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‘राष्ट्रीय बेरोज़गार दिवस’ मुबारक हो नरेंद्र मोदी जी!

आज 17 सितंबर को देश की युवा आबादी ‘राष्ट्रीय बेरोज़गार दिवस’ के तौर पर मना रही है। पांच साल में करोड़ों युवाओं की नौकरियां छीनने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आज जन्मदिन है। देश के युवा पिछले कई दिनों से ताली थाली बजाकर सरकार को जगा रहे हैं और मशाल रैली दिखाकर सरकार की अंधेरगर्दी में आंदोलन का नया रास्ता तलाश रहे हैं। इस सप्ताह जिसमें नरेंद्र मोदी का जन्मदिन पड़ा है को युवा आबादी बेरोज़गार सप्ताह के तौर पर भी मना रही है। आज के दिन बेरोज़गार युवा आबादी ताली थाली बजाकर अपनी नौकरी खाने वाले प्रधानमंत्री को हैप्पी बर्थडे ‘नौकरीख़ोर’ बोलेगी।

नरेंद्र मोदी सरकार हर साल 2 करोड़ नौकरियां देने का वादा करके सत्ता में आई थी। लेकिन इस सरकार की नीतियां नौकर छीनने वाली साबित हुईं। एक अनुमान के मुताबिक मई, 2014 से दिसंबर, 2019 तक पांच सालों में केवल 7 प्रमुख सेक्टर में 4 करोड़ नौकरियां गई हैं। इस दौरान बेरोज़गारी दर 7.1 प्रतिशत रही है। अब बात 2020 यानि कोरोनाकाल की करें तो सिर्फ़ अप्रैल से जुलाई के बीच 2.67 करोड़ लोगों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है। यानि नरेंद्र मोदी ने अपने साढ़े छः साल के शासनकाल में 6.50 करोड़ लोगों की नौकरियां खाई हैं।

मई, 2014 से दिसंबर, 2019 के दरम्यान मोदी सरकार ने खाई 4 करोड़ नौकरियां

सीएमआईई (CMIE) के रिसर्च में सामने आया है कि मई, 2014 यानि मोदी सरकार के सत्ता पर बैठने के दिन देश में कर्मचारियों की संख्या 45 करोड़ थी, जो मई, 2019 में घटकर 41 करोड़ हो गई। इसका मतलब यह है कि चार करोड़ लोगों की नौकरियां मोदी सरकार खा गई।

मोदी सरकार के पहले शासनकाल में पूरे देश में 3.64 करोड़ नौकरियां सिर्फ 7 प्रमुख सेक्टर्स में ही जा चुकी हैं। इनमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार दोनों शामिल हैं। सर्वाधिक 3.5 करोड़ नौकरियां टेक्सटाइल सेक्टर की हैं। जेम एंड ज्वेलरी में 5 लाख नौकरियां गईं। जबकि ऑटो सेक्टर में 2.3 लाख नौकरियां गईं।

मोदी सरकार द्वारा सरकारी बैंकों के मर्जर के कारण ब्रांचों की संख्या में कमी आई है। ऑटोमेशन से काम होने के कारण भी कर्मचारी घटे जिसके चलते बैंकिंग क्षेत्र में 3.15 लाख नौकरियां गईं।

जियो को मोदी सरकार ने संरक्षण और टैक्स में राहत देकर खड़ा किया। 6 महीने मुफ़्त सेवा देकर जियो ने छोटी कंपनियों के ग्राहक अपनी ओर खींच लिए जिससे यूनीनॉर और एयरसेल जैसी कंपनियां बंद हो गईं, बीएसएनएल और एमटीएनएल को 4जी स्पेक्ट्रम नहीं दी। जबकि किसी भी नई सेवा पर सरकारी कंपनी का हक़ सबसे पहले बनता है। लेकिन सरकार ने 4जी स्पेक्ट्रम नहीं दिया जिससे बीएसएनएल और एमटीएमएल की नेट सर्विस पीछे हो गई। सरकार की नीतियों के चलते बीएसएनएल ग्राहकों को जियो का ग्राहक बना दिया। फिर बाकी बची दो तीन कंपनियों में प्राइस वॉर के कारण घाटा बढ़ा। जिससे इस क्षेत्र में सिर्फ़ 3 निजी कंपनियां बचीं। आइडिया-वोडाफोन मर्जर हो गया। 1.47 लाख करोड़ रुपए के एजीआर बकाए से मुसीबत में आ गई। कुल मिलाकर 90 हजार नौकरियां इस क्षेत्र में गईं।

