27.1 C
Delhi
Wednesday, September 29, 2021

Add News

सेना से लेकर बीएसएफ, रॉ और ईडी अफसरों के नंबर भी पेगासस सूची में

ज़रूर पढ़े

पेगासस प्रोजेक्ट में लीक डेटाबेस की पड़ताल के बाद सामने आया है कि आधिकारिक नीति को चुनौती देने वाले दो कर्नल, रॉ के ख़िलाफ़ केस दायर करने वाले एक रिटायर्ड इंटेलिजेंस अफसर, बीएसएफ के अधिकारियों और ईडी के अधिकारी और उसके परिजनों के नंबर उस सूची में हैं, जिनकी पेगासस स्पायवेयर के ज़रिये संभावित निगरानी की योजना बनाई गई थी।

पेगासस प्रोजेक्ट, जिसमें द वायर भी शामिल है ने 27 जुलाई,21 को खुलासा किया है कि सर्विलांसिंग से जुड़े लीक हुए डेटाबेस में सेना, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के अधिकारियों के भी नंबर शामिल हैं। इनकी निगरानी किए जाने की संभावना है। निगरानी की इस संभावित सूची में पूर्व बीएसएफ प्रमुख केके शर्मा, बीएसएफ के पुलिस महानिरीक्षक जगदीश मैथानी, रॉ के वरिष्ठ अधिकारी जितेंद्र कुमार ओझा (अब रिटायर्ड), कर्नल मुकुल देव के नंबर शामिल हैं।

फ्रांस स्थित मीडिया नॉन-प्रॉफिट फॉरबिडेन स्टोरीज ने सबसे पहले 50,000 से अधिक उन नंबरों की सूची प्राप्त की थी, जिनकी इजराइल के एनएसओ ग्रुप द्वारा निर्मित पेगासस स्पायवेयर के जरिये निगरानी किए जाने की संभावना है। इसमें से कुछ नंबरों की एमनेस्टी इंटरनेशल ने फॉरेंसिक जांच की, जिसमें ये पाया गया कि इन पर पेगासस के जरिये हमला किया गया था। फॉरबिडेन स्टोरीज ने इस ‘निगरानी सूची’ को द वायर समेत दुनिया के 16 मीडिया संस्थानों के साथ साझा किया, जिन्होंने पिछले एक हफ्ते में एक के बाद एक बड़े खुलासे किए हैं। इस पूरी रिपोर्टिंग को ‘पेगासस प्रोजेक्ट’ का नाम दिया गया है।

भारत में संभावित निगरानी के दायरे में रहे पत्रकारों, नेताओं, मंत्रियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, जांच एजेंसी के अधिकारियों, कश्मीर के नेताओं इत्यादि के बाद अब सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों के नाम भी सामने आए हैं। दस्तावेजों से पता चलता है कि इन लोगों पर निगरानी करने की योजना ऐसे समय पर बनाई गई जब वे किसी संवेदनशील कार्य या योजना से जुड़े हुए थे।

केके शर्मा उस समय सुर्खियों में छा गए थे जब 11 फरवरी 2018 को उन्होंने बतौर बीएसएफ प्रमुख कलकत्ता में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े एक संगठन के कार्यक्रम में भाग लिया था। इसे लेकर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने काफी नाराजगी जाहिर की थी और पार्टी के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने ट्वीट कर कहा था कि वे इस मामले को केंद्रीय गृह मंत्रालय तक ले जाएंगे। इस घटनाक्रम के करीब एक महीने बाद शर्मा के नंबर को उस सूची में डाल दिया गया, जिनकी संभावित निगरानी की योजना बनाई गई थी।

चूंकि शर्मा के फोन का फॉरेंसिक परीक्षण नहीं किया गया है, इसलिए स्पष्ट रूप से ये बता पाना संभव नहीं है कि उनकी वाकई में निगरानी की गई थी या नहीं। हालांकि इस सूची में इनके तीन नंबरों का पाया जाना ये दर्शाता है कि निगरानी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। शर्मा के रिटायर होने के बाद चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव के दौरान उन्हें पश्चिम बंगाल और झारखंड का केंद्रीय पुलिस पर्यवेक्षक बनाया था। हालांकि टीएमसी ने आरएसएस संगठन के कार्यक्रम में उनकी भागीदारी का हवाला देते हुए इसका कड़ा विरोध किया। इसके चलते दो दिन बाद आयोग ने उन्हें हटाकर उनके जगह विवेक दुबे नाम के एक अन्य रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी की नियुक्ति कर दी थी।

