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मोदी जी! आप होंगे ट्रम्प के साथ, देश नहीं

ताजा खबर यह है कि पीएम मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से बात की है। वैसे तो कहने के लिए यह बातचीत जी-7 में भारत के शामिल होने और कोविड-19 की मौजूदा परिस्थितियों को लेकर हुई है। लेकिन यह आधा सच है। या यह भी कहा जा सकता है कि पूरा झूठ है। बातचीत का मकसद बंकर में छुपे महाबली को यह आश्वस्त करना था कि भारत उनके साथ है। यह शुद्ध रूप से एक राजनीतिक बातचीत थी। जिसमें भारत और अमेरिका से ज्यादा मोदी और ट्रम्प के निजी हित शामिल थे।

वरना एक ऐसे मौके पर जब एक ऐसी घटना को लेकर न केवल अमेरिका की जनता बल्कि पूरी दुनिया पीड़ित जॉर्ज फ्लाएड के साथ एकजुटता और संवेदना जाहिर कर रही है और उसके लिए अमेरिकी प्रशासन और उसके मुखिया के तौर पर ट्रम्प को जिम्मेदार ठहरा रही है उस समय आप ट्रम्प से बात कर आखिर क्या साबित करना चाहते हैं? क्या आप बताना चाहते हैं कि भारत को जार्ज फ्लाएड की घटना से कुछ लेना देना नहीं है और वह उनके लिए न्याय की मांग कर रहे आंदोलनकारियों के खिलाफ है।

एक ऐसे समय में जबकि दुनिया का कोई भी राष्ट्राध्यक्ष यहां तक कि अमेरिका का घनिष्ठ से घनिष्ठ कोई मित्र भी ट्रम्प से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है तब आप उनसे बात कर आखिर क्या संदेश देना चाहते हैं। क्या पूरा वाकया यह नहीं बताता है कि आप इस तरह के नस्लभेद और रंगभेद के पक्ष में हैं और इस तरह से परोक्ष तौर पर दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि भारत में वर्ण व्यवस्था और ब्राह्मणवादी वर्चस्व के तहत चलने वाली जातीय प्रणाली के आप खुले पैरोकार हैं। और बात मुसलमानों के साथ भेदभाव और दोयम दर्जे के व्यवहार की हो तो उसमें आप इससे भी दो कदम आगे हैं।

इस बातचीत के जरिेये क्या आपने ट्रम्प के ‘लूटिंग स्टार्ट्स, शूटिंग स्टार्ट्स’ के दर्शन को समर्थन नहीं दिया है? आप सड़कों पर चल रहे आंदोलनकारियों को बंदूक के बल पर कुचलने के ट्रम्प के पक्ष का समर्थन नहीं किया है? इसके जरिये आप ने यह बताने की कोशिश नहीं की है कि भारत की जनता वहां की उत्पीड़नकारी सत्ता और रंग भेद में विश्वास करने वालों के पक्ष में खड़ी है। एक ऐसे समय में जबकि अमेरिका का एक आला पुलिस अफसर ट्रम्प को नसीहत दे रहा है उस समय आप ट्रम्प की पीठ पर हाथ रखकर आखिर क्या साबित करना चाहते हैं। ट्रम्प और मोदी के बीच हुआ यह संवाद हिटलर और मुसोलिनी की दोस्ती की याद ताजा कर देता है। जब वे दोनों मिलकर न केवल अपने देशों और अपनी जनता बल्कि पूरी दुनिया को तबाही के रास्ते पर ले जाने की तैयारी कर रहे थे। और इस कड़ी में अपनी जनता और उसके अधिकारों को कुचल रहे थे और अंत में सत्ता एवं निजी हित से जुड़ी ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए पूरी दुनिया को विश्वयुद्ध की आग में धकेल दिए।

दरअसल मोदी को यह पता है कि भारतीय समाज अमेरिका से ज्यादा बर्बर है। किसी नस्लभेद और रंगभेद के मुकाबले यहां का जातीय भेदभाव उससे भी आगे खड़ा है। वह इंसान को इंसान का दर्जा तक नहीं देता। भेदभाव, नफरत और घृणा की जड़ें इतनी गहरी हैं कि एक इंसान दूसरे इंसान को छूने तक से परहेज करता है। अमेरिकी नस्लभेद तो बाहर से निर्मित किया गया था लेकिन भारत में यह सामाजिक और व्यवस्थागत ढांचे का अभिन्न हिस्सा है जो ऊपर से लेकर नीचे तक मौजूद है। अमेरिका में उस रंगभेद और नस्लभेद की उम्र महज 400-500 साल है। भारत में तो यह 2000 साल से चला आ रहा है। और मौजूदा समय में तो इसे ही आदर्श के तौर पर पेश किया जा रहा है। तब भला मोदी को किस बात का डर था।

अमेरिका में एक अफ्रीकी-अमेरिकी को मारा जाता है तो पूरा अमेरिका उसके पक्ष में खड़ा हो जाता है। लेकिन यहां आए दिन ऐसी घटनाएं घटती रहती हैं और उनके वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होती रहती हैं। लेकिन किसी के कान में जूं तक नहीं रेंगता। वहां पुलिसकर्मी मारते हैं तो उनमें से एक पर हत्या का मुकदमा और तीन को बर्खास्त कर दिया जाता है। यहां दिल्ली के जाफराबाद में चार युवकों को  बेरहमी से पीटने का वीडियो जब वायरल होता है और बाद में उसमें एक युवक की मौत हो जाती है। तब पुलिसकर्मियों को बर्खास्त करने और उन पर मुकदमा दर्ज करने की बात तो दूर कोई उसे संज्ञान में लेना भी जरूरी नहीं समझता।