रियल एस्टेट सेक्टर में 2.7 लाख नौकरियां गईं मई, 2014- मई, 2019 के दरम्यान। नोटबंदी के बाद स्थिति खराब हुई। जीएसटी और रेरा जैसे कानून आने के बाद शुरुआती समय में परेशानी और बढ़ गई।

एविएशन क्षेत्र में 20 हजार नौकरियां गईं। जेट एयरवेज के बंद होने से 15 हजार नौकरियां गई हैं। किंगफिशर बंद होने से भी 5 हजार नौकरियां गई हैं।

2.67 करोड़ नौकरियां गईं कोरोना काल के 4 महीने में   

सीएमआईई (CMIE) का अनुमान है कि अप्रैल से जुलाई के दौरान 2.67 करोड़ लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। भारतीय अर्थव्यवस्था निगरानी केंद्र (सीएमआईई) ने अपनी एक रिपोर्ट में ऐसा दावा किया है। इसने कहा कि अप्रैल में 1.77 करोड़ वेतनभोगियों की नौकरियां चली गईं। इसके बाद मई में एक लाख लोगों की नौकरी गई। इसी तरह जून में 39 लाख लोगों की नौकरियां गईं और जुलाई में एक बार फिर पचास लाख लोगों को नौकरियों से हाथ धोना पड़ा।

अंतर्राष्ट्रीय प्रबंधन परामर्श कंपनी आर्थर डी लिटिल की रिपोर्ट के अनुसार, कोविड-19 का सबसे बुरा असर देश में लोगों की नौकरियों पर पड़ेगा और गरीबी बढ़ेगी जबकि प्रति व्यक्ति आय में कमी आएगी। इसके परिणाम स्वरूप सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में तीव्र गिरावट आएगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोना वायरस के लगातार बढ़ते मामलों को देखते हुए हमारा मानना है कि भारत के लिए डब्ल्यू आकार की रिकवरी सबसे संभावित परिदृश्य है।

वित्त वर्ष 2020-21 में जीडीपी में 10.8 फीसदी की गिरावट और वित्त वर्ष 2021-22 में 0.8 फीसदी की जीडीपी वृद्धि होगी। रिपोर्ट के अनुसार, देश में बेरोजगारी 7.6 प्रतिशत से बढ़कर 35 फीसदी हो सकती है। इसके चलते 13.5 करोड़ लोगों की नौकरी जा सकती है और 17.4 करोड़ लोग बेरोजगार हो सकते हैं। इतना ही नहीं, 12 करोड़ लोग गरीबी के दायरे में आ सकते हैं और 4 करोड़ लोग बहुत ही गरीबी में पहुंच सकते हैं।

कोविड-19 महामारी के चलते देशव्यापी लॉक डाउन से भारत की बेरोजगारी दर 27 फ़ीसदी से भी अधिक हो गई है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक 3 मई को खत्म सप्ताह में भारत की बेरोजगारी दर 27.11 फ़ीसदी दर्ज हुई है। लॉकडाउन से पहले मार्च के मध्य में बेरोजगारी दर सात फ़ीसदी से भी कम थी। सीएमआईई के अनुसार शहरी इलाकों में बेरोजगारी दर गांव की तुलना में अधिक है। शहरों में यह 29.22 फ़ीसदी और ग्रामीण इलाकों में 26.69 फ़ीसदी दर्ज की गई है।

