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मोदी जी! युद्ध के बीच में घोड़ा नहीं बदलते

पहले चरण के मतदान के साथ ही बिहार में दूसरे चरण का चुनाव प्रचार शुरू हो गया है। कल मतदान का प्रतिशत 54.1 फीसदी रहा। इस कम वोटिंग के पीछे एक प्रमुख वजह कोरोना को माना जा रहा है जिसने आमतौर पर पूरे मतदान को प्रभावित किया है। इसके साथ ही बताया जा रहा है कि युवाओं में रोजगार आदि के मुद्दा बनने से तो उत्साह है लेकिन बुजुर्गों और पुरानी पीढ़ी में यह बात नहीं देखी जा रही है। और उनमें पिछली सभी सरकारों को लेकर एक तरह की निराशा घर कर गयी है। यही वजह है कि मतदान के प्रति उनके भीतर उस तरह का उत्साह नहीं दिखा। लिहाजा वह भी एक कारण हो सकता है।

हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले यह आंकड़ा थोड़ा ही कम है। पिछले विधानसभा चुनाव में 54.47 फीसदी लोगों ने अपने मतदान के अधिकार का इस्तेमाल किया था। हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि चुनाव से पहले ही लेफ्ट से लेकर राजद तक ने कोरोना के चलते चुनाव टाल देने का अभियान चलाया था। बावजूद उसके चुनाव हुआ। ऐसे में उस पूरे अभियान और मांग का असर जनता के एक हिस्से पर जरूर पड़ा होगा। और इस बात की पूरी आशंका है कि वह पोलिंग बूथ तक जाने से डर गया होगा। क्योंकि वहां जाने पर निश्चित तौर पर कोरोना संक्रमण का खतरा था।

बहरहाल बिहार के अपने घोड़े नीतीश को पिटते देख अब दूसरे चरण से पीएम मोदी ने चुनाव प्रचार की कमान संभाल ली है। और कल उनका बिहार के अलग-अलग हिस्सों में तीन जगहों पर भाषण हुआ। और तीनों जगहों पर नीतीश की उपलब्धियों को गिनाने के बजाय उन्होंने अपनी योजनाओं का बखान किया। यानी परोक्ष तरीके से मोदी ने भी यह बात मान ली कि नीतीश ने कुछ नहीं किया है। अपने पहले चरण की एक सभा में उन्होंने नीतीश के पुराने कार्यकाल की जिम्मेदारी को अपने दामन से यह कहकर हटा दिया था कि एक दौर में नीतीश को केंद्र में यूपीए की सत्ता के साथ रहना पड़ा। और पिछले चुनाव में उनका आरजेडी के साथ गठबंधन था बाद के केवल तीन साल की उनकी जिम्मेदारी बनती है जिसमें वह नीतीश के साथ रहे।

और इस तरह से नीतीश के 15 सालों के शासन को मोदी ने तीन सालों के शासन की अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही के साथ लाकर खड़ा कर दिया। वैसे भी चुनाव अभियान को पीएम मोदी स्तरहीन बनाने के लिए जाने जाते हैं। एक बार फिर उन्होंने हताशा में अब उसी रास्ते को अख्तियार कर लिया है। कल वह भाषण तो मैदान में कर रहे थे लेकिन उन्हें जंगल याद आ रहा था। और उसमें भी नाले में उतर कर उन्होंने कीचड़ फेंकना शुरू कर दिया। एक 32 साल का नौजवान उनके लिए चुनौती बना हुआ है। उसके मुद्दों और उसके वादों की कोई काट न देख अब उन्होंने दूसरा रास्ता पकड़ लिया है। कल उसको उन्होंने जंगल राज का युवराज तक करार दे दिया और नीतीश का डीएनए मार्का बयान दे डाला। कोई उनसे पूछ सकता है कि क्या राजनीति भी आनुवंशिक होती है। दरअसल मोदी का पूरा जीवन ही लोगों को लड़ाने में बीत है।

