Sunday, May 29, 2022

पलामू: धजवा पहाड़ के अवैध खनन पर एनजीटी की फटकार के बाद प्रशासन आया हरकत में

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पलामू/रांची। झारखंड के पलामू में स्थित धजवा पहाड़ के अवैध खनन मामले में आंदोलनकारियों को बड़ी सफलता मिली है। एनजीटी ने न केवल प्रशासन को फटकार लगाते हुए उससे रिपोर्ट मांगी है बल्कि उसने पूछा है कि आखिर अभी तक दोषियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई। दिलचस्प बात यह है कि प्रशासन ने पहली बार इस बात को स्वीकार किया है कि धजवा पहाड़ में अवैध खनन का काम हो रहा है।

पलामू में स्थित धजवा पहाड़ राजधानी रांची से 145 किमी दूर है। यह पांडू प्रखंड के कूटमु पंचायत के तहत आने वाले बरवाही गांव में स्थित है। जिला मुख्यालय से इसकी दूरी 45 किमी है।

यहां पिछले चार महीने से ग्रामीणों के साथ विभिन्न सामाजिक संगठनों के लोग इसलिए आंदोलनरत हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि विश्रामपुर विधानसभा क्षेत्र में स्थित इस धजवा पहाड़ पर पत्थर माफियाओं की टेढ़ी नजर है। और उनको स्थानीय प्रशासन का खुला संरक्षण मिला हुआ है। ‘धजवा पहाड़ बचाओ संघर्ष समिति’ के बैनर तले होने वाले इस आंदोलन में हजारों लोग शरीक हो रहे हैं।

अब तो प्रशासन ने भी इस बात को मान लिया है कि धजवा पहाड़ पर अवैध खनन चल रहा है। दरअसल यह सब कुछ एनजीटी यानि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की फटकार के बाद संभव हुआ। पलामू के उपायुक्त (डीसी) शशि रंजन ने बकायदा शपथ पत्र में इस बात को स्वीकार किया कि धजवा पहाड़ पर अवैध खनन चल रहा है।

डीसी ने ट्रिब्यूनल के सामने दिए शपथ पत्र में कहा कि प्रथम दृष्ट्या धजवा पहाड़ पर अवैध खनन हो रहा है। इसको रोकने के आदेश भी दिए गए हैं। साथ ही जांच के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी का भी गठन किया गया है। शपथ पत्र में अवैध खनन की स्वीकारोक्ति पर ट्रिब्यूनल ने कहा, जब प्रशासन मान रहा है कि वहां अवैध खनन चल रहा है तो आखिर कमेटी बनाकर किसका इंतजार किया जा रहा है। हालांकि ट्रिब्यूनल ने कमेटी को दो सप्ताह में अवैध खनन की रिपोर्ट देने के लिए कहा है। इसके साथ ही मामले की अगली सुनवाई पांच अप्रैल को तय की है।

बता दें कि धजवा पहाड़ के उक्त अवैध खनन पर जनचौक ने 8 फरवरी को एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी।

‘धजवा पहाड़ बचाओ संघर्ष समिति’ द्वारा एनजीटी में दायर याचिका की दूसरी सुनवाई 11 मार्च को हुई। एनजीटी ने धजवा पहाड़ मामले की सुनवाई करते हुए जिला प्रशासन को जमकर फटकार लगाई एवं दो हफ्तों के अंदर रिपोर्ट मांगा। इससे पहले पहली सुनवाई में उपायुक्त को स्वयं जाकर जांच करने को मिली नोटिस के बाद जिला प्रशासन ने एनजीटी को शपथ पत्र के माध्यम से बताया कि प्रथम दृष्ट्या ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पहाड़ी इलाके में अवैध खनन हो रहा है। इसके साथ ही उसने यह भी बताया कि तत्काल खनन पर रोक लगाने का आदेश जारी कर दिया गया है। उपायुक्त की तरफ से यह भी बताया गया कि मामले में उच्च स्तर की कमेटी का गठन कर दिया गया है जो पूरे मामले की जांच कर अपना रिपोर्ट देगी।

