नौटंकी नहीं बल्कि संसद परिसर में झाड़ू के पीछे छुपा है गांधी की “हत्या” का गहरा उद्देश्य

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आज संसद परिसर में एक महा पाखंड देखने को मिला। स्पीकर ओम बिड़ला की पहल पर सत्तारूढ़ दल के मंत्रियों और सांसदों ने पूरे परिसर की झाड़ू लेकर सफाई की। इस दौरान किसी मंत्री के झाड़ू का डंडे से वास्ता टूट गया तो कोई सांसद झाड़ू को हवा में ही लहराता दिखा। यह सब कुछ देखकर एक बात बिल्कुल साफ झलक रही थी कि संसद परिसर को किसी सफाई की जरूरत नहीं है। क्योंकि अगर देश के सबसे साफ सुथरे दो स्थानों को चुनना हो तो कोई भी आंख मूंद कर संसद और राष्ट्रपति भवन का नाम ले लेगा। तब अगर यहां सफाई की जरूरत नहीं थी तो फिर ये लोग कर क्या रहे थे? और इसको क्या नाम दिया जाए।

किसी को लग सकता है कि यह महज नौटंकी है। लेकिन यह बात उतनी सच नहीं है। क्योंकि इसके पीछे एक गहरा उद्देश्य छिपा हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी जब देश की सत्ता संभाले थे तभी उन्होंने इसकी पूरे धूमधाम से शुरुआत कर दी थी। और अब संसद तक इस सफाई अभियान के पहुंच जाने से कम से कम यह कहा जा सकता है कि देश में “स्वच्छता अभियान” का एक चक्र पूरा हो गया। वैसे यह सब कुछ महात्मा गांधी के नाम पर और उनकी 150वीं वार्षिक जयंती के उपलक्ष्य में किया जा रहा है। लेकिन इसकी असली सचाई यह है कि इसके जरिये ही उन्हें खत्म करने की कोशिश की जा रही है। दरअसल इस देश की राजनीति, समाज, व्यवस्था, संस्थाओं से लेकर आम जनमानस की रग-रग में महात्मा गांधी समाए हुए हैं। किसी व्यक्ति से ज्यादा ऐसा उनके सिद्धांतों, मूल्यों और विचारों के चलते है। दक्षिणपंथी ताकतों ने भले ही भौतिक रूप से महात्मा गांधी को मार दिया हो लेकिन विचार अभी भी उनके उसी रूप में न केवल जिंदा हैं बल्कि प्रासंगिक बने हुए हैं। लोगों की जेहनियत से उनको किसी के लिए हटा पाना इतना आसान नहीं था।

पहली बार मोदी के नेतृत्व में केंद्र में जब बीजेपी की पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता आयी तब उसने इस कार्यभार को अपने हाथ में लिया। असत्य, झूठ, हिंसा और अफवाहों को स्थापित करने के लिए सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह को खत्म करना पहली शर्त बन जाता है। और ऐसा करने के लिए उसके प्रतीक पुरुष को हाशिये पर फेंक देना उसकी पहली जरूरत बन जाती है। मोदी ने सत्ता में आते ही सबसे पहला काम यही किया। उन्होंने महात्मा गांधी को उनके सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह जैसे मूलभूत बुनियादी विचारों से काटकर उन्हें सिर्फ स्वच्छता तक सीमित कर दिया। और उसमें भी जब सरकार ने अपना प्रचार अभियान चलाया तो गांधी का चेहरा देने की जगह महज उनके ऐनक से ही काम चला लिया। अनायास नहीं आप जहां भी स्वच्छता संबंधी कोई विज्ञापन देखेंगे उसमें केवल गांधी जी का चश्मा मौजूद होगा। पुराने लोग जो गांधी को देखे या फिर उन्हें पढ़े और जानते हैं वो तो समझ जाएंगे कि यह गांधी के लिए इस्तेमाल किया गया है लेकिन नये लोगों के लिए वह महज एक प्रतीक बनकर रह जाएगा। इस तरह से नये लोगों की जेहनियत में जब गांधी घुसेंगे ही नहीं तो फिर भला उससे निकालने की कहां जरूरत पड़ेगी।

