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पीएम मोदी का खाद्यान्न वितरण संबंधी नया दावा भी पैकेज की तरह निकला झूठ!

प्रधानमंत्री जी ने अपने 30 जून 2020 के ‘राष्ट्र के नाम संबोधन’ में ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना’ को नवंबर तक बढ़ाने की घोषणा करते हुए बताया कि इससे राजकोष पर 90 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। उन्होंने बताया कि इसमें अप्रैल से जून तक के 60 हजार करोड़ रुपये के खर्च को जोड़ लिया जाए तो यह कुल खर्च 1 लाख 50 हजार करोड़ रुपये हो जाता है।

लेकिन इस आंकड़े को खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग द्वारा मई माह के लिए जारी खाद्यान्न बुलेटिन के आईने में देखा जाए तो असल में यह खर्च जितना बताया गया है उससे काफी कम होने वाला है। 1 जुलाई के ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में हरीश दामोदरन ने आंकड़ों के आधार पर इस झूठ को उजागर किया है।

अप्रैल से जून तक 3 महीने तक 5 किलो अनाज 80 करोड़ लोगों को, यानि कुल 1.2 करोड़ टन हुआ। इसे नवंबर तक बढ़ाने पर 2 करोड़ टन और बांटना होगा। खाद्यान्न बुलेटिन के आंकड़ों के हिसाब से भारतीय खाद्य निगम ने 2020-21 के लिए चावल की खरीद और वितरण पर रु. 37.27 प्रति किलो और गेहूं पर रु. 26.84 प्रति किलो की लागत का अनुमान लगाया है। अप्रैल से जून तक आवंटित 1.2 करोड़ टन में 1.044 करोड़ टन चावल था और 15.6 लाख टन गेहूं। अतः मुफ्त बांटे गए इस कुल अनाज पर खर्च 43100 करोड़ रुपये हुआ।

गोदाम में अतिरिक्त खाद्यान्न के भंडारण और रख-रखाव पर अलग से कोई खर्च नहीं आता। इस ‘रख-रखाव लागत’ में मुख्यतः ब्याज और भंडारगृह के खर्च शामिल हैं। अतः वर्तमान वित्तीय वर्ष के लिए रु. 5.40 प्रति किलो अनुमानित रख-रखाव लागत उपरोक्त 1.2 करोड़ टन के लिए 6480 करोड़ रुपये आती है। इसे 43100 करोड़ रुपये में से कम करने के बाद खाद्यान्न पर कुल खर्च 36620 करोड़ रुपये आता है।

20 करोड़ परिवारों को 1 किलो दाल मुफ्त देने पर अगर खरीद, भंडारण, दाल-मिल का खर्च, पैकिंग और वितरण का कुल खर्च मिला कर प्रति  किलो दाल पर लागत औसतन 65 रु. माना जाए तो दाल पर कुल खर्च 3900 करोड़ रुपये आएगा। इस तरह से ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना’ के तहत खाद्यान्न और दालों के मुफ्त वितरण पर कुल खर्च 40500 करोड़ आया है जबकि प्रधानमंत्री का दावा 60000 करोड़ रु. के खर्च का है।

जुलाई से नवंबर तक प्रस्तावित 2 करोड़ टन अनाज में से 1 करोड़ टन चावल और 1 करोड़ टन गेहूं पर 64100 करोड़ रु. खर्च होंगे। लेकिन फिर इस 2 करोड़ टन पर रु. 5.40 प्रति किलो रख-रखाव लागत को घटाने पर खर्च 10800 करोड़ रु. कम होकर केवल 53300 करोड़ रु. होगा। इसमें 10 लाख टन दालों पर 65 रु. प्रति किलो के हिसाब से 6500 करोड़ रु. जोड़ने पर कुल खर्च 60000 करोड़ रु. से भी कम आएगा।

इस तरह, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना पर अप्रैल से जून तक के 40500 करोड़ रु. तथा जुलाई से नवंबर तक 60000 करोड़ रु. जोड़ने पर अप्रैल से नवंबर तक इस योजना पर कुल खर्च 105000 करोड़ रु. ही आएंगे, न कि प्रधानमंत्री जी के दावे के मुताबिक 150000 करोड़ रु.।

