Friday, October 22, 2021

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अब तालिबान का हुआ अफ़गानिस्तान

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ग़मनाक है शीरमाल और सूखे मेवों, हींग और अपने ईमान के लिए विख्यात पठानों का देश अफ़ग़ानिस्तान भारत की आज़ादी की 75वीं साल गिरह पर लोकतंत्र की बलि चढ़ाकर 15 अगस्त, 2021 को तालिबानियों का देश बन गया। सारी दुनिया पिछले चार माह से तालिबान की ख़ूंख़्वार हरकतें देख रही है। वहां जबकि कथित सुपर पावर अमेरिका की सेनाएं भी मौजूद थीं। भारत का मौन आश्चर्यजनक है।

जबकि भारत से कंधार के कितने पुराने सम्बंध रहे हैं। बचपन में हम सबने देखा है हमारे घरों में पठानों का बेसब्री से इंतजार होता था सूखे मेवे और हींग सालभर के लिए इन्हीं से खरीदी जाती रही। उसके बाद से हींग की ख़ुशबू जाती रही। उन पर बनी भारतीय फिल्मों में उनका व्यक्तित्व आज भी लोगों को लुभाता है। आज भी काबुलीवाला दिल को छू जाता है। सीमांत गांधी की यादें भी बरबस ताज़ा हो आती हैं। वर्तमान में भी भारत सरकार का बहुत सहयोग वहां विकास के लिए मिल रहा था।

कश्मीर की तरह घाटियों में बसे ख़ूबसूरत अफगानिस्तान में बसे लगभग तीन करोड़ मेहनतकश सीधे-सादे पख़्तूनों के बीच मुजाहिदीन और तालिबान ने कैसे पैर फैलाए यह सबके सामने है। इसके पीछे सोवियत रूस का अफ़ग़ानिस्तान को मदद करना , वहां के शासन को संरक्षण देकर प्रगतिशील मूल्यों का विकास ही साम्राज्यवादी ताकतों की आंख की किरकिरी बना। अमरीका ने पाकिस्तान के ज़रिए पहले मुजाहिदीन फिर तालिबान को विकसित किया यह सीधे सीधे कम्युनिस्ट नीतियों पर प्रहार था। फलस्वरूप रुस को अफगानिस्तान से मज़बूरन हटना पड़ा और आगे विभाजन का दंश भी झेलना पड़ा।

विदित हो भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश महिलाओं के लिए एक दशक से लगभग आधुनिकता की ओर हैं लेकिन अफगानिस्तान 1960 में ही आधुनिक बन गया था। यहां की महिलाओं के पास आजादी थी। वे अपने मन से कपड़े पहनती थीं। पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती थीं। लेकिन यह अधिक समय तक नहीं चल सका 1990 से धीरे-धीरे देश में आतंकी संगठन मुजाहिदीन, फिर तालिबान का कहर बढ़ता गया और महिलाओं पर पाबंदियां बढ़ती गईं। साल 1996 के बाद सड़क पर पुरुष ही दिखने लगे क्योंकि महिलाओं को घर में कैद कर दिया गया। तब से अब तक हालात जस के तस थे। लेकिन यह अधिक समय तक नहीं चल सका 1990 से धीरे धीरे देश में आतंकी संगठन मुजाहिदीन , 1996 में गृह युद्ध के दौरान बड़े पैमाने पर अपराध और भ्रष्टाचार को चुनौती देने के लिए अपने दर्जनों अनुयायियों के साथ मुल्ला उमर ने तालिबान की स्थापना की। पश्तो में तालिबान का शाब्दिक मतलब है ‘छात्र’ है। ये शब्द संस्थापक सदस्यों मुल्ला मोहम्मद उमर के छात्र होने का एक संदर्भ है। समूह ने मूल रूप से तथाकथित ‘मुजाहिद्दीन’ लड़ाकों को अपनी ओर आकर्षित किया, जिन्होंने 1980 के दशक में तत्कालीन USSR बलों को अफगानिस्तान से बाहर खदेड़ दिया था।

इसके बाद तालिबान ने 1996 में अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया। पांच सालों तक तालिबान ने देश पर सरकार भी चलाई। वहीं, 2001 में अमेरिकी सैनिकों ने अफगानिस्तान में घुसपैठ की और तालिबान को सत्ता से बाहर कर दिया। अमेरिका की वजह से मुल्ला मोहम्मद उमर छिप गया। वहीं, इस घटना के बाद से ही तालिबान पश्चिमी बलों को अफगानिस्तान से बाहर करने और सत्ता पर काबिज होने के लिए प्रयास कर रहा है। यहां यह बात महत्वपूर्ण है कि नाटो सेनाएं और अफ़गानिस्तान सरकार सिर्फ काबुल और एयरपोर्ट तक ही सीमित रही हैं शेष अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान पहले से काबिज रहा है।