इस बात में कोई शक नहीं कि स्वच्छता अभियान की अपनी जरूरत है। लेकिन उसे भी जिस तरह से संचालित किया गया है उसको लेकर तमाम तरह के सवाल हैं। मसलन उसके लिए जरूरी आधारभूत ढांचे से लेकर सफाई कर्मियों की मौजूदा जीवन स्थितियों में सुधार और दूसरे जरूरी मशीनी उपकरणों की उपलब्धता अभिन्न हिस्से हो जाते हैं। लेकिन इन सब पर गौर किए बगैर पूरा अभियान हवा-हवाई रहा। आज बात इस पर नहीं होगी। यहां बात इसके पीछे छिपे दूसरे उद्देश्यों की हो रही है। अगर ऐसा नहीं होता तो महात्मा गांधी जिसे दुनिया की एक अद्भुत शख्सियत मानी जाती है। और पूरी दुनिया जिनके बताए रास्ते पर चलने की बात करती है। महान वैज्ञानिक आइंस्टाइन ने अनायास नहीं कहा था कि आने वाली पीढ़ियां इस बात पर अचरज करेंगी की इस धरती पर हाड़-मांस का इस तरह का कोई पुतला चला था। यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है कि वह शख्स हमारे मुल्क का था। आज जब दुनिया में हिंसा का बोलबाला है और झूठ और फरेब अपने परवान पर हैं तब महात्मा गांधी की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।

लेकिन उनकी 150वीं सालाना जयंती के मौके पर भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर का आयोजन तो छोड़िए कोई राष्ट्रीय आयोजन तक करना जरूरी नहीं समझा। इससे समझा जा सकता है कि गांधी के प्रति मौजूदा सरकार का क्या रुख है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकार उनके विचारों पर बात नहीं करना चाहती है। और स्वच्छता अभियान के जरिये उनकी जयंती की महज खानापूर्ति कर लेना चाहती है। जिस ओम बिड़ला को इस मौके पर स्पीकर के तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर का कोई आयोजन करना चाहिए था और उसमें देश-विदेश के राष्ट्राध्यक्षों और जानी-मानी शख्सियतों को बुलाना चाहिये था वह अपने सांसदों के साथ परिसर में झाड़ू लगाकर अपनी जिम्मेदारी का इतिश्री कर ले रहे हैं।

दरअसल यह झाड़ू नहीं बल्कि गांधी को परिसर से साफ करने का आखिरी प्रयोजन था। जिसमें झाड़ू कम संघी लाठियां ज्यादा दिख रही थीं। ओम बिड़ला के पास खड़े राजनाथ सिंह समेत दूसरे लोग हाथों में लाठी लेकर शायद इस बात का ऐलान करते दिख रहे थे कि आज उन्होंने गांधी की परिसर से छुट्टी कर उस पर कब्जा कर लिया।

हालांकि गांधी जी की जयंती मनाने के लिए बाकायदा कमेटी बनी हुई है और उसमें पक्ष-विपक्ष से लेकर समाज के विभिन्न हिस्सों के लोग शामिल हैं। लेकिन उसके गठन का मकसद आज तक समझ में नहीं आया क्योंकि अभी तक कोई ऐसा कार्यक्रम उसके द्वारा नहीं किया गया जिस पर लोगों की नजर गयी हो या फिर वह किसी भी रूप में गांधी के विचारों और मौजूदा दौर में उनकी प्रासंगिकता को सिद्ध करती दिखी हो।

वैसे भी गोडसे को अगर जिंदा करना है तो गांधी को मारना ही होगा। उनके विचारों को सात पर्तों की कब्र के भीतर दफनाना होगा। और “स्वच्छता अभियान” यही काम कर रहा है। जिसमें पहले सरकार और अब स्पीकर के नेतृत्व में पूरी संसद उसके साथ खड़ी है। यह भी क्या अजीबोगरीब विडंबना है कि गांधी की दूसरी हत्या के लिए बीजेपी-आरएसएस ने उनकी 150वीं वार्षिक जयंती को चुना।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संस्थापक संपादक हैं।)

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