Wednesday, October 27, 2021

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सब ज्यूडिस होने के नाम पर विरोध के अधिकार को नकारा नहीं जा सकता:जस्टिस लोकुर

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उच्चतम न्यायालय के पूर्व जज जस्टिस मदन बी लोकुर ने कहा है कि उच्चतम न्यायालय को स्पष्ट करना चाहिए कि कोर्ट जाने से विरोध के अधिकार को नकारा नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय को यह याद रखना चाहिए कि किसान विदेशी नहीं हैं, दुश्मन नहीं हैं और भले ही उनकी शिकायत वैध न हो, आपको उनकी बात सुननी चाहिए और ऐसी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए जो पूर्वकल्पित राय या पूर्व-कैथेड्रा निर्णयों पर आधारित हो।

जस्टिस लोकुर ने किसानों के आंदोलन पर उच्चतम न्यायालय के एक मौजूदा जज जस्टिस एएम खानविलकर की उन टिप्पणियों का जोरदार खंडन किया है जिसमें जस्टिस खानविलकर ने कहा था कि अगर आपने इसी मुद्दे को अदालत में चुनौती दी है तो विरोध करने के अधिकार की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

एक समाचार पोर्टल को दिए एक साक्षात्कार में, जस्टिस लोकुर ने कहा कि जस्टिस खानविलकर ने सोमवार को जो कहा वह दिसंबर 2020 में भारत के तत्कालीन चीफ जस्टिस एसए बोबडे द्वारा उठाए गए रुख के विपरीत है। उन्होंने अदालत से स्थिति स्पष्ट करने को कहा क्योंकि अन्यथा लोग और सरकार भ्रमित हो जायेंगे।

जस्टिस लोकुर ने यह भी कहा कि हालांकि विरोध का अधिकार पूर्ण अधिकार नहीं है, क्योंकि संविधान के लिए यह शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के होना आवश्यक है, फिर भी यह सबसे महत्वपूर्ण अधिकारों में से एक है और इसे अन्य तरीकों से नकारने की कोशिश गंभीर समस्याएं पैदा करेगी।

उन्होंने कहा कि यदि कोई किसान अदालत में जाता है, कृषि कानूनों को चुनौती देता है, तो क्या यह अन्य सभी किसानों को इस मामले पर विरोध करने से रोकता है? मुझे ऐसा नहीं लगता। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अदालत गया है, उसे देश के हर किसान का प्रतिनिधित्व करने वाला नहीं कहा जा सकता है। उन्होंने कहा, संविधान या कानून में ऐसा कुछ भी नहीं है जो विरोध को सिर्फ इसलिए रोकता है क्योंकि अदालत ने मामले का संज्ञान ले लिया है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि आप दोनों चीजें कर सकते हैं। अब, मान लीजिए कि कोई संगठन अदालत में जाता है, क्या वह देश के सभी किसानों का प्रतिनिधित्व करता है? संभावना नहीं है। वास्तव में, इसके सदस्य विरोध क्यों नहीं जारी रख सकते? क्यों नहीं?अब मान लीजिए कि मामला एक जनहित याचिका में उठाया गया है। क्या वह जनहित याचिका वास्तव में देश में सभी का प्रतिनिधित्व करती है? क्या यह हर किसी को विरोध करने से रोकता है? मैं ऐसा नहीं कहूंगा।

जस्टिस लोकुर ने कहा कि आप इसे किसी भी तरह से देखें, चाहे वह कोई व्यक्ति हो या कोई संगठन या एक जनहित याचिका जो अदालत में गई हो, ऐसा कुछ भी नहीं है जो अन्य किसानों को विरोध करने से रोकता है।

गौरतलब है कि दो न्यायाधीशों की पीठ का नेतृत्व कर रहे जस्टिस खानविलकर ने कहा था कि जब आप पहले ही कानून को चुनौती दे चुके हैं, तो आपको विरोध करने की अनुमति क्यों दी जानी चाहिए? पिछले साल दिसंबर में तीनों कृषि कानूनों पर स्टे पारित करते तत्कालीन चीफ जस्टिस बोबडे ने कहा था कि हम स्पष्ट करते हैं कि यह अदालत सवाल के विरोध में हस्तक्षेप नहीं करेगी। वास्तव में, विरोध करने का अधिकार एक मौलिक अधिकार का हिस्सा है।

