट में कहा, “मानवाधिकारों पर मोदी सरकार की आलोचना करने में बाइडेन प्रशासन इतना अनिच्छुक क्यों है? इससे पहले कि हम उन्हें शांति का साथी मानना बंद कर दें, मोदी को भारत की मुस्लिम आबादी के साथ क्या करने की जरूरत है? ये ऐसे सवाल हैं जिनका बाइडेन प्रशासन को जवाब देना चाहिए।”

इसे लेकर भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने नाराजगी जताते हुए कहा, “मोदी को ‘नया पिनोशे’ करार देने के बाद आलोचनाओं पर अमेरिकी सांसदों ने हंसी उड़ाई। यह कितना भयानक अपमान है। जयशंकर को विरोध करना चाहिए।”

उधर अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका भारत में मानवाधिकार के मुद्दों पर नजर रख रहा है और अमेरिका भारतीय अधिकारियों के साथ नियमित संपर्क में है। उन्होंने कहा कि भारत में मानवाधिकार हनन की घटनाएं बढ़ी हैं और हम इन साझा मूल्यों पर भारतीयों के साथ नियमित रूप से जुड़ते हैं और अब हालिया घटनाक्रमों की निगरानी भी कर रहे हैं, जिनमें सरकार, पुलिस और जेल के कुछ अधिकारियों द्वारा मानवाधिकारों के हनन में वृद्धि शामिल है।’

कौन था ऑगस्टो जोस रेमन पिनोशे उगाते?

दुनिया के अब तक के ‘टॉप टेन’ अत्याचारी तानाशाहों में शामिल चिली के जनरल ऑगस्टो जोस रेमन पिनोशे उगाते ने वहां 17 साल तक शासन किया। उसने सल्वाडोर एलेंदे की लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई मार्क्सवादी सरकार का तख़्तापलट करने में सेना का नेतृत्व किया था। इस तख़्तापलट के बाद वहां हिंसा और क्रूरता का जो दौर चला उसने दुनिया को हिला कर रख दिया था।

ऑगस्तो पिनोशे उगाते का जन्म 1915 को चिली शहर में हुआ था। वह छह भाई बहनों में सबसे बड़ा था। सैन्य शिक्षा पूरी करने के बाद वह सेना में शामिल हुआ और 1969 में सेना में ‘चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़’ के पद पर पहुंच गया। फिर 1973 में जनरल बना दिया गया। इसके बाद राष्ट्रपति सल्वाडोर एलेंदे ने उसे चिली की सेना का कमांडर इन-चीफ़ बना दिया। तब तक चिली के कम्युनिस्ट राष्ट्रपति सल्वाडोर एलेंदे को शासन करते हुए करीब तीन साल बीत चुके थे।

सैन्य जुंटा का गठन और तख़्तापलट

राष्ट्रपति सल्वाडोर एलेंदे ने जिस जनरल पिनोशे पर भरोसा करके कमांडर इन-चीफ़ बनाया था, उसी पिनोशे ने दो महीने बाद उनसे कहा कि या तो वे इस्तीफा दे दें या फिर सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार हो जाएं। इससे पहले कमांडर इन-चीफ़ ऑगस्टो जोस रेमन पिनोशे उगाते ने एडमिरल जोस मेरिनो, जनरल गुस्तावो ली गुज़मैन और जनरल सीज़र मेंडोज़ा से मिलकर एक सैन्य जुंटा का गठन कर लिया था।

राष्ट्रपति एलेंदे ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। फिर सितंबर 1973 में जनरल पिनोशे के नेतृत्व में पैदल सेना, तोपखाने और विमानों का उपयोग करते हुए राष्ट्रपति निवास में प्रवेश कर एलेंदे की हत्या कर दी लेकिन ‘गोदी मीडिया’ के जरिये प्रचारित कर दिया कि उन्होंने आत्महत्या कर ली थी। इससे पहले, पिनोशे ने कहा कि वर्तमान सरकार संविधान का पालन नहीं करती है और देश को रसातल में ले जा रही है।

1973 के सितंबर महीने में इस तख़्तापलट का विरोध करने वाले हज़ारों लोगों को सेंटियागो के नेशनल फ़ुटबॉल स्टेडियम में बंद कर भयंकर यातनाएं दी गईं। इनमें से कई लोगों को बाद में मौत के घाट उतार दिया गया। उसकी इस ‘सफाई’ प्रक्रिया में हजारों लोग बेमौत मारे गए। पिनोशे के आदेश से न केवल कम्युनिस्ट और विपक्षी, बल्कि उच्च पदस्थ अधिकारी भी मारे गए थे। कई बुद्धिजीवी देश छोड़कर चले गए लेकिन चिली के खुफिया अधिकारियों ने संयुक्त राज्य अमेरिका सहित विभिन्न देशों में भगोड़े अधिकारियों को खत्म करना जारी रखा।

