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बाहर कोरोना मारेगा, घर के अंदर भूख

प्रधानमंत्री के कल के राष्ट्र के नाम संबोधन के बाद यह बात स्पष्ट हो गयी है कि लोग अब मरने के लिए अभिशप्त हैं। बाहर कोरोना मारेगा और अंदर भूख। नहीं तो प्रधानमंत्री को यह बात ज़रूर साफ़ करनी चाहिए कि क्या वह केवल इस देश के उन 15 फ़ीसदी लोगों के प्रधानमंत्री हैं जो धन-साधन हर तरीक़े से सक्षम हैं। अगर नहीं तो फिर 21 दिन के लॉक डाउन के दौरान गरीब और उसका परिवार क्या खाएगा और कैसे ज़िंदा रहेगा इसके बारे में उन्हें ज़रूर बताना चाहिए था। पीएम दो-दो बार राष्ट्र को संबोधित कर चुके हैं। एक बार कर्फ़्यू लगवाने के बाद उन्होंने थाली पिटवाया और दूसरी बार जब जनता से मुख़ातिब हुए तो उन्होंने उसी कर्फ़्यू को 21 दिन के लिए आगे बढ़ा दिया है। लेकिन देने के नाम पर जनता को धेला नहीं दिया। न तो आर्थिक पैकेज और न ही किसी तरह के सहयोग की कोई अन्य घोषणा।

इस बात में कोई शक नहीं कि लोगों के बीच आपस की दूरी और पूरी तरह से एक दूसरे से अलगाव ही इस बीमारी को ख़त्म करने का सबसे कारगर जरिया है। इसमें जनता कर्फ़्यू हो या फिर लॉक डाउन दोनों बेहद सक्षम माध्यम हैं। और इनका पूरी तरह से पालन किया जाना चाहिए। अपने तरीक़े से जनता इस काम को कर भी रही है। लेकिन इस मामले में सरकार के स्तर पर जो चीजें होनी चाहिए उनके अभाव ने पूरे मामले को बेमानी बना दिया है।

अगर यह कहा जाए कि इन घोषणाओं ने स्थितियों को बनाने की जगह और बिगाड़ने का काम किया है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। मसलन दो दिन की तैयारी के बाद हुए पहले संबोधन में लोगों को यह उम्मीद थी कि पीएम मोदी जनता के तमाम हिस्सों के लिए राहत पैकजों की घोषणा करेंगे और हर स्तर पर सरकार और उसका पूरा महकमा साथ खड़ा दिखेगा। जैसा कि कोरोना प्रभावित फ़्रांस से लेकर इंग्लैंड और दक्षिण कोरिया से लेकर कनाडा तक की सरकारों ने किया है। लेकिन उस दिन जब पीएम जनता कर्फ़्यू के बाद शाम को थाली पिटवाने की घोषणा तक सीमित रहे तो लोगों की उम्मीदों पर पानी फिर गया।

ख़ासकर वह हिस्सा जो रोज़ कमाने और फिर उसी को खाने की स्थितियों में रहता है, पूरी तरह से निराश हो गया। उसी के बाद देश के बड़े मेट्रो से लेकर दूसरे शहरों में रह रहे प्रवासी मज़दूरों के बीच अफ़रातफ़री मच गयी। और भारी तादाद में लोग अपने घरों की ओर लौटना शुरू कर दिए। इसका नतीजा यह हुआ कि जो कोरोना अभी तक शहरों और उच्च-मध्य वर्गों तक सीमित था उसने गाँवों और ग़रीबों तक में अपना प्रसार कर लिया। निचले स्तर पर गाँवों और विभिन्न सुदूर के इलाक़ों से आने वाली छिटपुट रिपोर्टें बता रही हैं कि वहाँ किस कदर इसका प्रसार हो गया है।

