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नागा शांति वार्ता टूट के कगार पर, मुइवा ने कहा- अलग झंडा, संविधान और ग्रेटर नागालिम पर कोई समझौता नहीं

नई दिल्ली। भारत सरकार और नागा संगठन एनएससीएन (आई-एम) के बीच जारी शांति वार्ता में नया मोड़ आ गया है। एनएससीएन (आई-एम) चीफ टीएच मुइवा ने अलग नागा झंडे और संविधान पर किसी भी तरह के समझौते से इंकार किया है। साथ ही उन्होंने कहा है कि असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर के नागा बहुल इलाकों को एक साथ जोड़ने के सवाल पर भी कोई पुनर्विचार नहीं होगा। भारत सरकार और नागा संगठन के बीच 2015 में नागा फ्रेमवर्क एग्रीमेंट हुआ था। जिसके तहत सरकार की ओर से आरएन रवि जो इस समय नागालैंड के गवर्नर भी हैं, नागा संगठन से वार्ता कर रहे थे।

जानकारों का कहना है कि यह घटना पूरी शांति प्रक्रिया को ही पटरी से उतार सकती है। क्योंकि अभी तक सरकार इन दोनों चीजों को लेकर किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है। इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में एक सूत्र का कहना था कि “हालांकि इससे संबंधित कथन नागालैंड के मीडिया में रिपोर्ट हुआ है, मुइवा ने फ्रेमवर्क एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर होने के बाद से सार्वजनिक तौर पर इस तरह का कोई बयान नहीं जारी किया था…..निश्चित तौर पर सरकार खुश नहीं है।”

फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद मोदी सरकार को इस बात की बहुत ज्यादा उम्मीद थी कि एनएससीएन (आई-एम) के साथ इस साल समझौता हो जाएगा।

इसके साथ ही सूत्रों का यह भी कहना है कि मध्यस्थ के तौर पर एनएससीएन के नेताओं ने आरएन रवि पर एतराज जताना शुरू कर दिया है। उन्होंने सरकार से उन्हें हटाने के लिए कहा है। मौजूदा समय में एनएससीएन के नेता दिल्ली में हैं और इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारियों के साथ बातचीत कर रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि रवि बृहस्पतिवार को दिल्ली आए थे लेकिन वह अब नागालैंड वापस जा चुके हैं।

मुइवा ने यह दावा ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ नागालिम’ के 74 वें ‘स्वतंत्रता दिवस’ के मौके पर दिल्ली से नागालैंड के लोगों को संबोधित करते हुए किया। एक अधिकारी का कहना है कि भाषण का सार्वजनिक किया जाना भी अप्रत्याशित है। उसने बताया कि “’स्वतंत्रता दिवस’ पर पहले भी वो भाषण दिए हैं…..लेकिन उन्हें कभी भी सार्वजनिक नहीं किया गया।”

मुइवा ने कहा कि 2015 के समझौते पर हस्ताक्षर सह अस्तित्व और साझी संप्रभुता के सिद्धांत के आधार पर हुआ था। उन्होंने कहा कि “भारत सरकार ने फ्रेमवर्क समझौते के जरिये नागाओं की संप्रभुता को मान्यता दी थी। समझौता यह भी कहता है कि ‘संप्रभु शक्ति की साझेदारी के जरिये दो संस्थाओं के शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को समावेशी बनाया जाना है।’ समावेश का मतलब है कि नागाओं से जुड़ी अलग-अलग प्रशासनिक इकाइयों और राजनीतिक कैंपों को समझौते में शामिल करना होगा। दो इकाइयों के सहअस्तित्व को किसी व्याख्या की जरूरत नहीं है। इसका मतलब है कि दो लोग और (दो) राष्ट्र एक साथ अस्तित्व में होंगे।”

उन्होंने आगे कहा कि कानून विशेषज्ञ इस बात को लेकर सहमत हैं कि सहअस्तित्व और साझी संप्रभुता शब्द दोनों इकाइयों पर लागू होता है न कि केवल एक पर। मुइवा ने कहा कि “संप्रभु शक्तियों की साझेदारी करते हुए नागा भारत के साथ सहअस्तित्व में रहेंगे……लेकिन वे भारत में विलय नहीं करेंगे।”