इस पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए एनजीटी का कहना था कि जब अवैध खनन की बात स्वीकार की जा रही है तो कमेटी बनाकर आखिर किसका इंतजार किया जा रहा है। उसने पूछा कि आखिर सीधे कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है? इस मामले में उसने कमेटी को 2 सप्ताह के अंदर रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा है। इसके अलावा एनजीटी ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी न केवल इस मामले में पार्टी बना दिया बल्कि उसके ऊपर कुछ जिम्मेदारियां भी डाल दी। जिसमें कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर पर्यावरण को होने वाले नुकसान, नुकसान की भरपाई में लगने वाले खर्च, नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्ति पर लगायी जाने वाली जुर्माने की राशि का आकलन करना शामिल है।

यह विडंबना ही कही जाएगी कि चार महीने से किसान-मजदूर एक पहाड़ की तलहटी में खुले आसमान के नीचे पहाड़ बचाने की मांग को लेकर बैठे थे। उन्होंने मामले की शिकायत डीसी से लेकर मुख्यमंत्री तक की थी। फिर भी न तो किसी प्रशासनिक अधिकारी ने और न ही राज्य सरकार के किसी भी प्रतिनिधि ने उनकी सुध ली। बल्कि उल्टे सरकार के सभी नुमाइंदे पहाड़ माफियाओं के साथ खड़े दिखते रहे।

धजवा पहाड़ बचाने की अर्जी पर स्थानीय प्रशासन एवं सरकार से निराशा हाथ लगने के बाद गरीब-मजदूर किसानों ने एनजीटी में गुहार लगाई। अब जब मामले पर एनजीटी की कड़ी प्रतिक्रिया हुई है। तब पूरा प्रशासन पहाड़ माफिया समेत सभी दोषियों को बचाने की कोशिशों में जुट गया है।

दरअसल 18 नवंबर, 2021 से ग्रामीण डेरा डालो/घेरा डालो कार्यक्रम के साथ पहाड़ बचाने के लिए पहाड़ की तलहटी में मजबूती से डटे रहे और आंदोलन को एक नया रूप देते हुए 19 दिसंबर से आंदोलन को क्रमिक भूख हड़ताल में तब्दील कर दिया। इसके तहत प्रतिदिन 20 ग्रामीण आंदोलनकारी ठंड की बगैर परवाह किए खुले आसमान के नीचे भूख हड़ताल पर डटे रहे।

धजवा पहाड़ के बिल्कुल बगल में ही शिवालया नामक कंपनी ने अपना क्रेशर प्लांट लगाया है। जिसमें पत्थर तोड़ने का काम होता है। यह धरना स्थल से महज 50 मीटर की दूरी पर है, या यूं कहें कि क्रेशर से 50 मीटर की ही दूरी पर आन्दोलनकारी धरना दे रहे हैं।

प्लांट के लगने के साथ ही कंपनी के संवेदक सूरज सिंह ने अपने कर्मियों के साथ जोर शोर से धजवा पहाड़ का खनन शुरू कर दिया। पहाड़ का खनन होते देख ग्रामीणों ने संवेदक से जानना चाहा कि आखिर किस कागजी आधार पर वो पहाड़ का खनन कर रहे हैं? इस पर उन्होंने दस्तावेज दिखाने से साफ-साफ इंकार कर दिया। ग्रामीणों ने आरटीआई से जानकारी निकाली तो पता चला कि संवेदक को धजवा पहाड़ का किसी भी तरह का लीज प्राप्त नहीं है, बल्कि पहाड़ से बिल्कुल सटे बरवाही गांव के किसानों की फसल लगी हुई जमीन जिसका खाता संख्या 174 और प्लॉट संख्या 1046 है, का एग्रीमेंट हुआ है। इसकी कोई भी खबर किसानों को नहीं थी और न ही उस भूमि पर किसी तरह का पत्थर है। बल्कि वहां पर गेहूं और सरसों की खेती होती है। यानि एक ऐसे इलाके को पहाड़ के तौर पर दर्ज कर दिया गया है जो न केवल मैदान है बल्कि उसमें खेती होती है।