सरकार का पहला और एकमात्र कर्तव्य था कि वह कोरोना को उसकी जगह ही रोक देती। और उसके लिए वह हर ज़रूरी संभव उपाय करती। इस लिहाज़ से लोगों की गतिविधियों का ठप करना उसकी पहली शर्त थी। यानी जो जहां है उसको वहीं पर रोक दिया जाए। यह तभी हो पाता जब सरकार गांवों से शहरों में आए दिहाड़ी कामगारों और छोटी कंपनियों में कार्यरत मज़दूरों से लेकर ठेका कर्मचारियों तक के खाने-पीने और उनकी अन्य ज़रूरी बुनियादी सुविधाओं को पूरा करती। लेकिन सरकार के स्तर पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। उसका नतीजा यह हुआ कि शहरों में भगदड़ मच गयी। और एक मुश्त पलायन शुरू हो गया।

अनायास नहीं एक बार फिर देश में विभाजन की तस्वीर पैदा हो गयी है। ऐसी स्थिति में जबकि गाड़ियों समेत सभी तरह की सवारियाँ बंद हैं तो लोग रेलवे से लेकर बस स्टेशनों पर अपने सामानों को लेकर मारे-मारे फिर रहे हैं। और उनमें से बहुत सारे लोगों के सड़क पर पैदल ही अपने घरों की तरफ़ चल देने की रिपोर्टें आ रही हैं।

कल ही आनंद विहार से एक 14 वर्षीय मासूम बच्चे का रोता इंटरव्यू एनडीटीवी पर प्रसारित हुआ था। यह बच्चा तीन दिन से वहाँ भटक रहा था। सड़क पर पुलिस मार रही थी अंदर भूख। एनडीटीवी के पत्रकार ने जब उससे पूछा तो उसका दर्द आंसू बनकर छलछला पड़ा। इसी दृश्य में वहाँ 50 से ज़्यादा लोगों को सवारियों के इंतज़ार में खड़े देखा जा सकता था।

और अब जब लॉक डाउन की घोषणा हो गयी है तो ऐसे लोगों की स्थिति को समझना किसी के लिए मुश्किल नहीं है।

बहरहाल कल एक बार फिर प्रधानमंत्री के भाषण से एक बात बिल्कुल साफ़ हो गयी कि कोरोना से लड़ने के लिए ख़ुद ही लोगों को ज़िम्मेदारी उठानी होगी उसमें सरकार से ज्यादा कुछ उम्मीद नहीं करनी चाहिए। दो बातें उन्होंने बिल्कुल साफ-साफ कह दीं। जिन्हें समझना हर किसी के लिए बहुत ज़रूरी है। उन्होंने पहली बात कही कि कोरोना को देश को गंभीरता से लेना होगा। और यह मानना कि यह कोई ज़्यादा नुक़सान नहीं करेगा भ्रम में जीने जैसा होगा।

उन्होंने जब कहा कि विदेशों में जैसा कि देखा गया यह बीमारी एकाएक विस्फोट करती है और फिर परमाणु बम के न्यूट्रान श्रृंखला की तरह पूरे समाज में फैल जाती है। तो यह भारत में इसके ख़तरनाक स्तर पर फैलाव का संकेत था। और पीएम ने यह बात सरकार की एजेंसियों से मिली रिपोर्ट के बाद कही है। इस तरह से उन्होंने पहले ही भारत में इसकी तबाही और उससे होने वाले बड़े पैमाने पर नुक़सान का संकेत दे दिया है।

दूसरी बात इसी से जोड़कर उन्होंने जो कही वह और भी दिलचस्प है। अभी तक पीएम मोदी और उनका पूरा महकमा देश को सुपर पावर और विश्व गुरू के तौर पर पेश करता रहा है। कल पीएम मोदी ने साढ़े छह सालों में पहली बार इस बात को स्वीकार किया कि वह तीसरी दुनिया के विकासशील देशों में शामिल हैं। साथ ही कहा कि जब पश्चिम के विकसित और सक्षम देश कोरोना से लड़ने में ख़ुद को अक्षम पा रहे हैं तो फिर हमारी क्या बिसात है।