भारतीय संविधान नागरिकों को विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार देता है। हालांकि प्रदर्शन शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से होना चाहिए और नागरिकों की गतिविधि व सरकारी कामकाज में बाधा नहीं आनी चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने पिछले कुछ सालों में लगातार लोकतंत्र में विरोध के अधिकार को लेकर अपनी राय जाहिर कर चुका है। पिछले साल भी दिसंबर के समय जब जंतर-मंतर के बाहर धरना – विरोध प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, तब भी उच्चतम न्यायालय ने उसे उठा लिया था। तब कोर्ट ने कहा था कि नागरिकों के सभा करने और विरोध करने के अधिकार पर पूरी तरह बंदिश नहीं लगाई जा सकती है।

उच्चतम न्यायालय लगातार कहता रहा है कि शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन करना, किसी भी नागरिक का मौलिक अधिकार है। ये किसी भी तरह से उनसे छीना नहीं जा सकता। कार्यपालिका या न्यायपालिका, किसी भी कार्रवाई के जरिए इस अधिकार को वापस नहीं ले सकती।पिछले साल और उससे पहले भी कई मौकों पर उच्चतम न्यायालय धरना और प्रदर्शन रोकने को लेकर पुलिस को लताड़ा लगा चुका है।

संविधान का अनुच्छेद 19 (1) (बी) के अनुसार नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के जमा होने का अधिकार है। उच्चतम न्यायालय पिछले कुछ सालों में ऐसे मामलों पर लगातार कहता रहा है कि शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन करना, किसी भी नागरिक का मौलिक अधिकार है। कार्यपालिका या न्यायपालिका उनसे यह अधिकार नहीं छीन सकती।

मौलिक अधिकारों के तहत इसका इस्तेमाल करने के साथ ये भी जरूरी है कि कानूनों का उल्लंघन न हो। संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (अ) में अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार दिया गया है। वहीं, इसी अनुच्छेद के तहत 19 (1) (इ) में नागरिकों को अपनी मांगों के समर्थन में शांतिपूर्ण विरोध के लिए एक जगह इकट्ठा होने का भी अधिकार है।

विरोध प्रदर्शन में किसी भी तरह की हिंसा नहीं होनी चाहिए। इसके साथ ही प्रदर्शन के लिए पहले से अनुमति जरूरी होती है। इसको लेकर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग व्यवस्था बनाई गई है। हालांकि कुछ नियम कायदों का ध्यान रखना जरूरी है। जैसे धरना प्रदर्शन से पहले पुलिस या प्रशासन इजाजत और अनापत्ति प्रमाणपत्र लेना जरूरी है।

इलाके की शांति को खतरा, तनाव या हिंसा की संभावना पर पुलिस या प्रशासन मना कर सकता है। पुलिस को धरना प्रदर्शन के उद्देश्य, जगह, तारीख, समय-सीमा, लोगों की संख्या आदि बताना आवश्यक है। अनुमति लेने वाले को नाम, पता आदि पहचान के जरूरी दस्तावेज, फोटो और मोबाइल नंबर देना जरूरी है।

संविधान के अनुच्छेद 19(1)(3) के तहत इस पर विशेष परिस्थितियों में कई तरह की पाबंदिया लगाने का भी प्रावधान है। मसलन, राज्य या राष्ट्र की सुरक्षा और देश की एकता-अखंडता को खतरा हो। आम जनजीवन प्रभावित होने का खतरा हो। अदालत की अवमानना होने की स्थिति में और पड़ोसी देशों के साथ संबंध प्रभावित होने की स्थिति में विरोध प्रदर्शनों पर पाबंदियां लगाई जा सकती है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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