इसके ठीक विपरीत संवेदक खाता संख्या 206, प्लॉट संख्या 1048 में स्थित धजवा पहाड़ का खनन कर रहा है, जो कि बिल्कुल अवैध है। धजवा पहाड़ के अवैध खनन को रोकने के लिए ग्रामीणों ने जब प्रखंड प्रशासन सहित जिला प्रशासन से गुहार लगाई, तो उन्हें निराशा हाथ लगी। उसके बाद ग्रामीणों ने अवैध खनन को रोकने के लिए 18 नवंबर से पहाड़ की तलहटी में धरना शुरू कर दिया।

इस आंदोलन के तहत तकरीबन 500 परिवारों वाले बरवाही गांव के पिछड़े समुदाय के तकरीबन 300 परिवार, दलित समुदाय के 100 परिवार एवं मुस्लिम समुदाय के 100 परिवार धजवा पहाड़ बचाने की मुहिम में जुट गए। उनका यह कारवां बढ़ता गया। और उसमें आस-पास के लोग भी जुड़ते गए। बाद में इस आंदोलन के समर्थन में पांडू, विश्रामपुर व उंटारी रोड के लगभग सभी गांवों के ग्रामीण भी आ गए।

धजवा पहाड़ सिर्फ पत्थरों की टीला नहीं है बल्कि इसकी उपयोगिता आस-पास की खेती में फसलों की पैदावार से जुड़ी हुई है। आप पूछेंगे कि कैसे। दरअसल पहाड़ से बिल्कुल सटा लरकोरिया आहर (जलाशय) है। पानी का यह स्रोत तीन तरफ से पहाड़ों से घिरा है, उसका एक हिस्सा खुला हुआ है। बरसात के दिनों में इसमें पहाड़ों के पानी का जमाव होता है। इस जलाशय से ही आस पास स्थित सभी जमीनों की सिंचाई होती है। पहाड़ के नजदीक से ही सुसुआं नदी बहती है, जिसमें साल भर पानी बना रहता है। सुसुआं नदी पर सिंचाई के उद्देश्य से दो सरकारी बांध भी बने हुए हैं। नदी के निरंतर बहते रहने से आस-पास के किसानों की लगभग हजारों एकड़ जमीन पर लगी फसल मोटर पंप के माध्यम से सिंचित होती है।

ग्रामीण बताते हैं कि पहाड़ की चोटी पर बजरंगबली का देवस्थान है तथा वहां हमेशा उनका एक ध्वज फहराता रहता है। आस पास के गांव के हजारों ग्रामीणों की इससे आस्था जुड़ी हुई है। लोगों का मानना है कि उनके पुरखों द्वारा चोटी पर स्थित धार्मिक स्थल पर लगे ध्वज की वजह से ही इस पहाड़ का नाम धजवा पहाड़ पड़ा।

धजवा पहाड़ बचाने के इस आन्दोलन में मुख्य भूमिका निभाने वाले युगल पाल बताते हैं कि पलामू की वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो पता चलता है कि जंगल माफिया एवं पहाड़ माफिया की नजर हमेशा से यहां के जंगलों एवं पहाड़ों पर रही है। और उन्होंने लगातार यहां के जंगलों में स्थित पहाड़ों का अवैध खनन किया है। 

उनका कहना है कि हरिहरगंज और छतरपुर इलाके के दर्जनों पहाड़ अब खंडहर में तब्दील हो चुके हैं, इससे अब वहां के जल स्रोत हजारों फिट नीचे चले गये हैं, जिसका नतीजा यह है कि मई और जून के महीनों में लोगों को पानी खरीदना पड़ता है। क्षेत्र का लगभग 50% इलाका बंजर हो चुका है। वह आगे बताते हैं कि कुछ वर्ष पहले की स्थिति पर नजर डालें तो पलामू जंगलों एवं पहाड़ों के लिए मशहूर था। सलई और बॉस के पेड़ के लिए प्रसिद्ध पलामू के जंगल अब बंजर भूमि में तब्दील हो चुके हैं। उनका कहना था कि जिस तरह से माफिया अभी पहाड़ों को चबाने को आतुर हैं उसी तरह कागज बनाने वाली डालमिया की कंपनी ने हमारे जंगलों से सारे सलई और बांस के पेड़ को उखाड़ कर करोड़ों रुपए का कारोबार कर लिया और पलामू की धरती को जंगल विहीन बना दिया।