ऑगस्टो जोस रेमन पिनोशे ने सत्ता संभालते ही संसद को स्थगित कर दिया और चुनावों पर रोक लगा दी। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को कुचल दिया गया। जनरल पिनोशे के शासनकाल में प्रताड़ना सामान्य सी बात हो गई थी। हज़ारों लोगों को गायब कर दिया गया। जिनका कभी पता ही नहीं चला। जनरल पिनोशे दावा करता रहा कि वह चिली को कम्युनिज़्म से बचा रहा है।

नागरिकों का जीना हुआ दूभर

जनरल पिनोशे ने राष्ट्रपति सल्वाडोर एलेंदे का तख्ता पलट करने के दो दिन बाद ही नागरिक अधिकार स्थगित कर दिए, मार्क्सवादी पार्टियां ग़ैरक़ानूनी घोषित कर दी गईं, मज़दूर संगठनों के अधिकारों में कटौती और सेंसरशिप लागू कर दी गई। देश में राजनीतिक उथल-पुथल, लगातार बढ़ती महंगाई और आर्थिक दुर्व्यवस्था के बीच जिन अधिकारियों ने तख्तापलट का समर्थन करने से इनकार कर दिया, उन्हें मौत की सजा दी गई।

सत्ता अपने हाथ में लेते ही जनरल ऑगस्टो पिनोशे उग्राते ने धीरे-धीरे अपने सभी विरोधियों को खत्म कर दिया। कुछ को किनारे लगा दिया, जबकि अन्य रहस्यमय परिस्थितियों में मारे गए। नागरिक अधिकारों सम्बधी कानूनों को समाप्त कर दिया गया और न्यायाधीश के पदों पर अपनी पसंद के लोग बैठाए गए। देश को संचालित करने में संसद और राजनीतिक दलों की कोई भूमिका नहीं रह गई। अब पिनोशे वास्तव में सर्वशक्तिमान तानाशाह बन गया।

उन दिनों चिली की जैसी आर्थिक-सामाजिक स्थिति थी उसका अंदाजा केवल इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिनोशे ने चिली के धनाढ्य वर्ग की स्थिति मजबूत करने पर ध्यान दिया, न कि कमजोर वर्ग की। उसके प्रसिद्ध वाक्यांशों में से एक इस प्रकार है―”हमें अमीरों का ध्यान रखना चाहिए ताकि वे अधिक दें।” इसी विचार के कारण चिकित्सा, स्वास्थ्य और शिक्षा निजी हाथों में दे दी गई। उद्योग-धंधे, कल-कारखाने सबकुछ निजी हाथों में सिमट गए। जिससे इन सभी क्षेत्रों पर बुरा प्रभाव पड़ा, सामाजिक असमानता पनपी और अंततः चिली सबसे गरीब देशों में से एक बन गया।

ऑगस्टो पिनोशे ने देश में मार्शल लॉ लागू कर दिया और कहा कि चिली के मुख्य दुश्मन कम्युनिस्ट हैं। इससे बड़े पैमाने पर दमन हुआ। चिली में गुप्त यातना केंद्र स्थापित किए गए और राजनीतिक कैदियों के लिए कई एकाग्रता शिविर बनाए गए।

बाद में पता चला कि अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए ने सल्वाडोर एलेंदे की सरकार को अस्थिर करने के लिए लाख़ों डॉलर खर्च किए थे।

जून 1974 में पिनोशे राष्ट्रपति के पद पर बाक़ायदा आसीन हो गया। इसे लेकर जब दुनियाभर में काफी थुक्का फजीहत होने लगी। संयुक्त राष्ट्र ने 1978 में एक प्रस्ताव पारित कर पिनोशे की कारगुजारियों की निंदा की। तो दिखावे के लिए 1978 में राष्ट्रीय जनमत संग्रह कराया गया जिसमें उसे 75 प्रतिशत मत मिले। इसके जरिये ऑगस्टो पिनोशे ने विश्व समुदाय को दिखाया कि उसे अपने देश का व्यापक स्तर पर समर्थन प्राप्त है। हालांकि, कई विशेषज्ञों की राय में जनमत संग्रह के आंकड़े फर्जी थे।

फिर 1980 में नया संविधान बनाया गया। इसके एक साल बाद पिनोशे ने खुद को चार साल की जगह आठ साल के लिए राष्ट्रपति घोषित कर दिया। यानी ‘अंधा बांटे रेवड़ी फिर-फिर अपने को दे’ वाला मामला था। इससे जन-अंसतोष भड़क उठा।