यूपी के प्रतापगढ़ में एक हफ्ते के भीतर हैवानियत की दो घटनाएँ घट चुकी हैं। पटेल परिवारों पर पंडितों ने इसलिए हमला कर दिया कि आखिर उनकी भैंसों को पटेल समुदाय के लोगों ने अपनी खेतों में खड़ी फसल का नुकसान क्यों नहीं करने दिया। और हमला करते वक्त इस बात का पूरा गुस्सा दिख रहा था कि पिछड़े समुदाय का कोई परिवार भला पक्का मकान कैसे बना सकता है। यह विशेषाधिकार तो केवल सवर्णों को हासिल है! उनकी यह घृणा और नफरत पटेलों की महिलाओं पर निकली जब उन्होंने उनके साथ आपराधिक दर्जे की बदसलूकी की।

हिकारत और वितृष्णा जेहन में इस कदर बैठी थी कि मासूम बच्चे तक को नहीं बख्शा गया और सवर्ण दबंगों ने उसे मां की गोद से छीनकर जमीन पर फेंक दिया। देश और दुनिया के पैमाने पर प्रतिरोध की बात तो दूर सूबे और जिले तक में इसकी चर्चा नहीं हुई। न किसी मीडिया ने उठाना जरूरी समझा और न ही किसी दूसरे संगठन ने मुद्दा बनाया। उल्टे पुलिस ने पीड़ितों की तरफ से एफआईआर दर्ज करने की जगह उन्हें ही आरोपी बनाकर जेल में डाल दिया। और जब एक हफ्ते बाद दबाव बना तो क्रास एफआईआर दर्ज कर दी गयी।

अब अगर प्रशासन का रवैया यही रहेगा तो दबंगों का मनोबल बढ़ने से भला कौन रोक सकता है। उसका नतीजा यह रहा कि उसी जिले में एक हफ्ते बाद यानी कल रात एक युवक को जिंदा जला दिया गया।

और यह बात किसी गांव-देहात या फिर अशिक्षित और अनपढ़ हिस्से तक ही सीमित नहीं है। पढ़े लिखे और अपने को सभ्य कहने वाले हिस्से की भी जेहनियत कमोबेश इसी तरह की है। अंतर बस इतना है कि गांव-देहात के लोग खुलकर बोल देते हैं शहरी और कथित सभ्य लोग इस काम को मौका देखकर करते हैं। लेकिन कई बार उनकी असलियत सामने आ जाती है। जैसा कि एक डॉक्टर मोहतरमा के साथ हुआ। और वह सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। इसमें वह खुलकर मुसलमानों के खिलाफ अपने भीतर भरी घृणा और नफरत की उल्टी कर रही थीं। और मुस्लिमों को एक इंसान का भी दर्जा देना उन्हें कबूल नहीं था। मानो वे इंसान न होकर धरती पर बोझ हों और उनका समूल नाश कर दिया जाना चाहिए। उनकी कुछ इसी तरह की चाहत थी।

एक डॉक्टर जिसका काम लोगों को जीवन देना और उसकी रक्षा करना है उसकी सोच अगर जिंदगी को लेकर ऐसी हो जाए तो उसे किस श्रेणी में रखा जाना चाहिए? अब आप यहां फिर किससे इंसानियत की उम्मीद कर सकते हैं। और जब मामला प्रकाश में आ गया और उनकी घेरेबंदी शुरू हो गयी तो अब उन्होंने माफी मांगने का नाटक किया है। लेकिन अभी भी कोई उनकी बर्खास्तगी और उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भेजने की मांग नहीं कर रहा है। उनको लग रहा है कि एक माफी से सब कुछ हल हो जाएगा। जबकि होना यह चाहिए कि सबसे पहले उन मोहतरमा की डॉक्टर की डिग्री छीनी जानी चाहिए और उनके आजीवन किसी मरीज को देखने पर रोक लगनी चाहिए। ऊपर से नस्लभेद और सामुदायिक घृणा फैलाने के तमाम प्रावधानों के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल की सींखचों के पीछे डाल दिया जाना चाहिए।

बहरहाल ऊपर से लेकर नीचे, सभ्य से लेकर असभ्य और शिक्षित से लेकर अशिक्षित तक की यही जेहनियत है। और यही वजह है कि पीएम मोदी को यह पता है कि उनकी बातचीत का कोई विरोध नहीं होगा। उल्टे यह उनकी कांस्टीट्यूएंसी को और मजबूत करने में मददगार साबित होगा। यही वजह है कि वह सीना चौड़ा कर बात करते हैं। लेकिन अगर इस देश और उसके समाज में थोड़ी भी गैरत बाकी है और अमेरिका में हुई घटना का थोड़ा भी मलाल है तो उसे सबसे पहले अपने प्रधानमंत्री के इस कदम की न केवल आलोचना करनी चाहिए बल्कि उनके इस रंगभेद समर्थक और मानवता विरोधी पहल के लिए उन्हें माफी मांगने के लिए भी मजबूर करना चाहिए।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

This post was last modified on June 3, 2020 9:18 pm

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