Saturday, April 20, 2024

मुंबई में मजदूरों के विद्रोह के लिए मोदी जी के तुगलकी फरमान हैं जिम्मेदार!

प्रधानमंत्री द्वारा देशव्यापी लॉक डाउन को 3 मई तक बढ़ाने की घोषणा के चंद घटों बाद ही मुंबई के उपनगर बांद्रा ( पश्चिम) में हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूरों का सड़कों पर उतर आना और अपने घर जाने के लिए परिवहन व्यवस्था की मांग करना और उसके बाद पुलिस द्वारा उनकी बर्बर तरीके से पिटाई और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी की स्थिति क्यों पैदा हुई और इसके लिए कौन जिम्मेदार है? 

मुंबई में मजूदरों का विद्रोह सिर्फ इस बात के संकेत हैं कि देश में मजदूर-खासकर प्रवासी मजदूर किन बदतर स्थितियों में रह रहे हैं और उनकी मानसिक हालत क्या है? उनकी मानसिक हालत का अंदाजा सिर्फ इससे लगाया जा सकता है कि वे कोरोना की चिंता किए बिना और कर्फ्यू तोड़कर सड़क पर स्वत: स्फूर्त तरीके से हजारों की संख्या में जान जोखिम में डालकर उतर आते हैं। पुलिस की बर्बर लाठियों का शिकार बनते हैं और सैकड़ों की संख्या में जेल जाते हैं। आखिर इतना जोखिम प्रवासी मजदूर क्यों उठा रहे हैं?

यह कोई पहली घटना नहीं, इसके पहले सूरत में भी प्रवासी मजदूर सड़कों पर उतर आए थे और उन्होंने अपने असंतोष और आक्रोश को आक्रामक तरीके से अभिव्यक्त किया था। उनके खिलाफ भी बर्बर पुलिस लाठी चार्ज हुआ और कई मजदूरों  को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। गुजरात में इस असंतोष को नियंत्रित करने के लिए विशेष सुरक्षा बल भी उतार दिया गया है। आज भी सूरत में हमें खाना दो कि तख्ती के साथ सैकड़ों मजूदर सड़कों पर उतरे। इसके पहले हजारों की संख्या में मजदूर आनंद बिहार बस स्टेशन पर भी एकत्रित हुए थे।

पहले लॉक डाउन के बाद ही हजारों मजदूर पैदल ही अपने-अपने घरों को निकल पड़े, 3 से 5 सौ किलोमीटर तक की पैदल यात्रा की। कई की तो जान  चली गई।आखिर इसके लिए कौन जिम्मेदार है। इसका उत्तर है कि इसके लिए सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी जी जिम्मेदार हैं। जैसा कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने एक बार कहा था कि मोदी सरकार को अपने सांस्कृतिक एजेंडे को लागू करना अच्छी तरह आता है, शेष मामलों में इनके पास अनुभव और विशेषज्ञों की कमी है। रघुराम राजन की बातों का निहितार्थ यह निकलता है कि मोदी के नेतृत्व वाली संघ-भाजपा की सरकार को हिंदू मुसलमान के आधार पर देश का ध्रुवीकरण करना, जरूरत पड़ने पर दंगे कराना और इसके आधार पर चुनाव जीतना तो आता है, लेकिन अर्थव्यवस्था सहित देश के अन्य मामलों को सही तरीके से संचालित करने और उसका प्रबंधन करने नहीं आता है।

लॉक डाउन लागू होने के तुरंत बाद देश के जाने-माने अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी थी कि यदि समय रहते सही कदम नहीं उठाए गए तो 1 करोड़ 50 लाख प्रवासी मजदूरों, 6 करोड़ बेघरों और कुल मिलाकर 80 करोड़ मेहनतकश मजदूरों-किसानों और स्वरोजगार करने वालों का जीवन गंभीर संकट में पड़ा जायेगा। इन अर्थशास्त्रियों ने ठोस सुझाव भी दिए थे।

