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हाथरस गैंगरेप: “हम दलित हैं और यही हमारा पाप है….हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे गांव छोड़ दें”

हाथरस। हमेशा जब वह 50 वर्षीय शख्स स्थानीय स्टोर पर जाता है तो दुकानदार उसे कुछ दूरी पर खड़े रहने को कहता है और वह जो भी खरीदता है उसको वह एक कोने से पकड़ता है। ऊपरी जातियों की गालियां उनके लिए इतनी सामान्य हैं कि उन्हें उसका डंक महसूस भी नहीं होता है।

दलितों की चुप्पी के पीछे एक और कारण है। हाथरस के जिस गांव में 19 वर्षीय इस दलित बच्ची के साथ इस बर्बर घटना को अंजाम दिया गया है उसमें वाल्मीकि परिवारों की संख्या महज 15 है। 600 परिवारों में आधे ठाकुर हैं और बाकी में 100 ब्राह्मण हैं। उनके लिए श्मशान घाट अलग-अलग हैं। उन्हें स्थानीय मंदिर में जाने की इजाजत नहीं है। स्थानीय स्कूल से लेकर ऊपर तक अधिकारी ऊंची जाति के हैं।

हालांकि बच्ची पर बर्बर हमला राष्ट्रीय खबर बन गयी है लेकिन इंडियन एक्सप्रेस ने जिन परिवारों से बात किया उनका मानना था कि इससे कोई बदलाव नहीं आने जा रहा है। कुछ के पास ही जमीन है। और ज्यादातर ऊपरी जाति के किसानों के यहां मजदूरी करते हैं।

19 वर्षीय बच्ची की मां ने बताया कि उनका कोई पड़ोसी जिसमें ज्यादातर ठाकुर और ब्राह्मण हैं, अपनी सांत्वना तक देने नहीं आया। उन्होंने बताया कि “हम उनके खेतों से चारा इकट्ठा करते हैं। मैंने सोचा कि कम से कम एक बार तो वो आएंगे।”

बच्ची की एक चाची ने बताया कि जिस तरह से उसको जलाया गया उसको लेकर वो सब चकित हैं। “मेरे पास भी लड़किया हैं….पुलिस ऐसा कभी नहीं करती अगर महिला ठाकुर होती।”

25 वर्षीय महिला याद कर बताती है कि कैसे उसके शादी के दिन उसकी डोली को मुख्य सड़क पर नहीं जाने दिया गया था। “मेरे परिवार को बहुत लंबा रास्ता तय करना पड़ा था। मैं चिल्ला-चिल्ला कर रोना चाहती थी लेकिन मेरे परिवार ने बताया कि यह सामान्य है और हमें समझौते करने सीखने होंगे।”

एक दूसरी महिला ने बताया कि मौत में भी उनके साथ भेदभाव होता है। जब उसकी मां मरी तो वह कुछ समय के लिए उसके शव को बाहर रखना चाहते थे। “हमारा घर छोटा है। लेकिन उन लोगों ने ऐसा नहीं करने दिया। मेरी बहन ने मुझे शांत किया।” आगे उसने बताया कि “यहां तक कि वो हमारी तरफ देखते भी नहीं हैं। उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं है कि हम मर रहे हैं या फिर हमारा बलात्कार हो रहा है।”

इस घटना ने उनके इस डर को फिर से जिंदा कर दिया है कि उनके बच्चों के लिए भी अब कुछ नहीं बदलने जा रहा है।

पीड़िता की चिता।

एक किसान ने बताया कि “मेरे पास दो बेटे हैं जिनकी उम्र 10 और 5 साल है। वो हाथरस में एक सरकारी स्कूल में जाते हैं। वो अक्सर इस बात की शिकायत करते हैं कि उनके सहपाठी दलित और अछूत होने के चलते उनसे बात नहीं करते हैं। मैं चाहता हूं कि वो पढ़ाई करके इस गांव को छोड़ दें। उन्हें वह काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए जिसको उनके माता-पिताओं ने किया। वो उससे बेहतर के लायक हैं। लेकिन हम क्या कर सकते हैं? अध्यापक, पुलिस और प्रशासन- सभी कोई ब्राह्मण है या कोई ठाकुर।”

इन आरोपों पर स्कूल के अधिकारी टिप्पणी करने से इंकार कर देते हैं।

एक महिला ने बताया कि यहां तक कि वो स्थानीय पंचायत तक नहीं जा सकते हैं। “आप कैसे आशा करते हैं कि हमारी समस्याएं हल होंगी जब हमें बैठक तक में हिस्सा लेने की इजाजत नहीं है? अगर हम हिस्सा लेने की कोशिश करते हैं तो वो हमें घर जाने के लिए कहते हैं।”

गांव के प्रधान इस तरह की किसी जातीय तनाव की बात से इंकार करते हैं। यह कहते हुए कि जो इस बात का आरोप लगा रहे हैं वह सब झूठा है। उन्होंने दावा किया कि पंचायत सबके लिए है। उन्होंने कहा कि “मैं सबके लिए तो नहीं बोल सकता हूं लेकिन मैं इस तरह की किसी घटना का गवाह नहीं रहा हूं। मैं लोगों से बगैर उनकी जाति का ध्यान दिए बात करता हूं और उनकी शिकायतें भी सुनता हूं……यह एक शांतिपूर्ण जगह है”

19 साल की बच्ची के साथ क्या हुआ था इसके बारे में पूछे जाने पर प्रधान कहते हैं कि “आदमी निर्दोष हो सकते हैं। मैं इस बात को समझता हूं कि परिवार को चोट पहुंची है लेकिन उन्हें आरोप लगाने से पहले जांच के पूरी होने तक इंतजार करना चाहिए।”

लेकिन महिला के घर पर उम्मीद मर रही है। ठीक उसी तरह से जैसे श्मशान पर वह जली है। उसकी भाभी जिसके वह बेहद करीब थी, ने बताया कि “हम दलित हैं और यही हमारा पाप है”।

(इंडियन एक्सप्रेस से साभार।)

This post was last modified on October 4, 2020 12:10 pm

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Published by
Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi