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न्यायपालिका ही नहीं सर्वोच्च सत्ता के भी गले की फांस बन गए हैं प्रशांत

कल सुप्रीम कोर्ट इतिहास का एक और गवाह बन गया। इसके साथ ही जस्टिस अरुण मिश्रा की कोर्ट में भारत के इतिहास से जुड़े दो दृश्य एक साथ खड़े हो गए। जिनका जज के सामने खड़े ‘दोषी’ प्रशांत भूषण से सीधा ताल्लुक था। एक का शारीरिक पक्ष से था और दूसरे का वैचारिक। पहले ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस दृश्य को सामने लाकर खड़ा कर दिया जिसमें प्रशांत भूषण के पिता शांति भूषण देश की सर्वोच्च सत्ता की उस समय की सबसे ताकतवर प्रतिनिधि इंदिरा गांधी से मुखातिब थे। कल उनका बेटा तो था कोर्ट में खड़ा लेकिन मुखातिब था वह देश की सर्वोच्च सत्ता से। दूसरा दृश्य चंपारण का है। जब गांधी जबरन नील की खेती कराये जाने से परेशान किसानों के संघर्ष को नेतृत्व देने के लिए चंपारण गए थे। और प्रशासन ने उन्हें जिले से बाहर जाने का आदेश दिया था।

उन्होंने उसकी नाफरमानी की और जब कोर्ट में पेशी हुई तो उन्होंने सजा के सिलसिले में वही बात कही थी जिसको कल कोर्ट में प्रशांत ने दोहराया। इस तरह से कल सुप्रीम कोर्ट की यह अदालत भारतीयों से ज्यादा ब्रिटिशर की लगने लगी थी। और प्रशांत कोट पैंट वाले गांधी हो गए थे। यह बात केवल लाक्षणिकता तक ही सीमित नहीं रही। प्रशांत द्वारा गांधी को कोट किए जाते ही जजों को भी अपने ब्रिटिशर होने का एहसास होने लगा। जस्टिस मिश्रा ने तत्काल इसका प्रतिवाद भी किया। जब उन्होंने कहा कि ट्वीट से ज्यादा अब प्रशांत भूषण का यह बयान कोर्ट की अवमानना करता है। तो वह इसी बात को कह रहे थे कि उनको ब्रिटिश अदालत के तौर पर पेश किया जा रहा है।

और इस कड़ी में जो बड़ा दृश्य खड़ा हुआ उसमें एक तरफ लंगोटी पहने गांधी का चेहरा था तो दूसरी तरफ गोगल लगाए और डेबिडसन बाइक पर सवार देश की सर्वोच्च अदालत के चीफ जस्टिस एसए बोबडे थे जिनकी तस्वीर पर प्रशांत ने ट्वीट के जरिये टिप्पणी की थी। जो उनके खिलाफ अवमानना का मामला बना।

नैतिक सत्ता के सामने तमाम दूसरी सत्ताएं किस तरह से बौनी हो जाती हैं कल यह बात कोर्ट में बिल्कुल साफ-साफ दिखी। वह सत्ताएं धन की हों या कि बल की या फिर बड़े से बड़े पद की। कल तीनों एक साथ खड़ी होकर भी हार गयीं। देश की सर्वोच्च अदालत थी। उसके साथ केंद्र की सत्ता की ताकत और उसका इशारा था। और कॉरपोरेट खुल कर इन दोनों के पीछे खड़ा था। लेकिन प्रशांत भूषण की नैतिक सत्ता के आगे ये सभी एक साथ भरभरा कर गिर गयीं। शुरू में जस्टिस अरुण मिश्रा इस तरह से पेश आए जैसे वह प्रशांत भूषण को किसी भी कीमत पर सजा सुनाने के लिए आमादा हों।

पुनर्विचार याचिका के साथ ही सजा की सुनवाई के प्रशांत भूषण के वकीलों के निवेदन को खारिज करना इसी का संकेत था। उनको लग रहा था कि प्रशांत भूषण सजा से बचना चाहते हैं लिहाजा एक शेर की मानिंद वह दौड़ा कर उनको सजा के अपने शिकंजे में दबोच लेना चाहते थे। लेकिन प्रशांत भूषण के बयान पढ़ते ही बाजी बिल्कुल पलट गयी। जो प्रशांत कठघरे में खड़े थे और दोषी के तौर पर कोर्ट द्वारा पेश किए जा रहे थे वह अचानक आजाद हो गए।

और फिर कठघरे में प्रशांत नहीं पूरी बेंच दिखने लगी। सामने गांधी थे और बेंच में बैठे थे ब्रिटिशर जज! फिर तो बेंच अपने ऊपर लगे दाग से बचने का रास्ता तलाशने लगी। नतीजतन अगले ही क्षण वह प्रशांत से अपने बयान पर फिर से विचार करने का आग्रह कर रही थी। जो जज साहिबान उसी दिन सजा देने पर आमादा थे अब समय देने की बात करने लगे। लेकिन दूसरी तरफ प्रशांत थे कि हिमालय की तरह अपनी जगह से डिगने के लिए तैयार नहीं।