‘गोदी मीडिया’ ने उसकी नीतियों के चलते महंगाई कम होने और व्यावसायिक गतिविधियों में तेज़ी आने की खूब हवाबाजी की लेकिन 1981 में बेरोज़गारी बहुत बढ़ गई तो इसके ख़िलाफ़ बड़े-बड़े प्रदर्शन भी हुए।

ब्रिटेन ने सहयोग किया

इंग्लैंड और अर्जेंटीना के मध्य 1982 में फॉकलैंड विवाद के समय पिनोशे ब्रिटेन का सहयोगी बना तो लेबर पार्टी के विरोध के बावजूद तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने चिली को हथियार बेचने पर लगा प्रतिबंध हटा दिया। इसके बाद जल्दी ही ब्रिटेन और अमेरिका के सहयोग से जनरल पिनोशे ने राष्ट्राध्यक्ष के रूप में अंतरराष्ट्रीय मान्यता भी हासिल कर ली।

1986 की गर्मियों में देश भर में आम हड़ताल हुई जो असफल रही। फिर देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया शुरू करने के विचार से किसी सकारात्मक निर्णय पर पहुंचने के लिए ऑगस्टो पिनोशे को पोप जॉन पॉल द्वितीय ने बुलाया। तब कहीं जाकर कर्मचारियों की पेंशन और वेतन-वृद्धि की घोषणा की गई, उद्यमियों से आवश्यक उत्पादों की कीमतें कम करने का आग्रह किया गया और किसानों को भूमि शेयरों का वादा भी किया गया। हालांकि, ऐसी तमाम लोकलुभावन कोशिशें विफल रहीं।

बढ़ते विरोध का सामना करते हुए तानाशाह ने राजनीतिक दलों को वैध और राष्ट्रपति चुनावों को अधिकृत किया। जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया पुनर्जीवित करने के लिए 1988 में लोगों को मौक़ा दिया गया कि वे या तो उसे चुनें या नकार दें तो लोगों ने 54.7 प्रतिशत के मुक़ाबले 43 प्रतिशत वोटों से उसे नकार दिया। इस निर्णय को पिनोशे ने अनिच्छा पूर्वक स्वीकार किया।

रेडियो और टीवी पर अपने ‘मन की बात’ के दौरान पिनोशे ने वोट के परिणामों को ‘चिलीवासियों की गलती’ माना, लेकिन कहा कि वह उनकी इच्छा का सम्मान करता है। इस पर भी तत्काल सत्ता छोड़ने की विपक्ष की मांग को ठुकराते हुए वह दो साल और राष्ट्रपति बना रहा। अंततोगत्वा 1990 की शुरुआत में पेट्रीकियो एल्विन अजोकर को नया राष्ट्रपति बनाया गया।

पिनोशे राष्ट्रपति पद से हटने के बाद भी सात साल तक सेना प्रमुख बना रहा फिर संसद का सदस्य बन गया। ऑगस्तो पिनोशे शायद सोचता रहा होगा कि वह शांतिपूर्वक रिटायर हो जाएगा लेकिन वह ग़लत था। जिस ब्रिटेन को उसने 1982 में फॉकलैंड विवाद के समय अर्जेंटीना के विरुद्ध सहयोग किया, जहां की वह लगातार यात्राएं करता रहता था और जहां वह अपने बहुत से ‘मितरों’ के साथ मस्ती करता था, उसी ब्रिटेन में इलाज के दौरान अक्तूबर 1998 में उसे गिरफ़्तार कर लिया गया।

पिनोशे की चिली वापसी

एक स्पैनिश अदालत ने मानवाधिकार हनन के आरोप में उसे प्रत्यार्पित करने की मांग की। जब डॉक्टरों के एक दल ने घोषणा कर दी कि पिनोशे इतना बीमार है कि उस पर मुक़दमा नहीं चलाया जा सकता तो ब्रिटिश सरकार ने बेफिक्र होकर उसे चिली लौटने की अनुमति दे दी। मार्च 2000 में 18 महीनों का निर्वासन झेलने के बाद वह अपने देश वापस लौट गया लेकिन कुछ ही हफ़्तों बाद सेंटियागो की एक अदालत ने उस पर सामूहिक हत्या, गबन, भ्रष्टाचार और ड्रग डीलिंग के आरोप में मुक़दमा चलाने की अनुमति दे दी। और, फिर वह बरसों बरस क़ानूनी लड़ाई में उलझा रहा। मुकदमे का फैसला आने से पहले ही 10 दिसंबर, 2006 को 91 वर्ष की आयु में उसकी मौत हो गई। उसकी मृत्यु पर हजारों लोगों ने चिली की सड़कों पर उतर कर जश्न मनाया और खुशी के गीत गाए। 

(श्याम सिंह रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल नैनीताल में रहते हैं।)

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