कुछ ऐसा ही प्रधानमंत्री जी द्वारा 12 मई को 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा के साथ हुआ था। उनकी घोषणा के बाद 13 मई से ही वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा उस ‘भारी-भरकम’ पैकेज की प्रतिदिन की जा रही धारावाहिक व्याख्या और माहात्म्य की पांचवीं और अंतिम कड़ी 17 मई को समाप्त हुई थी। अपनी घोषणा के दौरान ही प्रधानमंत्री जी ने जब बताया था कि इस पैकेज में इससे पहले घोषित राहतें भी शामिल हैं, तभी से अर्थशास्त्रियों ने आशंकाएं व्यक्त करना शुरू कर दिया था कि इस पैकेज का हश्र ‘खोदा पहाड़, निकली चुहिया’ जैसा होने वाला है। आखिरकार वित्तमंत्री जी के धारावाहिक की अंतिम कड़ी तक पहुंचते-पहुंचते उस चुहिया की पूंछ ही बरामद हो सकी थी।

उस बार भी आंकड़ों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हो गया था कि 20 लाख करोड़ रु. के उस घोषित पैकेज में वास्तविक खर्च केवल 194295 हजार करोड़ रु. था, जो कि जीडीपी का 0.975 प्रतिशत था, यानि 1 प्रतिशत से भी कम! शेष रकम तो लिक्विडिटी सुविधाओं को जोड़कर की गई आंकड़ों की बाजीगरी थी।

आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है जिसके कारण सरकार को सामाजिक सेवाओं पर होने वाले खर्च को वास्तविक खर्च से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर बताना पड़ रहा हैॽ

दरअसल समस्या तो यह है कि सरकार खर्च करना नहीं चाहती है लेकिन खर्च करते हुए दिखना जरूर चाहती है। नोटबंदी और जीएसटी के विवेकहीन कदमों के बाद से अर्थव्यवस्था कभी पटरी पर आई ही नहीं। कमजोर अर्थव्यवस्था के कारण खर्च के लिए धन की कमी लगातार आड़े आ रही है। रिजर्व बैंक से पैसे लेने से लेकर पेट्रोलियम पदार्थों पर दुनिया में सबसे ज्यादा टैक्स वसूली के रूप में लूट के बावजूद यह स्थिति बनी हुई है।

बजट घाटे का रास्ता भी सरकार अपनाना नहीं चाहती। जब भी वास्तविक नगदी खर्च होगा तो वह बजट घाटे के रूप में दिखेगा। इस संकट के समय में अर्थव्यवस्था को केवल राजकोषीय घाटे से बचाया जा सकता है ऋण-आधारित वित्तीय प्रावधानों से नहीं। लेकिन सरकार के अर्थशास्त्री लगातार वास्तविक खर्च से बचने का रास्ता निकाल रहे हैं, जिसका नतीजा बेहिसाब मानवीय त्रासदी के रूप में देश भुगत रहा है और न जाने अभी कितनी तबाहियों, मौतों और सिसकियों को झेलेगा।

लिक्विडिटी से समर्थन देना और राजकोषीय खर्च, दोनों अलग-अलग चीजें हैं। अर्थव्यवस्था जब खराब हालत में हो तो राजकोषीय खर्च से ही बाजार में नगदी का प्रवाह बढ़ाकर और मांग पैदा करके उसे सहारा दिया जा सकता है। नगदी से लोगों की क्रय-शक्ति बढ़ती है जिससे कंपनियां लिक्विडिटी के इस्तेमाल के बारे में सोच सकती हैं। इसके लिए आवश्यक है कि राजकोषीय घाटे का रास्ता अपनाते हुए सार्वजनिक खर्च बढ़ाया जाए और मुद्रास्फीति आधारित नीतियां अपनायी जाएं। सरकार यह रास्ता अपनाना नहीं चाहती।

दूसरी समस्या यह है कि प्रधानमंत्री जी ने काफी कोशिश करके जो अपनी ही-मैन वाली छवि गढ़ी है, उसके भ्रम को जनता में बनाए रखने के लिए हमेशा ‘सबसे बड़ा’, ‘सबसे ज्यादा’, ‘दुनिया में पहली बार’ जैसे खोखले वाग्जाल का सहारा लेते रहना एक मजबूरी बन गई है। सभी मोर्चों पर बुरी तरह से असफल होने के बावजूद अभी तक सरकार इस भ्रम को बनाए रखने में सफल है, यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

( लेखक और विश्लेषक शैलेश की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on July 1, 2020 10:53 pm

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