वैष्णव जी! जासूसी रिपोर्ट आना अगर संयोग नहीं है तो आपका मंत्री बनना भी संयोग नहीं

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स्पाईवेयर पेगासस के जरिए जासूसी का मुद्दा संसद के मॉनसून सत्र के पहले ही दिन दोनों सदनों में गूंजा और इस पर खूब हंगामा भी हुआ। सरकार की तरफ से इस मामले पर सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने लोकसभा में कहा कि संसद के मानसून सत्र से पहले जासूसी से जुड़ी मीडिया रिपोर्ट भारतीय लोकतंत्र की छवि को धूमिल करने का प्रयास है और संसद के सत्र से ठीक एक दिन पहले ये रिपोर्ट आना कोई संयोग नहीं है। उन्होंने कहा कि जब नियंत्रण एवं निगरानी की व्यवस्था पहले से है तब अवैध तरीके से निगरानी संभव नहीं है।

लेकिन यह भी संयोग नहीं है कि अचानक अश्विनी वैष्णव को सीधे रेलमंत्री और आईटी मंत्री बना दिया गया। अब जब भारत का अग्रणी डिजिटल मीडिया द वायर और एमनेस्टी इंटरनेशनल सहित विश्व की 17 संस्थाएं इसकी पड़ताल में जुटी थीं तो भारत सरकार को इसकी भनक न लगी हो ऐसा माना ही नहीं जा सकता। ऐसे में इसका पर्दाफाश होने पर संसद में  कोई ऐसा मंत्री सरकार का बचाव करे जिसका नाम स्वयं उन लोगों में शामिल हो जिनकी मोदी सरकार ने जासूसी करायी हो तो जवाब की विश्वसनीयता थोड़ी बढ़ जाएगी। अब यह भी महज संयोग नहीं है कि वैष्णव अमेरिका से एमबीए हैं।

द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक, लीक हुए डेटा में 300 भारतीय मोबाइल नंबर शामिल हैं, जिनमें मोदी सरकार में दो केंद्रीय मंत्री शामिल हैं। इस लिस्ट में सबसे चौंकाने वाला नाम केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव का है, जिन्हें पीएम मोदी ने हाल ही में अपने कैबिनेट में शामिल किया है। उन्होंने आईटी मंत्री के रूप में रविशंकर प्रसाद की जगह ली। इनको जब 2018-19 में निशाना बनाया गया, तब ये सांसद थे। दूसरे मंत्री का नाम प्रहलाद पटेल है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के दौरान जबरन विपक्ष के उग्र विरोध और नारे लगाने पर  लोकसभा में  वैष्णव ने कहा कि इस सनसनीखेज दावे के पीछे कोई आधार नहीं है, और यह कि “सभी चीजें अपनी जगह दुरुस्त हैं और अवैध निगरानी संभव नहीं है। वैष्णव ने कहा कि बीती रात एक वेब पोर्टल द्वारा एक बेहद संवेदनशील स्टोरी पब्लिश की गई। इस स्टोरी के आधार पर कई बड़े आरोप लगाए गए। यह रिपोर्ट संसद के मॉनसून सत्र से ठीक एक दिन पहले आई। यह कोई संयोग नहीं हो सकता।

उन्होंने कहा कि पहले भी पेगासस के जरिए व्हाट्सऐप की निगरानी के ऐसे ही दावे किए गए थे। उन रिपोर्टों का कोई तथ्यात्मक आधार नहीं था और सभी पक्षों द्वारा इसे नकार दिया गया था। 18 जुलाई की प्रेस रिपोर्ट भी भारतीय लोकतंत्र और इसके स्थापित संस्थानों की छवि को खराब करने का प्रयास प्रतीत होती है।

दरअसल देश में एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान की ओर से फोन टैपिंग और जासूसी से संबंधित रिपोर्ट प्रकाशित किए जाने के बाद इसे लेकर घमासान मचा है। संसद के मॉनसून सत्र की शुरुआत से एक दिन पहले आई इस रिपोर्ट पर सदन में भी हंगामा हुआ तो केंद्रीय दूरसंचार मंत्री को सफाई देनी पड़ी। 

अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया था कि ऐसा मोदी सरकार ने करवाया था। संसद के मॉनसून सत्र की शुरुआत से ठीक पहले आई इस रिपोर्ट को लेकर सदन में हंगामे के आसार थे। विपक्षी दलों की ओर से लोकसभा और राज्यसभा में इस विषय पर चर्चा की मांग की गई थी। सीपीआई नेता बिनय विश्वम, आरजेडी के सांसद मनोज झा और आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह समेत कई सांसदों ने यह मुद्दा उठाया तो कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी ट्वीट कर सरकार पर तंज कसा था।

द गार्जियन अखबार ने दावा किया है कि भारत सरकार ने कई पत्रकारों, नेताओं की जासूसी करवाई है। दावा है कि भारत के 40 से ज्यादा पत्रकारों के फोन हैक किए गए। कई मोबाइल फोन की फोरेंसिक जांच की गई, जिसके हवाले से ये दावे किए गए हैं। द वॉशिंगटन पोस्ट, द गार्जियन समेत दुनिया के 17 न्यूज़ वेबसाइट ने ‘द पेगासस प्रोजेक्ट’ नाम से रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें भारत ही नहीं दुनिया के हज़ारों लोगों के फोन हैक करने का मामला सामने आया है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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