Saturday, January 22, 2022

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मानसून सत्र के आचरण के लिये 12 सांसदों के निलंबन पर विपक्षी सांसदों का लोकसभा और राज्यसभा से वाकआउट

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12 सांसदों के निलंबन को लेकर विपक्षी नेताओं ने संसद परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा पर विरोध प्रदर्शन किया। राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू द्वारा 12 विपक्षी सांसदों के निलंबन को रद्द करने की मांग को खारिज करने के बाद विपक्षी सांसदों ने लोकसभा और राज्यसभा से वाकआउट किया। राज्यसभा सभापति के फैसले के बाद कांग्रेस सांसदों ने सदन की कार्यवाही का बहिष्कार किया है, हालांकि टीएमसी के सांसद सदन में मौजूद हैं। शिवसेना और आप के सांसदों ने भी बहिष्कार किया है।

मानसून सत्र के आचरण के लिये निलंबन

बता दें कि राज्यसभा के अगस्त में हुए मॉनसून सत्र के दौरान ‘अशोभनीय आचरण’के लिए 12 सदस्यों को सोमवार को वर्तमान शीतकालीन सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित कर दिया गया। आज़ाद भारत के उच्च सदन के इतिहास में ऐसी सबसे बड़ी कार्यवाही है। उपसभापति हरिवंश की अनुमति से संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने इस सिलसिले में एक प्रस्ताव रखा, जिसे विपक्षी दलों के हंगामे के बीच सदन ने मंजूरी दे दी।

कल संसद सत्र के पहले ही दिन राज्यसभा के 12 सदस्य पूरे सत्र से निलंबित कर दिए गए थे। इनमें कांग्रेस के 6, शिवसेना और टीएमसी के 2-2 जबकि सीपीएम और सीपीआई के 1-1 सांसद शामिल हैं- फुलो देवी नेताम, छाया वर्मा, आर बोरा, राजमणि पटेल, सैयद नासिर हुसैन और अखिलेश प्रताप सिंह (कांग्रेस), प्रियंका चतुर्वेदी और अनिल देसाई (शिवसेना), शांता छेत्री और डोला सेन (टीएमसी), एलमरम करीम (सीपीएम) और विनय विश्वम (सीपीआई) शामिल हैं।

बता दें कि पिछले मानसून सत्र के दौरान 11 अगस्त को राज्यसभा में पेश किये गए इंश्योरेंस बिल पर चर्चा कराने की मांग को लेकर ही विपक्ष व सत्ता पक्ष के सदस्यों के बीच तीखी झड़प और खींचातान हुई थी। तब सरकर ने हालात पर काबू पाने के लिए मार्शलों को सदन में बुलाया था। उन मॉर्शलों ने विपक्षी दलों के सांसदों को मारा पीटा भी था।

इससे पहले 2020 में आठ सांसदों को निलंबित किया गया था, जो दूसरी सबसे ज्यादा संख्या थी। इनमें डेरेक ओ ब्रायन (तृणमूल कांग्रेस), संजय सिंह (आम आदमी पार्टी), राजीव सातव (कांग्रेस), केके नागेश (माकपा), सैयद नासिर हुसैन (कांग्रेस), रिपुन बोरा (कांग्रेस), डोला सेन (तृणमूल कांग्रेस) और इलामारम करीम (माकपा) शामिल हैं। साल 2010 में राज्यसभा से सात सदस्यों को निलंबित किया गया था।
वरिष्ठ नेता एवं स्वतंत्रता सैनानी राज नारायण को राज्यसभा से चार बार निलंबित किया गया था, जबकि उपसभापति रहे गोदे मुहारी को दो बार उच्च सदन से निलंबित किया गया था।

सांसदों का निलंबन नियम मुताबिक नहीं है

इससे पहले शीतकालीन सत्र के दूसरे दिन राज्यसभा की कार्यवाही शुरू हुई तो खड़गे ने नियमों का हवाला देकर कहा कि सांसदों के निलंबन का कोई आधार नहीं है, इसलिए उनके निलंबन का फैसला वापस लिया जाना चाहिए। खड़गे ने सभी 12 विपक्षी सांसदों को सदन की कार्यवाही में भाग लेने की अनुमति सभापति से मांगी। फिर सभापति ने विपक्ष से कहा कि निलंबन की कार्रवाई उनकी नहीं, बल्कि सदन की थी। संसदीय नियम की धारा 256 की उपधारा 2 का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि 256(2) कहता है कि सदन में किसी सदस्य या कई सदस्यों के अमर्यादित आचरण पर सभापति ऐसे सदस्य या सदस्यों का नाम लेकर सदन के सामने प्रश्न रखें कि क्या इन सदस्यों पर कार्रवाई का प्रस्ताव लाया जा सकता है?