इसी तरह निगरानी सूची में बीएसएफ के पुलिस महानिरीक्षक जगदीश मैथानी का भी नाम देखने को मिलता है।इनका नंबर भी शर्मा के समय ही इस सूची में डाला गया था।मैथानी इस समय असम में तैनात किए गए हैं और वे केंद्रीय गृह मंत्रालय के व्यापक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली (सीआईबीएमएस) परियोजना या स्मार्ट फेंसिंग से जुड़े रहे हैं।इकोनॉमिक टाइम्स की साल 2018 की रिपोर्ट के अनुसार सीआईबीएमएस का कंसेप्ट मैथानी द्वारा ही विकसित किया गया था। शर्मा और मैथानी, दोनों ने ही द वायर के भेजे गए सवालों का जवाब नहीं दिया।

इस संभावित निगरानी के निशाने से खुफिया एजेंसी रॉ भी अछूती नहीं है। इसमें रॉ के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी जितेंद्र कुमार ओझा और उनकी पत्नी के नंबर शामिल हैं।साल 2013 और 2015 के बीच ओझा दिल्ली में रॉ की अकादमी में भारतीय जासूसों को प्रशिक्षण देते थे। हालांकि साल 2018 में उन्हें समय पूर्व पद से हटा दिया गया था, जिसे उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (कैट) चुनौती दी।

यहां से जितेंद्र कुमार ओझा को राहत नहीं मिली, जिसके बाद उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया, जहां फिलहाल उनका मामला लंबित है। फर्स्टपोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक ओझा को संभवत: मौजूदा रॉ प्रमुख सामंत गोयल के चलते हटाया गया था। उन्होंने द वायर से कहा कि यह पूरी तरह आपराधिक मामला है, खासकर मेरी पत्नी के फोन को निगरानी के दायरे में लाना। मुझे संदेह है कि यह कार्य आपराधिक अधिकारियों के इशारे पर मुझ पर मनोवैज्ञानिक दबाव लाने के उद्देश्य से किया जा रहा है, लेकिन मैं अपना केस लड़ता रहूंगा।

इनके साथ ही सेना के कम से कम दो अधिकारियों के नंबर इस संभावित निगरानी की सूची में शामिल हैं। इसमें से एक कर्नल मुकुल देव हैं, जो कि उस समय खबरों में आ गए थे, जब उन्होंने साल 2017 में सरकार द्वारा शांति क्षेत्रों में तैनात अधिकारियों के लिए मुफ्त राशन खत्म करने के आदेश को लेकर रक्षा सचिव को क़ानूनी नोटिस भेजा था। वे उस समय जोधपुर स्थित 12 कोर में डिप्टी जज एडवोकेट जनरल के पद पर तैनात थे।

उन्होंने कहा कि मुझे यह जानकर आश्चर्य है कि ऐसा हो सकता है। मेरी नजर में इसका एकमात्र कारण यह है कि उन्हें शायद यह पसंद नहीं आया कि मैंने लगातार भारतीय सेना की भलाई के लिए आवाज उठाई। इस सरकार में जो भी वास्तविक चिंताएं उठाता है, उसे संदेह की नजर से देखा जाता है।

इसके अलावा सेना के कानूनी विभाग में तैनात रहे कर्नल अमित कुमार का भी नंबर इस सूची में दर्ज है।कुमार को अगस्त 2018 में जम्मू और कश्मीर के मुख्यालय में एक कानूनी अधिकारी के रूप में तैनात किया गया था।निगरानी डेटाबेस में उनका नंबर आने से कुछ महीने पहले उन्होंने 356 सैन्यकर्मियों की ओर से सशस्त्र बल (विशेष बल) अधिनियम (आफ्स्पा) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने दलील दी थी कि मानवाधिकार की आड़ में आतंकी कृत्य में शामिल लोगों को बचाने का कार्य नहीं किया जाना चाहिए। आफ्स्पा अशांत या उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में सेवारत सैन्य कर्मियों को अभियोजन से सुरक्षा प्रदान करता है।