ऐसा नहीं है कि पीएम ने कोई पैकेज नहीं दिया। कल उन्होंने कोरोना पर रिसर्च और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए ज़रूरी सुरक्षा उपकरणों समेत दूसरी ज़रूरतों के लिए 1600 करोड़ रुपये के पैकेज का ऐलान किया। दूसरे पैकेज की घोषणा का काम उन्होंने वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन को सौंप दिया। हालाँकि दुनिया में सारे देशों के राष्ट्राध्यक्ष इस समय सारे काम ख़ुद अपने हाथ में ले लिए हुए हैं। और अगर जनता से आप सीधे मुख़ातिब हो रहे हैं तो उससे जुड़ी हर चीज की सीधी जवाबदेही भी आपकी ही बनती है। लेकिन जब देने के लिए कुछ नहीं और महज़ नारे हों तो फिर जैसा भारत में हो रहा है वही होता है।

भारत दुनिया का पहला देश है जो चिकित्साकर्मियों के लिए ज़रूरी सुरक्षा उपकणों और किट के लिए पैकेज की घोषणा कर रहा है। जबकि यह चीज स्वास्थ्य विभाग का अंदरूनी मामला है और उसकी ज़रूरत को पूरा करना सरकार की ज़िम्मेदारी है। उसके लिए अलग से किसी घोषणा की ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए। और यह रक़म जो आज भारत सरकार घोषित कर रही है इसकी व्यवस्था उसे तीन महीने पहले जनवरी में ही कर देनी चाहिए थी जब कोरोना का पहला केस देश में आया था।

जब डब्ल्यूएचओ ने पीपीई (पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विपमेंट) किट के बड़े पैमाने पर भंडारण का सरकार को निर्देश दिया था। लेकिन सरकार पैकेज देने की बात तो दूर उससे कमाई में जुटी हुई थी और उसने प्रधानमंत्री के पिछले संबोधन के दूसरे दिन 19 मार्च को उनके निर्यात पर प्रतिबंध लगाया है। यह लापरवाही नहीं, अपराध है। उसका नतीजा यह है कि हमारे डॉक्टरों और नर्सों को बग़ैर सुरक्षा उपकरणों के कोरोना मरीज़ों का इलाज करने के लिए झोंक दिया गया है।

दूसरे पैकेज का क्या हस्र हुआ उसको भी जान लेना ज़रूरी है। आम लोगों को दिए जाने वाले आर्थिक पैकेज के नाम पर निर्मला सीतारमन ने छोटे और मझोले उद्योगों को टैक्स से लेकर जीएसटी में छूट और इसी तरह के कई ऐलान किए। इसके साथ ही कहा कि ग़रीबों के लिए सरकार जल्दी ही पैकेज की घोषणा करेगी। अब कोई पूछ सकता है कि जब गरीब मर जाएँगे उसके बाद इस पैकेज की घोषणा होगी क्या? यह पैकेज बहुत पहले आना था और वह भी केवल ग़रीबों के लिए नहीं बल्कि समाज के हर हिस्से को आर्थिक तौर पर सरकार को सुरक्षित करना चाहिए था।

टेस्ट तक की ज़िम्मेदारी यहाँ सरकार उठाने के लिए तैयार नहीं है। इस सरकार से भला और क्या उम्मीद की जा सकती है। निजी क्षेत्र में टेस्ट के लिए उसने 4500 रुपये की फीस तय की है। एक न्यूक्लियर फ़ैमिली में अगर कोई एक भी शख़्स कोरोना संक्रमित हो गया तो पूरे परिवार को यह टेस्ट कराना ज़रूरी होगा। ऐसे में किसी भी संक्रमित परिवार के टेस्ट पर न्यूनतम 20000 रुपये खर्च होंगे। ग़रीबों की बात दूर क्या इस संकट के समय कोई मध्यवर्गीय परिवार भी इसको करा पाने में सक्षम होगा? लिहाज़ा सरकार ने हर तरीक़े से जनता को मरने के लिए उसके हाल पर छोड़ दिया है।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

This post was last modified on March 25, 2020 11:14 am

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