युगल पाल एक विडंबना का भी जिक्र करते हैं। उनका कहना था कि पिछली सरकार की कुव्यवस्था से ऊब कर झारखंड प्रदेश के दलित-आदिवासियों एवं पिछड़ों ने वर्तमान सरकार को इस उम्मीद से वोट दिया था कि यह सरकार गरीब किसान मजदूरों की जमीन की रक्षा करते हुए जंगल पहाड़ बालू जैसी प्राकृतिक संपदा को भी आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित करेगी। लेकिन इसके ठीक विपरीत मौजूदा सरकार प्रदेश की भोली-भाली जनता के साथ धोखा कर रही है। वह किसानों की जमीन सहित सारी प्राकृतिक संपदा को अवैध तरीके से पूंजीपतियों एवं माफियाओं के हाथ बेच रही है। इसका जीता जागता उदाहरण धजवा पहाड़ है।

आपको बता दें कि अभी हाल ही में बरवाही गांव के लगभग 6 किसानों की जमीन का भी माफियाओं को फर्जी तरीके से लीज में दे दी गयी थी। किसानों ने जब अपने कागजात दिखाए तो प्रशासन ने उसे अमान्य करार दे दिया। और वह फर्जी लीज को ही सही ठहराने में लगा हुआ है। सभी पीड़ित किसानों ने मामले को डीसीएलआर की कोर्ट में दायर किया है। पिछले लगभग 2 साल से जंगल, पहाड़, बालू एवं किसानों की जमीन लूटने वाली इस सरकार से त्रस्त हो चुके गरीब मजदूर किसानों के लिए अब न्यायालय का दरवाजा खटखटाना ही न्याय का एकमात्र रास्ता बचा है।

आन्दोलन में शामिल पलामू के माले नेता सरफराज आलम बताते हैं कि पहाड़ एवं जंगल माफियाओं की लूट की बीती घटनाओं से सबक लेते हुए हमें सीख लेने की जरूरत है। हमें आम नागरिकों को जल, जंगल, पहाड़ एवं पर्यावरण के प्रति जागरूक करते हुए पहाड़ों-जंगलों को किसी भी कीमत पर सुरक्षित रखना होगा और इसके लिए लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करना होगा। वह कहते हैं कि हमने पहाड़ को बचाने के लिए लोकतांत्रिक तरीका अपनाया और हमें सफलता मिली है। इसका श्रेय आन्दोलनकारियों के साथ-साथ मीडिया को भी जाता है जिसने इस आंदोलन को लोगों तक पहुंचाया।

वहीं आंदोलन में शामिल सीपीआईएमएल (रेड स्टार) के राज्य सचिव कॉमरेड वशिष्ठ तिवारी कहते हैं कि यह तो आन्दोलन की सीढ़ी की पहली सफलता है, वास्तव में धजवा पहाड़ के अलावा जिले में 8 ऐसे और भी पहाड़ हैं, जिन पर पत्थर माफियाओं की नजर है, इसी आलोक में इन माफियाओं की मिली भगत से खनन विभाग ने उन पहाड़ों को लीज पर देने के लिए स्थानीय अंचल अधिकारियों को सर्वे का निर्देश दिया है। मतलब जिले को पहाड़ विहीन बनाने का कुचक्र प्रशासन व माफियाओं की मिलीभगत से तैयार किया जा रहा है, जिसका विरोध भी हम संवैधानिक व लोकतांत्रिक तरीके से करेंगे।

बरवाही गांव के निवासी और सिविल इंजीनियरिंग से बीटेक करके एन आर कंस्ट्रक्शन लिमिटेड में कार्यरत युवा रौशन कुमार पाल बताते हैं कि पहाड़ के अस्तित्व विहीन हो जाने से आस पास के सभी आहर तो बेकार हो ही जाएंगे, साथ ही साथ सुसुआं नदी का अस्तित्व भी हमेशा के लिए मिट जाएगा। जिसके परिणामस्वरूप किसानों की कृषि योग्य भूमि बंजर हो जाएगी। कृषि आधारित जीविका वाले आसपास के सैकड़ों किसानों का जीवन मुश्किल में पड़ जाएगा। जल स्रोत हजारों फीट नीचे चला जाएगा, जिससे पीने योग्य पानी नहीं मिलेगा। वे कहते हैं कि पहाड़ के टूटते ही मवेशियों का चरागाह भी नहीं बचेगा।

मवेशियों का जीवन भी मुश्किल में पड़ जाएगा। पहाड़ पर कई तरह के पेड़ पौधे हैं, जिससे वातावरण अनुकूलित रहता है। पहाड़ खनन की कड़ी में अमूल्य पेड़ पौधों को भी उखाड़ दिया जाएगा। जिससे हम शुद्ध वातावरण से भी वंचित हो जाएंगे। प्लांट के चालू होने एवं पहाड़ के खनन की स्थिति में वातावरण में अत्यधिक मात्रा में प्रदूषण फैलेगा जिससे कई बीमारियां जन्म लेंगी। लेकिन मामले की नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा संज्ञान लिए जाने के बाद अब कुछ उम्मीद जगी है।

धजवा पहाड़ बचाओ संघर्ष समिति के अध्यक्ष संजय पासवान सहित ग्रामीणों ने कहा कि शिवालिया कंपनी ने यहां क्रशर प्लांट लगाया है। कंपनी ने खाता संख्या 174 प्लॉट संख्या 1046 लीज कराया है। जबकि, धजवा पहाड़ प्लॉट संख्या 1048 में है। यह फॉरेस्ट का है, इसका लीज नहीं है। बावजूद इसके कंपनी ने पोकलेन लगाकर पहाड़ से पत्थर निकालने का काम शुरू कर दिया। रही इस कार्य को रोकने की बात तो धजवा पहाड़ बचाओ संघर्ष समिति के बैनर तले ग्रामीण अक्टूबर से लगातार संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन डीसी से लेकर सीएम तक, किसी ने कार्रवाई नहीं की। तब हम लोग एनजीटी की शरण में गये और अब परिणाम कुछ कुछ सकारात्मक दिख रहा है।

विनय कुमार ने सभी मीडिया कर्मियों का धजवा पहाड़ बचाओ संघर्ष समिति कि ओर से आभार जताते हुए कहा कि आज जो जीत हुई है उसके लिए मैं एनजीटी को धन्यवाद देता हूं। 

धजवा पहाड़ बचाओ संघर्ष समिति के सचिव अवधेश पाल बताते हैं कि एनजीटी के इस आदेश के बाद हम सभी आंदोलनकारियों में काफी उत्साह है। इस आदेश के बाद हम सभी आंदोलनकारियों के हौसले बुलंद हुए हैं और यह हमारी जीत की ओर पहला कदम है।

वहीं समिति के संयोजक अरविंद पाल ने बताया कि एनजीटी का यह आदेश हम सभी ग्रामीण एवं सहयोगी संगठनों को उत्साहित करने वाला है। एनजीटी के आदेश से हम सभी आंदोलनकारियों का मनोबल बढ़ा है। हम लगभग जीत के मुहाने पर खड़े हैं। इसके साथ ही उन्होंने अपने सभी सहयोगी संगठनों और आंदोलन में शरीक सभी ग्रामीणों को अग्रिम बधाई दी।