इस तरह, किसी भी राज्यसभा सदस्य के निलंबन के दो ही मानदंड हैं, पहला- निलंबन से पहले सभापति ऐसे सदस्यों का नाम लें, उसके बाद ही निलंबन प्रस्ताव लाया जा सकता है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रक्रिया उसी तारीख तक प्रासंगिक होगी जिस दिन सदस्यों का अमर्यादित व्यहार सामने आया। लेकिन, कल संसदीय कार्य मंत्री ने जो निलंबन प्रस्ताव लाया था, उसका संदर्भ पिछले सत्र से है। इस मामले में उस दिन सभापति ने किसी भी सदस्य का नाम नहीं लिया था। ऐसे में घटना के महीनों बाद निलंबन प्रस्ताव लाना संसदीय नियम के खिलाफ है।

निलंबन वापसी पर राज्यसभापति ने सीधे तौर पर इनकार किया

राज्यसभा के 12 सांसदों के निलंबन वापसी से राज्यसभापति ने सीधे तौर पर इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि फैसला नियमों के तहत ही था। सभापति वेंकैया नायडू ने निलंबन वापसी की विपक्ष की मांग पर यह स्पष्ट करते हुये कहा कि सांसद अपने किए पर पछताने की बजाय, उसे न्यायोचित ठहराने पर तुले हैं। ऐसे में उनका निलंबन वापस लेने का सवाल ही नहीं उठता है।

सभापति वेंकैया नायडू ने कहा कि राज्यसभा अनवरत चलने वाला सदन है। इसका कार्यकाल कभी खत्म नहीं होता है। उन्होंने कहा, ‘राज्यसभा के सभापति को संसदीय कानून की धाराओं 256, 259, 266 समेत अन्य धाराओं के तहत अधिकार मिला है कि वो कार्रवाई कर सकता है और सदन भी कार्रवाई कर सकती है। कल की कार्रवाई सभापति की नहीं, बल्कि सदन की थी। सदन में इस संबंध में प्रस्ताव लाया गया जिसके आधार पर कार्रवाई हुई है।’ उन्होंने कहा कि कार्रवाई को अलोकतांत्रिक बताना गलत है, बल्कि यह लोकतंत्र की रक्षा के लिए जरूरी है। सभापति ने कहा कि उन्होंने लीक से हटकर कोई फैसला नहीं लिया है। नियमों और पूर्व के उदाहरणों के आलोक में ही कार्रवाई की गई है। 10 अगस्त को इन सदस्यों ने सदन की मर्यादा भंग की।

सभापति ने कहा, ‘आपने सदन को गुमराह करने की कोशिश की, आपने अफरा-तफरी मचाई, आपने सदन में हो-हंगामा किया, आसन पर कागज फेंका, कुछ तो टेबल पर चढ़ गए और मुझे ही पाठ पढ़ा रहे हैं। यह सही तरीका नहीं है। प्रस्ताव पास हो गया है, कार्रवाई हो चुकी है और यह अंतिम फैसला है।’ उन्होंने कहा कि सांसद अपने अर्मयादित व्यवहार पर पश्चाताप करने के बजाय वो इसे उचित ठहरा रहे हैं, इसलिए मुझे नहीं लगता कि विपक्ष की मांग पर विचार किया जाना चाहिए। सभापति ने कहा कि सांसदों का निलंबन वापस लेने का कोई सवाल ही नहीं उठता है। सभापति ने कहा कि निलंबित सदस्य बाद में सदन में आएंगे और उम्मीद है कि वो सदन की गरिमा और देशवाशियों की आकांक्षा का ध्यान रखेंगे।

लोकसभा दोपहर 2 बजे तक स्थगित

मंगलवार को लोक सभा की कार्यवाही शुरू होते ही विरोधी दलों ने राज्य सभा सांसदों के निलंबन के मसले पर गतिरोध करना शुरू कर दिया। गतिरोध के बीच स्पीकर ने प्रश्नकाल चलाने की कोशिश की। लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने हंगामा करने वाले सांसदों पर नाराज़गी जताते हुए सांसदों से प्रश्नकाल चलने देने की अपील की। लेकिन विरोधी दलों का गतिरोध जारी रहा और इसे देखते हुए लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने सदन की कार्यवाही को दोपहर 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया।

लोकसभा सदन स्थगित होने के बाद मीडिया से बात करते हुए कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि राज्य सभा सांसदों के निलंबन के ख़िलाफ़ कांग्रेस और अन्य विरोधी दलों ने लोकसभा से वाकआउट किया है। वहीं इस पर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी का कहना है कि आखिर माफ़ी किस बात की।
(जनचौक ब्यूरो की रिपोर्ट।)

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