पुनर्विचार न करने की बात कहने के बावजूद बेंच उन्हें जबरन समय देने पर तुल गयी। दरअसल यह प्रशांत को घेरने नहीं बल्कि खुद को बचाने की तरकीब की तलाश थी। प्रशांत कोर्ट के गले की हड्डी बन गए हैं। और यह मामला अब सत्ता में बैठे शीर्ष लोगों के भी गले की फांस बन गया है। अब तलाश इस बात की हो रही है कि कैसे इस मामले से सम्मानजनक तरीके से निकला जाए।

ऐसा इसलिए है क्योंकि यह मामला अब यहीं तक सीमित नहीं रहेगा। आगे बढ़ा और प्रशांत को जेल हुई तो जेल से बाहर प्रशांत नहीं सत्ता का भस्मासुर निकलेगा। यह बात देश की सत्ता में बैठे लोग अच्छी तरह से जान गए हैं। इस मामले में अभी जबकि कोई संगठित शुरुआत नहीं हुई है तब देश के स्तर पर प्रशांत को मिले जन समर्थन ने इसका ट्रेलर दिखा दिया है। मौजूदा निजाम से ऊबी जनता के लिए प्रशांत सबसे बड़ी उम्मीद की किरण साबित हो सकते हैं। और अगर यह सब कुछ उसी दिशा में आगे बढ़ा तो जो जलजला आएगा उसे रोक पाना सरकार के लिए मुश्किल हो जाएगा।

आखिर ये कौन लोग थे जो कल प्रशांत भूषण को सजा देना चाहते थे। उनके बारे में भी जानना जरूरी है। बेंच की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस अरुण मिश्रा के बीजेपी और उसके नेताओं के साथ एक नहीं हजार बार रिश्तों के आरोप लग चुके हैं। यह बात हमें नहीं भूलनी चाहिए कि जस्टिस मिश्रा ही सुप्रीम कोर्ट के चार जजों की 2018 में हुई प्रेस कांफ्रेंस के केंद्र में थे। जिन मामलों को अपने हिसाब से निपटवाना होता था उसको तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश द्वारा इनकी कोर्ट में पेश कर दिया जाता था।

यह हम नहीं उस समय के इन चारों जजों ने कहा था। लोया मामला भी इनके पास भेजा जाना पांचों वरिष्ठ जजों को नागवार लगा। उन्होंने फिर जनता की अदालत में आने का फैसला किया। जस्टिस बीआर गवई नागपुर के रहने वाले हैं। बताया जाता है कि जज लोया मामले से जुड़े चर्चित ड्राफ्ट को उन तक पहुंचाने में इनकी अहम भूमिका थी। और तीसरे जज जस्टिस कृष्ण मुरारी हालांकि कल चुप्पी ही साधे रहे लेकिन उनके भी रिश्ते इलाहाबाद में रहते संघ से गहरे रहे हैं। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जाने-माने वकील वीकेएस चौधरी के चैंबर से प्रैक्टिस की शुरुआत की थी और वीकेएस चौधरी का पूर्व संघ प्रमुख रज्जू भैइया के साथ सगे भाई से भी ज्यादा गहरा रिश्ता था। यह इलाहाबाद में रहने वाला हर शख्स जानता है। अगर प्रशांत के मामले के लिए इन तीनों जजों की बेंच गठित की गयी थी तो यह बात किसी के लिए समझनी मुश्किल नहीं होनी चाहिए कि आखिर इसके पीछे मकसद क्या था?

दरअसल प्रशांत टेस्ट केस थे। अभी तक उन बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुई हैं जिनके पास उस तरह का न तो जमीनी आधार है और न ही व्यापक समर्थन। लिहाजा उन्हें किसी न किसी झूठे आरोप में गिरफ्तार कर जेल के भीतर रखना आसान था। इस तरह से इस हिस्से को सरकार आसानी से जेल की सींखचों के पीछे डालने में सफल हो गयी। लेकिन अब देश में कुछ ऐसे बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो ह्वेल की हैसियत रखते हैं। उनको छूने का मतलब खुद के विनाश की शुरुआत।

इसमें प्रशांत भूषण से लेकर अरुंधति रॉय शामिल थे। आगे इसमें कुछ और बड़े नाम भी जुड़ते। लिहाजा सत्ता ने शुरुआत प्रशांत से की। और उसका डर जायज था। आज प्रशांत पूरी सत्ता के सामने एक बड़ी चुनौती बन कर खड़े हो गए हैं। इस चुनौती से देश का निजाम कैसे पार पाएगा यह एक सबसे बड़ा सवाल बन गया है? कुछ हो या न हो एक यादगार इतिहास ज़रूर आगे खड़ा है। और कल देश की जनता ने भी इस बात का संकेत दे दिया है कि उसके प्रतिरोध की अभी न तो ताकत खत्म हुई है और न ही लोकतंत्र और संविधान को बचाने की उसकी जिजीविषा। 

(जनचौक के संपादक महेंद्र मिश्र का लेख।)

This post was last modified on August 21, 2020 10:25 am

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