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भावुकता के मुद्दों पर चुनाव तो जीते जा सकते हैं, सरकार नहीं चलायी जा सकती

दिल्ली के निज़ामुद्दीन दरगाह के पास स्थित मरकज का एक मामला आज बहुत अधिक चर्चा में रहा। कहा जा रहा है कि वहां तबलीगी जमात के लोगों ने कोई जलसा किया और फिर वे देश के विभिन्न कोनों में गए जहां कोविड 19 वायरस का प्रसार हुआ। मरकज के संयोजक का कहना है कि जो जमावड़ा हुआ था उसके बारे में उन्होंने 25 मार्च को थाना निज़ामुद्दीन को सूचित कर दिया था और फिर 26 मार्च को एसडीएम और फिर एसडीएम के कहने पर 27 मार्च को तहसीलदार ने वहां दौरा किया था। अब जब यह बात मीडिया में आयी तो सरकार सक्रिय हुयी और संयोजक सहित कुछ लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ। जांचें की गयीं और उनको क्वारन्टीन किया जा रहा है। आज की यह सबसे बड़ी खबर थी और यह खबर कोरोना प्रकोप से आसन्न चिंता से अधिक हिंदू-मुस्लिम एजेंडे पर थी जो देश के परंपरागत न्यूज़ चैनलों का स्थायी भाव बन गया है।

एक बात स्पष्ट है कि जब दुनिया भर में यह घातक वायरस तबाही फैला रहा है तब मरकज के संयोजक को ऐसे आयोजनों से दूर हो जाना चाहिए था। तबलीगी जमात एक इस्लाम के प्रचार के लिये 1927 में हरियाणा में बना एक संगठन है जिसकी शाखाएं दुनिया भर के इस्लामी देशों में हैं। यह मूलतः इस्लाम को उसके मूल रूप में जानने की बात करते हैं और एक प्रतिगामी धार्मिक संगठन है। निज़ामुद्दीन में तबलीगी जमात का अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय है। यहां बराबर इनकी गतिविधियां चलती रहती हैं। लेकिन जब जनवरी में ही कोरोना प्रकोप की आहट मिल चुकी थी तब मरकज को इस आयोजन को रद्द कर देना चाहिए था, जो मरकज ने नहीं किया। अब जाकर यह मरकज खाली कराया गया है। इसमें गलती मरकज की भी है और लापरवाही पुलिस तथा दिल्ली सरकार की भी है क्योंकि उन्हें 25 मार्च को ही यह खबर हो गयी थी।

कुछ मुख्य बातें हैं जिनका उल्लेख यहां किया जाना ज़रुरी है। 21 दिनी लॉक डाउन का निर्णय सरकार का है और यह सरकार की जिम्मेदारी थी कि वह इसे कैसे सफलीभूत करेगी इसकी एक योजना बनाए और उसे लागू करे। 24 मार्च को शाम जब 8 बजे प्रधानमंत्री जी हम सबसे रूबरू हुए और हमारी चिंता करते हुए अचानक 21 दिन के तालाबंदी लॉक डाउन की जब घोषणा कर दी तो क्या पहले सरकार ने यह नहीं सोचा था कि,

● देश मे तमाम पर्यटन स्थलों, मंदिरों, दरगाहों, तीर्थों, और भारत भर में तमाम जगहों पर तीर्थ यात्री, पर्यटक, और अन्य जनता भी रात 12 बजे के बाद जहां है वहीं फंस जाएगी तो उनको वहां से निकलने की सरकार की कोई कार्य योजना है भी या नहीं ?

● ऐसे लोगों के पास सीमित धन होता है जो अनजान शहरों में होते हैं, अलग जगह, अलग भाषा आखिर ऐसे कठिन समय में कैसे उन्हें उनके घर पहुंचाया जाएगा, जबकि यातायात के सारे साधन यकायक बंद हो गए हैं ?

● बहुत से लोग छोटे-छोटे शहरों से दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता आदि बड़े शहरों में इलाज के लिये गए हैं। वहां उनके पास गंभीर रोग से पीड़ित मरीज हैं। उनको आसानी से घरों पर लाना भी आसान नहीं है। कभी मरीज जब गंभीर रोग से अस्पताल में हो तो उसके तीमारदार से मिल कर बात करें तो इस व्यथा का अंदाज़ा होगा आप को। कभी आप सबको ऐसी कठिन परिस्थिति में पड़ने का दुर्भाग्य न हो, यह मेरी प्रार्थना है। पर ऐसी स्थिति में सरकार के पास कोई कार्य योजना थी या यह सब दिमाग में ही नहीं यह निर्णय घोषित करते आया था ?

● सीमित पर्यटन वीसा पर भारत में आये विदेशी लोग, जो किसी भी कार्य से आये होंगे और जिनकी वीज़ा अवधि 25 मार्च के बाद खत्म हो रही है और जिन्हें यह पता ही नहीं है कि 25 से 21 दिनी लॉक डाउन शुरू हो जाएगा, और जब ऐसी स्थिति में सारे आवागमन बंद हो जाएंगे तो जब उनके वीजा की अवधि बीत जाएगी, जिसमें उनकी कोई गलती नहीं है तो वे अपने वीजा की अवधि को बढ़वाने के लिये क्या करेंगे ? क्या सरकार ने ऐसी परिस्थिति की कल्पना की थी और अगर की भी थी तो इससे निपटने के लिये कोई कार्य योजना सरकार द्वारा बनाई गयी थी ?

