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Thursday, September 16, 2021

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नाराजगी ममता से सजा अलापन को, पीएम ने मुख्य सचिव को 48 घंटे में दिल्ली किया तलब

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स्वाधीनता आंदोलन के दौरान लोग अक्सर गांधी जी से कहा करते थे कि वह सेना और पुलिस को सरकार का आदेश नहीं मानने की अपील करें। गांधीजी ने इससे इंकार करते हुए कहा था कि यह एक गलत नजीर बन जाएगी। उन्होंने कहा था कि कभी तो आजादी मिलेगी, देश की अपनी सरकार होगी पर नौकरशाही तो यही होगी। अगर ऐसा करते हैं तो सरकार के आदेश को नहीं मानना उनकी आदत में शुमार हो जाएगा जो लोकतंत्र के लिए घातक होगा। अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे पढ़ा होता तो उनका कार्यालय पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव के तबादले का आदेश शायद नहीं देता।

 पीएमओ कार्यालय से शनिवार की शाम को अलापन बंद्योपाध्याय को आदेश दिया गया कि वे सोमवार को नॉर्थ ब्लॉक में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं। गौरतलब है कि बंद्योपाध्याय 31 मई को सेवानिवृत्त हो जाएंगे लेकिन कोविड की परिस्थितियों को देखते हुए उनका कार्यकाल तीन माह के लिए बढ़ा दिया गया है। यह आदेश 24 मार्च को राज्य सरकार की सिफारिश पर केंद्र सरकार द्वारा दिया गया था।

इस सिफारिश के पीछे राज्य सरकार की दलील थी कि अलापन बंद्योपाध्याय पिछले एक साल से कोविड के प्रबंधन से जुड़े हुए हैं। कोविड के इस दूसरे चरण के संक्रमण के दौरान उनका सेवानिवृत्त होना और उनके स्थान पर किसी दूसरे को मुख्य सचिव की जिम्मेदारी सौंपना मुनासिब नहीं होगा। अब पीएमओ के कार्यालय के इस आदेश के मद्देनजर क्या यह मान लें कि पश्चिम बंगाल कोविड के संक्रमण से पूरी तरह मुक्त हो चुका है। अब बंगाल में अलापन बंद्योपाध्याय की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है। सच तो यह है कि यह तबादला प्रशासनिक आवश्यकता के लिहाज से नहीं बल्कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से नाराजगी का हिसाब चुकाने के लिए किया गया है। तो क्या मोदी सरकार के लिए कोविड का संक्रमण और इससे रोजाना पश्चिम बंगाल में सौ से अधिक हो रही मौत उनके गुरूर के मुकाबले कोई मायने नहीं रखती है। यह उस सरकार का आदेश है जो कोविड का वैक्सीन तो उपलब्ध करा नहीं पा रही है और कोविड का तीसरा दौर दस्तक देने लगा है।

अलापन बंद्योपाध्याय।

राज्य सरकार के अफसरों को सामान्य दिनों में केंद्र सरकार में तबादला किए जाने की परंपरा रही है। पर इसके साथ कुछ औपचारिकता भी जुड़ी है। मसलन जिस अफसर को आप लेना चाहते हैं उसकी सहमति भी ली जाती है। राज्य सरकार के मुख्यमंत्री से भी इस पर सहमति ली जाती है। पर यहां ऐसा कुछ नहीं किया गया और शनिवार को शाम ढलते ही पीएमओ कार्यालय का आदेश आ गया। सबसे हैरानी की बात तो यह है कि जिस अफसर की नियुक्ति केंद्र सरकार में की जा रही है उसका कार्यकाल भी कुल तीन माह रह गया है। सच तो यह है कि अलापन बंद्योपाध्याय को बलि का बकरा बनाया गया है।

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चक्रवाती तूफान से हुए नुकसान का हवाई सर्वेक्षण करने के बाद ओडिसा होते हुए कलाई कुंडा पहुंचे थे। यहां पहले से ही उनकी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ बैठक होनी तय थी। इस बैठक में राज्यपाल के साथ ही  केंद्रीय मंत्री देवर्षि चौधरी के उपस्थित रहने का कार्यक्रम था। इसके बाद अचानक इस बैठक में शामिल होने के लिए विधानसभा में विपक्ष के भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी को भी आमंत्रित कर लिया गया। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के बीच होने वाली बैठक में विरोधी दल के नेता को शामिल करने की परंपरा कभी नहीं रही है। अमफन के समय जब मोदी की ममता बनर्जी के साथ बैठक हुई थी तो तत्कालीन कांग्रेस के विरोधी दल के नेता अब्दुल मन्नान को आमंत्रित नहीं किया गया था। यानी चक्रवाती तूफान से हुए नुकसान का आकलन करते समय भी प्रधानमंत्री को बंगाल में भाजपा को स्थापित करने की फिक्र सता रही थी। दबी जुबान से ही सही लेकिन भाजपा के प्रदेश स्तर के नेता भी मान रहे हैं कि शुभेंदु अधिकारी को इस बैठक में आमंत्रित करने का कोई औचित्य नहीं था।

अब यहीं आकर गांधीजी की टिप्पणी का ख्याल आता है। ममता बनर्जी ने बैठक में हिस्सा नहीं लिया और दीघा चली गईं। उनके साथ ही अलापन बंद्योपाध्याय भी चले गए और यही बात मोदी को नागवार लग गई। और यही मुनासिब भी था क्योंकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अलापन बंद्योपाध्याय की तत्कालिक बॉस हैं।  बहरहाल चर्चा है कि हो सकता है यह मुद्दा भी हाईकोर्ट में जाए। सवाल होगा कि क्या जिस अफसर का कार्यकाल सिर्फ तीन माह रह गया है उसे उसकी सहमति के बगैर स्थानांतरित किया जा सकता है। क्या कोविड के इस संक्रमण के दौर में सर्वाधिक जिम्मेदार अफसर का तबादला किया जा सकता है। वह भी तब जब इसी संक्रमण का हवाला देते हुए उसका कार्यकाल बढ़ाया गया हो। सुब्रत मुखर्जी और फिरहाद हकीम आदि की गिरफ्तारी के बाद लगे झटके से भाजपा अभी उबर भी नहीं पाई थी कि दूसरा झटका खाने के लिए तैयार हो गई।

(कोलकाता से वरिष्ठ पत्रकार जेके सिंह की रिपोर्ट।)

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