उन्होंने इस बात को भी साफ किया कि नागा लोग सरकार से झंडा और संविधान की मांग नहीं कर रहे थे- दूसरी तरफ ये सारी चीजें पहले से ही वहां मौजूद थीं। उन्होंने कहा कि “ मान्यता दीजिए या नहीं पहले से ही हमारे पास झंडा और संविधान है। झंडा और संविधान हमारी मान्यता प्राप्त संप्रभु इकाई के अंग हैं और ये नागा राष्ट्रवाद के प्रतीक भी हैं। नागाओं को अपना झंडा और संविधान हमेशा अपने पास रखना चाहिए।”

मुइवा ने दावा किया कि रवि ने भी इस बात का भरोसा दिलाया था। उन्होंने कहा कि “31 अक्तूबर, 2019 को बातचीत में आरएन रवि ने कहा, ‘हम आपके झंडे और संविधान का सम्मान करते हैं। हम यह नहीं कहते हैं कि भारत सरकार उनको खारिज कर रही है लेकिन हमें उसे जल्द से जल्द हल कर लेना चाहिए।’ हमने यह कहते हुए अपने रुख को फिर से दोहराया है कि बगैर झंडे और संविधान के कोई भी सम्मानजनक हल नहीं निकल सकता है।”

सूत्रों के मुताबिक नागा नेताओं और आईबी अधिकारियों के बीच मौजूदा दौर की बातचीत दोनों पक्षों के बीच जारी गतिरोध को तोड़ने पर केंद्रित है। एक अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि “बातचीत में नया मध्यस्थ होगा या नहीं इसका फैसला सर्वोच्च नेतृत्व करेगा।”

रवि और एनएससीएन (आई-एम) के बीच रिश्ते उसी समय से खराब होने शुरू हो गए थे जब उन्होंने सूबे में कानून और व्यवस्था की खराब स्थिति के लिए मुख्यमंत्री नीफियू रियो को पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने खासकर हिंसा और फिरौती की तेजी से बढ़ती घटनाओं पर चिंता जाहिर की थी। रवि ने कहा था कि हथियारबंद गैंग समानांतर सरकार चला रहे हैं।

बृहस्पतिवार को एनएससीएन (आई-एम) ने पांच पेज का एक बयान जारी किया जिसका शीर्षक था- ‘श्री आरएन रवि मध्यस्थ के तौर पर गलत कर रहे हैं’। इसमें कहा गया है कि “वे गवर्नर पर तब से नजर रख रहे हैं जब से उन्होंने फ्रेमवर्क समझौते को ट्विस्ट दिया है और नागा मसले को हल करने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में संसदीय स्थाई समिति को गलत जानकारी दी”।

एनएससीएन का कहना है कि हाउस पैनल को दी गयी अपनी रिपोर्ट में रवि ने लिखा कि फ्रेमवर्क समझौता भारत के भीतर बातचीत के जरिये हल की बात करता है न कि भारत के साथ- जो भारत और नागा के बीच बातचीत की पहले शर्त थी।

इसके साथ ही संगठन ने रवि पर बेहद कारीगरी से समझौते के एक वाक्य से ‘नया’ शब्द को डिलीट करने का आरोप लगाया। जिसमें कहा गया था कि “दोनों संस्थाओं के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए एक स्थायी, समावेशी ‘नया’ संबंध प्रदान करेगा।”

इस बीच इस पूरे मसले को लेकर विपक्ष हमलावर हो गया है। उसने केंद्र की मोदी सरकार पर देश की संप्रभुता के साथ समझौता करने का आरोप लगाया है। ट्वीट के जरिये जारी एक बयान में कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि 2015 के बहु प्रचारित पीएम मोदी के नागा समझौते में आश्चर्य जनक खुलासे हुए हैं। उन्होंने सवालिया लहजे में पूछा है कि क्या प्रधानमंत्री ‘साझा संप्रभुता’ के लिए सहमत थे? क्या पीएम ‘ग्रेटर नागालिम’ को स्वीकार करते थे? क्या पीएम ‘अलग से झंडे और संविधान’ को मानने के लिए तैयार थे? क्या राष्ट्र को पीएम ने धोखा दिया है?

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This post was last modified on August 16, 2020 10:51 am

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