● जब ऐसे लंबे लॉक डाउन की घोषणा होती है तो उसके पहले से ही आवश्यक वस्तुओं के आपूर्ति, अस्पताल,  बिजली, जल और अत्यंत ज़रुरी काम से निकलने वालों के लिए पास आदि की समस्या हल की जाती है। बिजली और जल के आपूर्ति की तो पहले से ही व्यवस्था होती ही रहती है और इनकी जमा खोरी सम्भव भी नहीं है, पर आवश्यक वस्तुओं विशेषकर सब्जी, दूध और खाद्यान्न आदि की व्यवस्था और यह सब कैसे घर-घर पहुंचाई जाए इसका तंत्र बनाना पड़ता है। हालांकि यह इंतज़ाम बाद में भी कुछ समस्याओं के साथ हो जाता है, पर अगर यही बात पहले से ही पता हो जाए तो उसे और बेहतर तरीक़े से किया जा सकता है।

हालांकि यह बात सरकार कह रही है और यह सच भी है कि उसने धार्मिक स्थल और अन्य जमावड़े वाले स्थानों को 16 मार्च से ही बंद करना शुरू कर दिया था पर इन आदेशों को न तो जनता ने गंभीरता से लिया और न ही सरकार ने ही लागू कराया। 22 मार्च का जनता कर्फ्यू तो शाम को 5 बजे एक उत्सव में तब्दील हो गया। जुलूस निकले। लोग सड़कों पर कोरोना मुक्ति का जश्न मना रहे थे। यह लापरवाही दोनों ही तरफ से हुई और अब यह निज़ामुद्दीन का मामला सामने आ गया। बार-बार सरकार के कहने के बाद भी लॉक डाउन और सोशल डिस्टेंसिंग की बात लोग मान नहीं रहे हैं।

आप इस पर विचार करें और या खुद सोंचे कि क्या इतना बड़ा निर्णय लेने के पहले जनता को क्या क्या कष्ट झेलना पड़ सकता है, यह सोचा गया था ? कोरोना का 30 जनवरी को केरल में पहला मामला मिलने के समय से ही, चल रहा है। जबकि यह लॉक डाउन 22 मार्च को पहली बार और 24 मार्च की रात 12 बजे से अब तक चल रहा है। इतना समय किसी भी व्यवस्था के लिये कम नहीं होता है। हम किसी  राजतंत्र से शासित देश में, नहीं रह रहे हैं कि सम्राट ने ताली बजाई और कहा तखलिया और सब सिर झुका कर चले गए।

देश के हर थाने में होटल, सराय, धर्मशाला आदि की सूची होती है। वहां से यह सूची जिले स्तर पर एकत्र कर के उन सबको कहा जा सकता था कि घर जाओ, लम्बा लॉक डाउन चलेगा। विदेशी पर्यटकों का विवरण इमिग्रेशन में होता है। विदेशी नागरिकों के आने जाने रुकने की सूचना अनिवार्यतः होटल, धर्मशाला वालों को स्थानीय थानों में देनी पड़ती है। वहां से भी सारी सूचनाएं मिल सकती हैं। यह कवायद जब 22 मार्च का थाली ताली मार्का जनता कर्फ्यू लगा था, के पहले से ही क्यों नहीं शुरू कर दी गयी ?

हमको और आप को यह भले ही पता न हो कि कब यह लॉक डाउन लगेगा और कब तक प्रभावी रहेगा, पर सरकार को तो यह बात पहले से ही पता होगी कि ऐसा निर्णय हो सकता है। तभी यह सब होमवर्क कर लिया जाना चाहिए था, जो नहीं किया गया। आखिर, चुनाव,  कुंभ मेले, अन्य बड़े अधिवेशन आदि की तैयारियां हम करते ही हैं। वे सब शानदार तरह से निपटते भी हैं। फिर इसमें बिना तैयारियों के, कैसे यह घोषणा 24 मार्च की रात में 12 बजे से 21 दिन का लॉक डाउन हो जाएगा, कर दी गई ?

यही कारण है कि सभी राज्य सरकारों के अधिकारी अब किसी तरह से यह सब सम्भाल रहे हैं। वे रात दिन सड़कों पर हैं। उनकी मेहनत में कोई कमी नहीं। लेकिन, इतने बड़े और पूरे देश को एक साथ बंद करने के पहले समस्त राज्यों के मुख्य सचिवों और डीजीपी साहबान की मीटिंग होनी चाहिए थी और एक एक सम्भावना पर विचार कर उसके समाधान की तैयारी कर लेनी चाहिए थी। न तो अफसरों की काबिलियत में कमी है और न ही किसी के इरादे में कोई खोट है, बस एक एडवांस प्लानिंग की ज़रूरत थी, जहां सरकार चूक गयी । अब अगर कोई एडवांस प्लानिंग पहले से की गयी हो तो, फिर वह विफल कैसे हो रही है, यह भी देखना और जानना  ज़रूरी है।

एक कटु सत्य यह है कि, चुनाव जिन एजेंडों से जीते जा सकते हैं, उन्ही एजेंडों पर सरकार नहीं चलायी जा सकती है। चुनाव दिल और भावनाओं को भड़का कर जीते जा सकते हैं पर सरकार तो मस्तिष्क के प्रयोग, विवेक, दक्षता और प्रबंधन कुशलता से ही चलाई जा सकती है।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर हैं और आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

This post was last modified on March 31, 2020 11:37 pm

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