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पालघर लिचिंग और वो राजनीति जो इंसानों को हत्यारा बनाती है या कीड़े-मकोड़े

पालघर में जिन तीन लोगों को उनकी गाड़ी से उतारकर मार दिया गया, उनमें दो साधु थे जो किसी अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए निकले थे। पुलिस मौक़े पर मौजूद थी पर भीड़ ने उसे बेबस कर दिया था। बताया जा रहा है कि लोगों को शक था कि साधु के वेश में बच्चा चोर हैं। इन साधुओं और उनके ड्राइवर को जिस तरह पीट-पीट कर मारा गया और हत्यारों की भीड़ में जिस तरह नाबालिग भी शामिल थे, उससे पता चलता है कि समाज में बर्बरता कितनी `सहज` बना दी गई है। देश में लोगों को इस बर्बरता के प्रति सहज और इसमें बाकायदा हत्यारे बनकर शामिल होने की फैक्ट्री चलाई जा रही है।

पालघर की नृशंस वारदात का वीडियो वायरल होते ही इसे साम्प्रदायिक रंग देकर भयानक खेल शुरू कर दिया गया। साधुओं की हत्या के पीछे मुसलमान होने की अफवाह फैलाने वाले मैसेज वायरल करने वाली फैक्ट्री भी उत्पादन और प्रसार में जुट गई। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने वारदात का वीडियो अटैच करते हुए ट्वीट किया, “महाराष्ट्र के पालघर में 2 संत और उनके ड्राइवर को बड़े ही बेरहमी से लिंचिंग कर मौत के घाट उतार दिया गया। ये घटना वीरवार की है। आज तक सारे लिबरल पूरी तरह से खामोश हैं। कोई लोकतंत्र या संविधान की दुहाई नहीं दे रहा।“

कोरोना के नाम पर दिन-रात मुसलमानों के ख़िलाफ़ चल रहे दुष्प्रचार के माहौल में पालघर की वारदात को कम्युनल एंगल देने के क्या नतीज़े हो सकते हैं, यह भांप कर महाराष्ट्र सरकार के हाथ-पाँव फूल जाना स्वाभाविक था। वहाँ के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने तुरंत बयान दिया कि “मुंबई से सूरत जाने वाले तीन लोगों की पालघर में हुई हत्या के बाद मेरे आदेश से इस हत्याकांड में शामिल 101 लोगों को पुलिस हिरासत में लिया गया है। साथ ही उच्च स्तरीय जांच के आदेश भी दिए गए हैं।

इस घटना को विवादास्पद बनाकर समाज में दरार बनाने वालों पर भी पुलिस नज़र रख रही है।“ उन्होंने साजिश को भांपते हुए यह भी साफ़ किया कि हत्यारे और उनके हाथों मारे गए लोग एक ही धर्म से थे। देशमुख ने ट्वीट किया, “हमला करने वाले और जिनकी इस हमले में जान गई – दोनों अलग धर्मीय नहीं हैं। बेवजह समाज में /समाज माध्यमों द्वारा धार्मिक विवाद निर्माण करने वालों पर पुलिस और @MahaCyber 1 को कठोर कार्रवाई करने के आदेश दिए गए हैं।“

चिंता की बात तो यह भी है कि जिस तरह का माहौल बना दिया गया है, उसमें किसी आपराधिक वारदात में मुसलमान शामिल पाया जाए तो फिर क्या हो। कौन नहीं जानता कि बिना किसी कसूर के लिंच कर दिए गए मुसलमानों के लिए इंसाफ़ मांगने वालों को किन स्थितियों से गुज़रना पड़ता है? संबित पात्रा का ट्वीट आख़िर संविधान और लोकतंत्र की दुहाई देने वालों पर ही सवाल खड़ा करता है। यह समझना कठिन नहीं है कि एक मुश्किल वक़्त में स्थिति को संभालने के लिए ज़िम्मेदार रवैया अपनाने के बजाय किसी भी वारदात को कम्युनल एंगल देकर लाशों के इंतज़ाम में जुट जाने वाले गिद्ध कौन हैं।

मॉब लिचिंग की ही कुछ पुरानी घटनाओं को याद करने से पहले हाल-फ़िलहाल में फैलाई गईं अफ़वाहों पर नज़र डाल लेते हैं। कोरोना के कारण चल रहे लॉक डाउन के बीच मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने वाले ऐसे तमाम मैसेज और फेक वीडियो वायरल किए जा रहे हैं जिनके नतीज़े में दूध-सब्ज़ी बेचने वाले ग़रीब मुसलमानों को जगह-जगह हमले झेलने पड़ रहे हैं। गोदी मीडिया दिन-रात इस ज़हरीले अभियान में जुटा हुआ है और भाजपा के ज़िम्मेदार नेता टीवी की प्रायोजित बहसों में लगातार साम्प्रदायिक दुष्प्रचार में जुटे हुए हैं। महाराष्ट्र सरकार को हाल में ही मुंबई में मज़दूरों की भीड़ के बांद्रा स्टेशन पर उमड़ पड़ने और उसमें मस्जिद एंगल जोड़कर नफ़रत फैलाने के प्रायोजित अभियान का भी सामना करना पड़ा है।

ध्यान देने की बात यह है कि धड़ल्ले से जारी इस ज़हरीली मुहिम में ऐसी अफवाहों वाले मैसेज भी वायरल किए जा रहे थे कि कोरोना के शिकार मुस्लिम ग्रुप को साधु के भेष में हिन्दू बस्तियों में जाकर संक्रमण फैलाने का मिशन दिया गया है। ऐसे मैसेजेज के स्क्रीन शॉट भी कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर यह दिखाने के लिए लगाए हैं कि इस तरह का माहौल बना दिया गया है जिसमें साधु बाने वाले लोग भी हमले के शिकार हो जाएं। घूम-फिर कर मांगने-खाने वाले भगवाधारी जोगियों से हिन्दू इलाके में ही मारपीट का एक वीडियो कई दिन पहले भी वायरल हो रहा था। सामाजिक दूरी के लिए बदनाम देश में कोरोना से बचाव के लिए सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर भी नफ़रत का लावा बहा दिया जाए तो क्या-क्या नहीं होगा?