सबने एक स्वर से कहा कि भारत के खाद्यान्न भंडार को पूरी तरह से खोल दिया जाना चाहिए और सबको मुफ्त राशन मुहैया कराया जाना चाहिए। नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अभिजित बनर्जी ने यहां तक कहा कि निजी संपत्ति के अधिकार को खत्म कर बहुत सारे रहने योग्य स्थानों को कब्जे में लेकर बेघरों के रहने का इंतजाम किया जाना चाहिए।

सबका एक स्वर से कहना था कि कम से कम जीडीपी का 5 से 6 प्रतिशत यानि  करीब 7 लाख करोड़ खर्च करना चाहिए।

लेकिन मोदी जी ने यह सब कुछ करने की जगह पर ताली-थाली और दिए का लालीपाप दिया, खाए -अघाए मध्यवर्ग ने इसे तमाशा में तब्दील कर अपना मनोरंजन किया। आज फिर मोदी जी सात कर्तव्य बता के चले गए। इधर सारे तमाशे होते रहे, उधर मजदूर वर्ग अपनी बदहाली पर रोता-सिसकता रहा है। एक तरह से मोदी जी ने ये तमाशे कराकर मजदूरों का मजाक उड़ाया।

अपने घरों में बैठा डरा हुआ उच्च मध्यवर्ग और मध्यवर्ग मोदी जी के प्रवचन और तमाशों का मजा ले रहा है और जिनके पास पीने का पानी भी नहीं उन्हें बता रहा है कि कैसे कम से कम 10 बार हाथ धोना चाहिए और जिनके पास रहने का घर नहीं हैं, उनसे कह रहा है कि घरों में रहें।

दूसरी  तरफ सब कुछ का निर्माण करने वाले स्वाभिमानी मजूदर वर्ग को भिखमंगा बना दिया गया है, पेट भरने के लिए घंटों भिखमंगे की तरह लाइन में खड़ा होने को मजबूर कर दिया गया है। अपने घर- परिवार- बाल-बच्चों  से दूर खाली जेब दड़बों में बंद रहने और भिखमंगे की तरह किसी तरह पेट भरने कर जिंदा रहने और मोदी जी के आदेशों का पालन करने की उसे सलाह मोदी जी द्वारा उन्हें दी जा रही है।

यह सब स्थिति भी मजदूरों ने कुछ दिन के लिए एक हद तक स्वीकार लिया और सोचा चलो 14 अप्रैल तक का मामला है, फिर शायद इस नरक की स्थिति से मुक्ति मिल जाए। लेकिन आज बिना मजदूरों को कोई ठोस आश्वासन दिए और बदतर हालात से निकलने का कोई ठोस उपाय बताए बिना, जब मोदी जी ने लॉकडाउन 3 मई तक बढ़ाने की घोषणा कर दी, तो मजदूरों के सब्र का बांध टूट गया और हर तरह का रिस्क उठाने के लिए तैयार होकर वे सड़कों पर उतर आए। यही काम मोदी जी ने पहले लॉक डाउन के समय भी किया था। बिना किसी होमवर्क के लॉक डाउन की घोषणा कर दी।

सच तो यह है कि पहले लॉक डाउन की घोषणा से पहले ही मोदी जी को प्रवासी मजदूरों के बारे में सोचना चाहिए था और उनके  लिए कोई पुख्ता इंतजाम करना चाहिए। लेकिन इंतजाम करने के लिए जब सोचने का समय था, तब तो मोदी जी मध्यप्रदेश में सरकार गिराने और बनाने में व्यस्त थे। उसके पहले का समय उन्होंने ट्रंप के स्वागत और दिल्ली में सरकार बनाने की कोशिश एवं दंगा कराने  में खर्च कर दिया था।

मजदूरों की वर्तमान अमानवीय हालत,असंतोष, आक्रोश और विद्रोह के लिए मोदी जी के असंवेदनशील तुगलकी फरमान ही जिम्मेदार हैं।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं।)

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