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आइने में उत्तर-पूर्व-2: बीजेपी के गले की फांस बन गयी है असम में एनआरसी

गुवाहाटी। यहां के हिंदी अखबार ‘पूर्वांचल प्रहरी’ में सिंगल कॉलम की खबर यह है कि ऑल इंडिया बंगाली आर्गेनाईजेशन के सदस्यों ने सरकारी दफ्तर के बाहर धरना दिया और सरकार पर आरोप लगाया कि सरकार ने अधिकांश बंगाली हिंदुओं को षड्यंत्र पूर्वक एनआरसी के जरिए विदेशी घोषित करा दिया है और कई को बेवजह डिटेंशन सेंटरों में डाल दिया है। यहां आकर जिस बात का खुलासा हुआ वो यह कि जितनी नफरत भाजपा मुसलमानों से नहीं करती उससे ज्यादा असम के लोग बंगालियों से करते हैं। इसीलिए भाजपा का खेल यहां बिगड़ा है।

एनआरसी की पहली लिस्ट में 40 लाख लोगों पर संदिग्ध बांग्लादेशी होने की तोहमत कुछ तकनीकी खामियों की वजह से लगी थी और कुछ आसामी अफसरों और कर्मचारियों की बदमाशी थी, जो मुसलमानों को अपना मान सकते हैं मगर बंगालियों को नहीं। दैनिक पूर्वोदय के संपादक और संस्थापक रवि शंकर रवि ने बताया कि जब असमी अफसरों और कर्मचारियों के हाथ में ताकत थी, तो उन्होंने बंगालियों के कागजात में जानबूझकर गड़बड़ की।

वे कागजात में भाषा वाला हिस्सा देखते थे और जहां किसी की मातृभाषा असमी की बजाय बंगाली लिखी देखते थे उसे संदिग्ध लोगों की सूची में डाल देते थे। बंगाली और असमी का झगड़ा बहुत पुराना, अंग्रेजों के समय का है। सबसे पहले यहां बाहर से आकर बसने वाले हिंदुस्तानी बंगाली थे जिन्हें अंग्रेज लाए थे। इनके बीच भाषा और संस्कृति को लेकर संघर्ष चलता है। तो इस तरह जब असमी  कर्मचारियों ने बंगालियों को संदिग्ध बता दिया तो विदेशियों की संख्या 40 लाख पर पहुंच गयी।

वास्तविक बांग्लादेशी मुसलमान इसलिए एनआरसी के जाल में आने से रह गए क्योंकि जब वह आते थे तो सबसे पहले कागज बनवाते थे, कागज बनवा कर राशन कार्ड लेते थे। फिर राशन कार्ड के आधार पर मतदाता सूची में नाम जुड़वा लेते थे और अपनी मातृभाषा बंगाली की बजाए असमी लिखवाते थे। इसी वजह से वे बचने में कामयाब रहे। एनआरसी की पहली सूची में जिन 40लाख लोगों को विदेशी घोषित किया गया उसमें ऐसे भी लोग बहुत थे जो दूसरे प्रांतों से यहां आकर रह रहे थे। ऐसे लोग तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिले और उन्हें समझाया कि एनआरसी की प्रक्रिया में जो खामी है उसकी वजह से अपने ही देश के अन्य प्रांतों के लोग विदेशी घोषित कर दिए गए हैं।

इसके बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक एप्लीकेशन देकर प्रक्रिया में सुधार कराया जिसके तहत अन्य  प्रांतों से यहां आने वाले को केवल एक ऐसा कोई सर्टिफिकेट देना होता था जिससे वह भारत का नागरिक साबित होता हो। इस प्रक्रिया में वह सारे बंगाली भी नागरिक घोषित हुए जिन्हें असमी कर्मचारियों ने शरारत करते हुए संदिग्ध बांग्लादेशी बना दिया था।

एनआरसी के नतीजों से सबसे ज्यादा निराश ऑल इंडिया असम स्टूडेंट यूनियन है जिसे आसू भी कहा जाता है। आसू ने जिन जिन लोगों को असम से बाहर करने के लिए यह आंदोलन चलाया था वे सारे लोग भारत के पक्के नागरिक बन बैठे हैं और अब असम में रहना भी उनका कानूनी और संवैधानिक अधिकार हो गया है। इसीलिए एनआरसी का विरोध असमी लोग भी कर रहे हैं। जो 19 लाख लोग सूची से बाहर हैं उनमें असम के आदिवासी इलाकों के भी बहुत से लोग हैं यानी आसू के अपने लोग। कुल मिलाकर एनआरसी भाजपा के गले की फांस तो कम से कम असम में बन ही गई है।

(गुवाहाटी से दीपक असीम की रिपोर्ट।)

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