अब आरटीआई को भी दफ्न करने की तैयारी

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RTI एक्ट प्रतीकात्मक चिन्ह।

संसद में RTI एक्ट को लागू कराने वाले CIC और SIC के अधिकार क्षेत्र में संशोधन करने के लिए 19 जुलाई को बिल पेश किया गया है।

बताया जा रहा है कि सरकार चाहती है कि इनके कार्यकाल की अवधि जो अब तक 5 साल थी और इनके वेतन और अन्य भत्ते सुविधाएं जो मुख्य चुनाव आयुक्त या राज्य के चीफ सेक्रेटरी के समान हैं, को बदला जाए और इन पर पूरा अधिकार केंद्र सरकार का हो।

देखने में यह एक छोटी सी सामान्य प्रक्रिया लग सकती है। लेकिन इसके पीछे का मकसद बहुत ही घातक होने जा रहा है। लाखों RTI कार्यकर्ताओं के लिए यह किसी आघात से कम नहीं।

आपको मुझको भी एक नजर में लगेगा कि क्या हो जायेगा अगर RTI को भी यह मोदी सरकार खा जाएगी जब सीबीआई, सीवीसी, सीएजी और लोकपाल को पहले ही यह खा गई है?

तमाम संवैधानिक संस्थाएं जिसमें न्यायपालिका और प्रेस भी है अब सब नतमस्तक हैं तो खाली RTI से ही क्या हो जायेगा?

लेकिन शायद हम भूल कर रहे हैं। ये तमाम संस्थाएं पहले भी थीं, लेकिन UPA-1 के दौरान RTI लाकर एक तरह से कांग्रेस भी कहीं न कहीं पछताई और उसे लगा कि इस तरह के स्वतंत्र अधिकार देकर देश भर में राशन से लेकर वित्त मंत्री तक इस दायरे में आ गए, नागरिक अधिकार के रूप में चुनाव में वोट देने से भी अधिक महत्वपूर्ण अधिकार अगर किसी एक बिल ने दिया तो वह RTI ही थी, जिसे आजाद भारत में जनता के लिए सबसे हितकारी बिल पास करना कह सकते हैं।

कल अगर CIC या SIC को पता होगा कि उसके राजनैतिक आका ही उसके tenure का निर्धारण करेंगे और जैसे ही कहीं उसके खिलाफ सूचना अगर RTI से बाहर निकाल दी, तो उसकी गर्दन मरोड़ दी जाएगी तो RTI फाइल करने वाले जो 40 लाख लोग हैं, वे घट कर अपने आप कुछ लाख या हजार रह जायेंगे। यह संस्था भी अन्य संस्थाओं कि तरह सिर्फ दिखाने के दांत के रूप में इस लोकतंत्र को कमजोर, बर्बाद ही करेगी और नागरिक अधिकारों की अंतिम आस भी खत्म हो जाएगी।

अंत में एक कोई लोकपाल कुछ महीने पहले नियुक्त किये गए हैं। उनका अता पता किसी को है? मुझे भी अभी याद आया।

इस विषय पर तमाम जनसंगठन अपना अपना विरोध और प्रदर्शन शुरू कर चुके हैं, विपक्ष भी इस संसोधन के खिलाफ एकजुट है। आखिर यह बिल हम 125 करोड़ लोगों के हित के लिए ही आया था और उसके पर कतरे जाने से इसका असर अंत में भारत के उन गरीबों मजलूमों और सामान्य जन पर ही पड़ेगा।

जिस भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के बल पर 2014 में मोदी सरकार बनी थी, आज हमारा गुस्सा किसी गटर में क्यों जा गिरा है, इस पर हमें सोचना चाहिए और अधिक से अधिक बोलना चाहिए, लिखना चाहिए, आखिर अंत में स्वीकार तो कर ही लीजिये कि ये देश आपका भी है, और अगर कुछ अच्छा नहीं कर सकते तो बुरा होने से रोकने की सन्मति तो दे ही सकते हैं?

(ये टिप्पणी रविंद्र पटवाल की है जो स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और सोशल मीडिया पर एक सक्रिय भूमिका निभाते हैं।)

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