पिछले कुछ सालों में देश में हुई मॉब लिंचिंग की कुछ वारदातों को याद करेंगे तो देखेंगे कि इनमें संघ परिवार और भाजपा की किस तरह की भूमिका रही है। कई वारदातों में संघ परिवार के लोग शामिल ही नहीं थे, उन्होंने अपनी उपस्थिति के वीडियो भी ख़ुद ही बनाए थे। इन मामलों में कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किस तरह किया गया, पीड़ित परिवारों पर क्या गुज़री और आरोपियों के किस तरह स्वागत कार्यक्रम आयोजित किए गए, इसे समझा जाना ज़रूरी है।

मॉब लिंचिंग में मारे गए पहलू खान, जुनैद, अख़लाक़, रिज़वान आदि के केस दुनिया भर के मीडिया में चर्चित हुए पर हिन्दुत्व के उभार के नशे में डूबे समाज को अपने इस हाल पर शायद ही शर्म आई हो। यूपी में एक बड़ी हिंसा की साजिश को नाकाम कर देने वाले पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध सिंह को किस तरह मार दिया गया, उनका परिवार किस तरह अकेला पड़ता गया और हत्यारोपी किस तरह नायकों की तरह पेश किए गए, यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं है। राजस्थान में ऐसे ही एक हत्यारे को हिन्दुत्व का नायक बताते हुए अदालत पर भगवा झंड़ा फहरा दिए जाने की घटना ने क्या इस देश-समाज को झकझोरा था?

सुनियोजित ढंग से किस तरह का भयावह माहौल बना दिया गया है और हम किस तरह के समाज में हैं जहाँ एक ख़ास राजनीति के संरक्षण में नीचे तक एक भयानक नेक्सस तैयार हो गया है और जहाँ मॉब लिंचिंग, उसका जस्टिफिकेशन और प्रतिरोध की आवाज़ों का क्रूर दमन कितना आसान है, इस सब को दर्ज़ करने वाले उपन्यास `वैधानिक गल्प` के लेखक चंदन पांडेय कहते हैं, “ये दुर्भाग्यपूर्ण और नृशंस हत्याएं बिना योजना के नहीं होती हैं, यह भी अब लोगों को समझ लेना चाहिए। किसी भी मॉब लिंचिंग में आकस्मिक शायद ही कुछ होता हो।“  कोरोना तक को फ़ासिज़्म का टूल बना लिए जाने की चिंता बुद्धिजीवी लगातार जता ही रहे हैं। विश्व प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति राय तो कह रही हैं कि कोरोना के बहाने नरसंहार के हालात पैदा किए जा रहे हैं।

पालघर की नृशंस वारदात पर बात करते हुए एक अन्य वीडियो क्लिप का भी ज़िक्र करना चाहता हूँ जो कल रात से वायरल हो रही है। यह गुजरात के एक सिविल अस्पताल के बाहर गुहार लगाते लोगों की है। कुछ स्त्री-पुरुष जो इसी समय जहाँ-तहाँ भूख और हिंसा झेल रहे बेबस-बेघर मज़दूर नहीं हैं, मध्य वर्ग के ही लोग हैं, कह रहे हैं कि वे 24-25 लोग दो दिन पहले कोरोना पॉज़िटिव पाए गए थे लेकिन उनके इलाज़ के लिए कोई प्रबंध नहीं है। वे कुछ खाए-पिए बिना सुबह से अस्पताल के बाहर खड़े हैं पर उन्हें दुत्कारा जा है। उनका अंग्रेजी में बोलना भी काम नहीं आ रहा है।

विकास के बहु प्रचारित गुजरात मॉडल के अस्पताल में 1200 बेड सिर्फ़ कोरोना के मरीज़ों के लिए होने के दावे के बावजूद यह भयावह स्थिति सामने आती है। पालघर में ज़िंदा इंसानों को `ज़िंदा इंसानों` का समूह लिंच कर रहा है और यहाँ ज़िंदा इंसान एक भयावह रूप से संक्रामक और जानलेवा बीमारी की चपेट में आ जाने के बाद खुद को बेबस छोड़ दिए जाने पर गुहार लगा रहे हैं। दोनों, भयावह, दोनों नृशंस। क्या कोई समझ सकता हैं कि दोनों के पीछे की वजह एक ही है – वह पूंजीवादी-साम्प्रदायिक राजनीतिक शक्ति जिसने इंसानों को या तो हत्यारों के झुंड़ में या कुचल दिए जाने के लिए अभिशप्त असहाय कीड़ों-मकोड़ों में बदल दिया है।

(धीरेश सैनी जनचौक के रोविंग एडिटर हैं।)

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This post was last modified on April 20, 2020 10:23 am

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