सीएमआईई के अनुसार मार्च में बेरोजगारी दर 8.74 फ़ीसदी और अप्रैल में 23.52 फ़ीसदी रही है। राज्यवार देखें तो अप्रैल में सबसे ज्यादा बेरोजगारी दर पुडुचेरी में 75.8 फ़ीसदी रही। इसके बाद तमिलनाडु में 49.8 फ़ीसदी, झारखंड में 47.1 फ़ीसदी, बिहार में 46.6 फ़ीसदी, हरियाणा में 43.2 फ़ीसदी, कर्नाटक में 29.8 फ़ीसदी, उत्तर प्रदेश में 21.5 फ़ीसदी और महाराष्ट्र में  20.9 फ़ीसदी दर्ज हुई है। पर्वतीय राज्यों में यह अपेक्षाकृत कम है। उत्तराखंड में बेरोजगारी की दर 6.5 फ़ीसदी, सिक्किम में 2.3 फ़ीसदी और हिमाचल प्रदेश में 2.2 फ़ीसदी रही है।

नोटबंदी, जीएसटी ने असंगठित क्षेत्र को बर्बाद कर दिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में कहा था पकौड़े बेचना भी रोजगार है। उनके ही मंत्री ने कहा था कि भीख मांगना भी रोज़गार है। लेकिन पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी ने असंगठित क्षेत्र को पूरी तरह से तबाह कर दिया। नगदी आधारित कारोबारों को नोटबंदी ने किस कदर चौपट किया इसका सहीं अंदाजा लगाना हो तो इस बात से समझिए कि ज्वेलरी का कारोबार नगदी आधारित माना जाता है।

बावजूद इसके कि मेहुल चौकसी और नीरव मौदी जैसे बड़े कारोबारियों को नोटबंदी के बाद अपना कारोबार समेटकर देश से भागना पड़ा। तो जो छोटे मोटे कारोबारी थे वे कैसे सर्वाइव करते। जो लोग अपना छोटा-मोटा कारोबार कर लेते थे उन्हें बाज़ार में नगदी के संकट के चलते अपना कारोबार समेटना पड़ा।

पिछले 45 साल में सबसे ऊँचे स्तर पर है बेरोज़गारी दर

केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (CSO) ने मोदी सरकार की ताजपोशी के अगले ही दिन यानि 31 मई, शुक्रवार को जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान देश में बेरोजगारी की दर 6.1 फीसदी रही। नोटबंदी और जीएसटी ने उद्योग जगत की कमर तोड़ दी थी जिसके चलते बेरोज़गारी दर 45 वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुँच गई। कोरोना काल में दूसरे तिमाही में देश की जीडीपी 23 अंक लुढ़ककर माइनस में पहुँच गई।

साल 2020 की बात करें तो सीएमआईई के आँकड़ों के मुताबिक़

जनवरी, 2020 में शहरी बेरोज़गारी दर 9.70%; ग्रामीण बेरोजगारी दर 6.06% रही।

फरवरी 2020 में शहरी बेरोज़गारी दर 8.65%; ग्रामीण बेरोजगारी दर 7.45% रही।

मार्च 2020 में शहरी बेरोज़गारी दर 9.41%; ग्रामीण बेरोजगारी दर 8.44% रही।

अप्रैल 2020 में शहरी बेरोज़गारी दर 24.95%; ग्रामीण बेरोजगारी दर 22.89% रही।

मई 2020 में शहरी बेरोजगारी दर 25.79%; ग्रामीण बेरोज़गारी दर 22.48% रही।

जून 2020 में शहरी बेरोजगारी दर 12.02%; ग्रामीण बेरोजगारी दर 10.52% रही।

जुलाई 2020 में शहरी बेरोजगारी दर 9.15%; ग्रामीण बेरोजगारी दर 6.66% रही।

अगस्त 2020 में शहरी बेरोजगारी दर 9.83%; ग्रामीण बेरोजगारी दर 7.65% रही है।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

This post was last modified on September 22, 2020 12:11 am

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