कुमार ने कहा कि उन्हें पता था कि 2020 से उन पर नजर रखी जा रही है, लेकिन यह जानकर हैरान हैं कि ये सब 2018 में ही शुरू हो गया था।उन्होंने द वायर को बताया कि मैं देशद्रोही नहीं हूं। उन्हें मेरे फोन से क्या मिलेगा? मेरा फोन देशभक्ति से भरा पड़ा है।इसमें कुछ और नहीं है।उन्होंने यह भी कहा कि वह समझ सकते हैं कि सुरक्षा एजेंसियां राष्ट्रीय सुरक्षा के कारणों से निगरानी करती हैं।कुमार ने कहा कि लेकिन फिर भी उन्हें पहले कानून के अनुसार आवश्यक अनुमति लेनी चाहिए। उन्होंने मार्च 2021 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी।

द वायर के मुताबिक ईडी के अधिकारी राजेश्वर सिंह के दो फोन नंबर और उनके परिवार की तीन महिलाओं के नंबर फ्रांस की संस्था फॉरबिडन के डेटाबेस पर मिले हैं। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के निजी सहायक के रूप में काम कर चुके पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी वीके जैन भी पेगासस के निशाने पर थे। लीक हुए रिकॉर्ड में पीएमओ और नीति आयोग में काम करने वाले कम से कम एक-एक अधिकारी के नंबर भी इसमें मिले हैं।

इस बीच द गार्डियन के अनुसार फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने कथित तौर पर पेगासस स्पाइवेयर की मदद से उनकी जासूसी के संबंध में इजरायल के प्रधानमंत्री नफ्ताली बैनेट से बात की है। यह बातचीत इजरायली कंपनी एनएसओ द्वारा निर्मित स्पाइवेयर, पेगासस की मदद से मोरक्को की खुफिया एजेंसी द्वारा फ्रांसीसी राष्ट्रपति की संभावित जासूसी के मामले से संबंधित थी।

मैक्रों ने इजरायल सरकार द्वारा “ठीक से जांच” सुनिश्चित कराने के लिए नफ्ताली बैनेट को यह कॉल किया था।फोन कॉल में मैक्रों ने चिंता व्यक्त की कि उनका खुद का फोन और उनके अधिकांश कैबिनेट सदस्यों का फोन पेगासस से संक्रमित हो सकता है। पेगासस प्रोजेक्ट के तहत खुलासे में यह बात सामने आई है कि फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों और उनके कैबिनेट के कई सदस्यों का फोन मोरक्को की खुफिया एजेंसी द्वारा सर्विलांस के संभावित टारगेट लिस्ट में डाला गया था।

एनएसओ ग्रुप ने कहा है कि मैक्रों उसके किसी भी कस्टमर के टारगेट नहीं थे। यानी कंपनी ने इस बात से इंकार किया है कि पेगासस की मदद से फ्रांसीसी राष्ट्रपति की जासूसी हुई है। कंपनी का कहना है कि सिर्फ टारगेट लिस्ट में नंबर होने से यह स्पष्ट नहीं है कि पेगासस की मदद से उनकी निगरानी की गयी थी या नहीं।

उधर, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने आरोप लगाया कि भारत सरकार दुनिया की इकलौती ऐसी सरकार है जिसे पेगासस जासूसी मामले पर कोई फिक्र नहीं है। पूर्व वित्त मंत्री ने चिदंबरम ने ट्वीट किया कि फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने इज़रायल के प्रधानमंत्री बेनेट को फोन किया और फ्रांस में फोन हैक करने के लिए पेगासस स्पाइवेयर के कथित इस्तेमाल के बारे में पूरी जानकारी की मांग की। इसमें राष्ट्रपति का फोन भी शामिल है।

उन्होंने आरोप लगाया कि एकमात्र सरकार जिसे कोई फिक्र नहीं है वह भारत सरकार है! क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकार जासूसी के बारे में पूरी तरह से अवगत थी और उसे इज़राइल या एनएसओ समूह से किसी और जानकारी की आवश्यकता नहीं है? उनका कहना है कि अभी तक सरकार की तरफ से ये नहीं कहा गया है कि उसने पेगासस की खरीद की थी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ये स्पाईवेयर सिर्फ सरकारों को ही बेचा जा सकता था।

 (वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

  

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवानी कांग्रेस में शामिल

"कांग्रेस को निडर लोगों की ज़रूरत है। बहुत सारे लोग हैं जो डर नहीं रहे हैं… कांग्रेस के बाहर...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -

Log In

Or with username:

Forgot password?

Forgot password?

Enter your account data and we will send you a link to reset your password.

Your password reset link appears to be invalid or expired.

Log in

Privacy Policy

Add to Collection

No Collections

Here you'll find all collections you've created before.