तालिबान के एक अधिकारी ने कहा है कि विद्रोही संगठन जल्द ही काबुल स्थित राष्ट्रपति परिसर से अफगानिस्तान को इस्लामी अमीरात बनाने की घोषणा करेगा। बता दें कि ग्यारह सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद, अमेरिका नीत बलों द्वारा अफगानिस्तान से तालिबान को अपदस्थ करने के लिए शुरू किए गए हमलों से पहले भी आतंकी संगठन ने युद्धग्रस्त देश का नाम इस्लामी अमीरात अफगानिस्तान रखा हुआ था। तालिबान के अधिकारी ने कहा कि अफगानिस्तान को जल्द ही काबुल स्थित राष्ट्रपति परिसर से इस्लामी अमीरात बनाने की घोषणा की जाएगी।

विचारणीय बिन्दु यह है कि अमेरिका ने नाटो और अपनी सेनाओं के साथ मिलकर वहां क्या किया? क्योंकि जिस बात का ढिंढोरा पीटा गया कि वहां आतंक का खात्मा किया जाएगा वह तो इतना फैल पसर गया कि बीस साल बाद फिर सत्ता पर काबिज़ हो गया। देश की दबी कुचली जनता फिर शरीयत की शरण में पहुंचा दी गई। बाईंसवीं सदी की स्त्री एक बार फिर बर्बर और क्रूर  तालिबान की मुट्ठी में आ गई। सबसे अफ़सोसनाक तो यह कि आतंक मिटाने और लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाल करने वाले दुम दबाकर अपने लाव लश्कर के साथ भाग खड़े हुए। दुनिया का दादा का दावा करने वाला अमेरिका ऐसे कैसे  भाग सकता है? कतिपय लोगों का ख़्याल है उसने तालिबान को सत्ता सौंपने के एवज में बड़ी डील की है। जिसकी बुनियाद ट्रम्प ने तालिबान नेताओं के साथ कतर में समझौता किया था, में रखी गई कि सितंबर में अमेरिका और नाटो सेनाओं की वापसी हो जाएगी। बहरहाल अमेरिका ने इराक के आतंकवाद के नाम पर यही खेल खेला और उसे आईएसआईएस के जिम्मे सौंपा और यहां तालिबान के।

इस घटना को सहजता से नहीं लेना चाहिए। इसके पीछे भारतीय प्रायद्वीप में जहां आतंकवाद छुटपुट रूप में विद्यमान है, को अफ़ग़ान तालिबान से ताकत मिलेगी। पाकिस्तान मज़बूत होने की कोशिश करेगा साथ ही साथ हमारा कश्मीर जो इन दिनों सरकार द्वारा दिए दर्द को गुपचुप सह रहा है उसे गलत दिशा मिल सकती है क्योंकि तालिबान अब भारत के सिर पर सवार हो चुका है। चिंतक जगदीश्वर चतुर्वेदी मानते हैं कि इस ख़तरे को देखते हुए मोदी सरकार को तुरंत सचेत होकर जम्मू-कश्मीर की जनता की इच्छानुसार पूर्ण राज्य का दर्जा देकर वहां चुनाव कराकर लोकतंत्र कायम करना चाहिए। वे मानते हैं कि बिना जनता के सहयोग के तालिबान नहीं पनप सकता लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के ज़रिए पंजाब में जैसे आतंकवाद को समाप्त किया वैसे कश्मीर में होना चाहिए।

बहरहाल, अमेरिका की नीतियों को समझते हुए उससे दूरी रखना ज़रूरी है। अटल जी की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने नेहरू जी द्वारा बनाई विदेश नीति से छेड़छाड़ नहीं की। उम्मीद की जा सकती है कि तालिबान की सत्ता वापसी में अमेरिका का पूरा हाथ होने की स्थिति में अपनी विदेश नीति में परिवर्तन किया जाएगा और धर्मनिरपेक्ष ताकतों के साथ भारत हमेशा की तरह खड़ा होकर दुनिया को सुदृढ़ नेतृत्व प्रदान करेगा।

(सुसंस्कृति परिहार स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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