उनकी राजनीति ही उन्माद और घृणा फैलाने वाली रही है। उन्होंने कभी हिंदुओं को मुसलमान से लड़ाया तो कभी अगड़ों को पिछड़ों से और कभी अपनी पार्टी में एक नेता को दूसरे से लड़ा दिया। और इस मामले में उन्हें खून से भी परहेज नहीं रहा है। 32 साल का एक बच्चा इस बात को समझ गया कि लोगों की एकता में ही बल है। और आज वह समाज में समन्वय और भाईचारे का सबसे बड़ा प्रतीक बना हुआ है। उसने इसकी खातिर अपने पिता के 15 सालों के शासन को भी भुला दिया। यहां तक कि मैनिफेस्टो पर उनकी फोटो तक नहीं दी। और वे पिछड़े हों या कि अगड़े सभी के रोजी, रोटी और रोजगार की बात कर रहा है। और क्योंकि उसे यह बात पता है कि  वह उस दौर की जरूरत हो सकती है। लेकिन आज समाज और राजनीति उससे बहुत आगे बढ़ गयी है लिहाजा उसकी जरूरतें भी बदल गयी हैं।

और अब उसको उसके मुताबिक काम करना होगा। लेकिन जरूरी सवाल यह है कि क्या मोदी इस बात को सीख पाए? वह अभी भी गुजरात के अपने मारो-काटो अभियान को राजनीतिक का सबसे कारगर हथियार मानते हैं। और अब जबकि केंद्र की सत्ता में आ गए हैं और उन्हें सब कुछ मिल गया है। तब भी उनके लिए वही उनका केंद्रीय मुद्दा बना हुआ है। यह बात अलग है कि बिहार की जनता ने उन्हें अपने बुनियादी सवालों पर बोलने के लिए मजबूर कर दिया है। और गिरिराज जैसे जहरीले नागों को भी जिन्होंने पाकिस्तान में ही अपना डेरा-डंडा डाल रखा था। आजकल उन्हें रोजगार पर बोलना पड़ रहा है। यह अलग बात है कि वह अल्ल की बल्ल ही बोल रहे हैं जिसका न तो जमीन से कोई रिश्ता है और न आसमान तक में उसके लिए कोई जगह।

अपनी उपलब्धियां और योजनाएं गिनाने वाले मोदी को सबसे पहले इसी कोराना काल में हुई बिहार के लोगों की मौतों, जहालतों और परेशानियों का जवाब देना चाहिए। क्योंकि उस बात के लिए देश के अगर किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराया जाए तो वह मोदी और सिर्फ मोदी हैं। 1500-2000 किमी दुधमुंहे बच्चों और गर्भवती महिलाओं के साथ जब लोग अपने घरों के रास्ते नाप रहे थे तब मोदी क्या कर रहे थे? क्या संसाधनों की कमी थी? सारी की सारी गाड़ियां यार्ड में खड़ी थीं बसें डिपो की शोभा बढ़ा रही थीं। पेट्रोल पंप के मीटर बंद थे लेकिन उनके अंडरग्राउंड टैंकरों में तेल मौजूद था।

फिर क्या वजह थी जो उन्हें समय पर सुविधाएं मुहैया नहीं करायी गयीं। और 21 वीं सदी के इस दौर में लोगों को हजारों किमी पैदल चलना पड़ा और एक बार फिर देश की धरती पर बंटवारे की याद ताजा हो गयीं। हद तो तब हो गयी जब कांग्रेस ने बसों को मुहैया कराया और योगी ने तमाम तकनीकी बाधाएं खड़ी कर उन्हें रोक दिया। इस स्तर की कृतघ्नता बीजेपी के नेता और सरकार में बैठे लोग किए और आप पीएम आवास में बैठे-बैठे सब कुछ मौन होकर देख रहे थे। न तो आपने हस्तक्षेप करना जरूरी समझा और न ही उसके लिए कोई अलग से व्यवस्था की।

और अब जबकि चुनाव हो रहा है तो वोट मांगने चले गए। किस मुंह से आप ऐसा कर सकते हैं। जिस जनता की न्यूनतम जरूरतों को भी नहीं पूरा किया आप उसके जीवन की जिम्मेदारी लेने की बात कह रहे हैं। एक जनता जिसने आपके कृतघ्न रवैये को अभी हाल में देखा है आप चाहते हैं कि वह आपको हरिश्चंद और भामाशाह मान ले। माना कि जनता की याददाश्त कमजोर होती है लेकिन वह इतनी भी कम नहीं होती कि शाम को पैदल घर पहुंची हो और सुबह उसे सपना समझ कर भूल जाए। उसे अपनी हर जहालत, परेशानी और अपमान याद है। और उसके बदले का भला इससे बेहतर मौका और क्या हो सकता है।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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This post was last modified on October 29, 2020 11:51 am

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