धजवा पहाड़ के आंदोलन को खड़ा करने एवं इस आंदोलन को नियमित रूप से चला कर जीत की ओर ले जाने में विभिन्न जन सहयोगी संगठनों की अहम भागीदारी रही है। 26 अक्टूबर को ग्रामसभा कर इस आंदोलन की नींव रखी गई थी। समिति के नेतृत्व में सभी सहयोगी संगठनों के साथ ग्राम सभाओं के स्तर पर आंदोलन की योजना तैयार की गई थी।

इसके बाद 29 अक्टूबर को जिला मुख्यालय के समक्ष धजवा पहाड़ के अवैध खनन के विरुद्ध समिति ने अपने सहयोगी संगठनों के नेता के साथ मिलकर एक दिवसीय धरना दिया एवं कुछ ही दिनों के बाद 12 नवंबर को सहयोगी संगठनों के साथ मिलकर प्रखंड कार्यालय पांडू के समक्ष एक दिवसीय धरना दिया। इसके बावजूद भी जिला प्रशासन की ओर से अवैध खनन के विरुद्ध कोई करवाई नहीं की गयी। समिति ने अपने सभी सहयोगी संगठनों की सलाह पर 18 नवंबर से धजवा पहाड़ बचाओ संघर्ष समिति के नेतृत्व में डेरा डालो/घेरा डालो कार्यक्रम के तहत लोकतांत्रिक आंदोलन की शुरुआत की। जिसके तहत लोग 119 वें दिन भी पहाड़ की तलहटी में डेरा डाले हुए हैं।

प्रशासन के नकारात्मक रवैया के कारण समिति एवं सहयोगी संगठनों के द्वारा बीते 14 दिसंबर को उपायुक्त कार्यालय का घेराव प्रदर्शन भी किया गया। समिति ने अपने पूर्व घोषित तिथि के अनुसार 21 दिसंबर को झारखंड विधान सभा का घेराव किया। विधानसभा घेराव कार्यक्रम में बगोदर विधानसभा के विधायक कॉमरेड विनोद सिंह ने आंदोलनकारियों की मांग पत्र को स्वीकार कर विधानसभा तक पहुंचाया था। इसके उपरांत 30 जनवरी को आंदोलन के 74 वें दिन महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर आयोजित एक विशाल जनसमर्थन सभा को संबोधित करने वे स्वयं धजवा पहाड़ की तलहटी में आए एवं अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि वह धजवा पहाड़ के मुद्दे को विधानसभा में उठाएंगे।

धजवा पहाड़ बचाने को दृढ़ संकल्पित जन संग्राम मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष युगल किशोर पाल, गढ़वा जिला प्रभारी अशोक पाल, पलामू जिला अध्यक्ष बृजनंदन मेहता, मूलनिवासी संघ के विनय पाल, सीपीआईएमएल (भाकपा माले) के सचिव आरएन सिंह, वरिष्ठ नेता बीएन सिंह, सरफराज आलम, रविंद्र भुईयां, सीपीआईएमएल (रेड स्टार) के वशिष्ठ तिवारी, फूलन देवी विचार मंच के शैलेश चंद्रवंशी, एसटी एससी ओबीसी माइनॉरिटी एकता मंच के रवि पाल,  झारखंड क्रांति मंच के शत्रुघ्न कुमार शत्रु, पीपीआई के संतोष पाल, ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (आइसा) के दिव्या भगत, गौतम दांगी, दानिश आलम, युवा पाल महासंघ गढ़वा के सुमित पाल, सर्वहारा जन संघर्ष मोर्चा के राम लखन पासवान पुष्पा भोक्ता, हुल झारखंड क्रांति दल के चंद्रधन महतो, अखिल भारतीय पाल महासभा के धर्मेंद्र कुमार पाल, पांडू जिला परिषद सदस्य अनिल चंद्रवंशी, पांडू प्रमुख सरोजा देवी, करकट्टा पंचायत के पूर्व मुखिया उपेंद्र कुशवाहा, कुटमु पंचायत के युवा समाजसेवी रामबचन राम एवं कई अन्य जन सहयोगी संगठनों के लोग मुख्य रूप से धजवा पहाड़ को बचाने के लिए हर तरह से खड़े रहे।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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