Monday, October 25, 2021

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विभाजन मोदी का स्थायी भाव है!

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वैसे निर्लज्जता की कोई सीमा नहीं होती है। यह बात कल प्रधानमंत्री मोदी की उस पहल से समझ में आयी जिसमें उन्होंने विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाने का उपक्रम किया। अब इसे क्या कहा जाए जिसकी पूरी नींव ही विभाजन की विरासत पर खड़ी है। जिसके पुरखों ने न केवल विभाजन का रास्ता साफ किया बल्कि विभाजनकारी मुस्लिम लीग के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल और नॉर्थ-ईस्ट-फ्रंटियर में सरकारें बनायीं। जिन्होंने अंग्रेजों का साथ इसलिए दिया क्योंकि उन्होंने उनके असली दुश्मन यानी मुसलमानों को सत्ता से हटाया है। और फिर दुश्मन का दुश्मन दोस्त के सिद्धांत पर हमेशा ब्रिटिश हुकूमत की पैरोकारी करते रहे। यहां तक कि भारत की जनता जब 1942 में गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई छेड़ दी थी तब ये उस साम्राज्यवादी हुकूमत के लिए चौराहों-चौराहों पर सेना भर्ती का कैंप लगा रहे थे।

यह बात हमें नहीं भूलनी चाहिए कि मुगल काल से लेकर देश के पूरे इतिहास में सांप्रदायिकता या फिर सांप्रदायिक दंगा किस चिड़िया का नाम है कोई जानता नहीं था। यह अंग्रेजों की नायाब खोज थी जिसे उन्होंने 1857 के बाद जनता को आपस में बांटने, लड़ाने और उसके बाद उस पर शासन करने के लिए इस्तेमाल किया। और फिर हथियार के तौर पर गढ़ा जिसे आरएसएस समेत धुर दक्षिणपंथी संगठनों ने अपना लिया। जिसका नतीजा यह रहा कि वे हमेशा इस काम में अंग्रेजों की मदद करते रहे। जहां भी दंगा कराना होता वो उसके काम आते। संघ से लेकर हिंदू महासभा तक की इस तरह से अंग्रेजों के साथ गलबहियां जारी रहीं। और अंतत: अंग्रेजों के नेतृत्व में आरएसएस से लेकर हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग ने सांप्रदायिक घृणा और वैमनस्य की जो पृष्ठभूमि तैयार की उसी की पैदाइश यह बंटवारा था। दरअसल आरएसएस और मुस्लिम लीग कुछ और नहीं अंग्रेजों के दाहिने और बाएं हाथ थे जिनका अंग्रेज बारी-बारी या फिर एक साथ इस्तेमाल करते थे। अब उनके पड़पोते विभाजन को विभीषिका बता रहे हैं।

कहते हैं पुराने घावों को जिंदा नहीं करते हैं। उन्हें जितनी जल्दी हो भुला देना चाहिए और जो कुछ नया होता है उसको पकड़ कर आगे बढ़ने की जरूरत होती है। आज पाकिस्तान वक्त की एक सच्चाई है। उसे न तो खत्म किया जा सकता है और न ही दरकिनार किया जा सकता है। लिहाजा उसके वजूद को उसकी पहचान के साथ ही स्वीकार्य करते हुए एकता के लिए किसी नये फलक का निर्माण करना होगा। लेकिन यह काम मोदी नहीं कर रहे हैं। उन्हें तो हजारों हजार साल तक हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ लड़ाना है। विभाजन की जो रेखा है उसको न केवल चौड़ी करनी है बल्कि उसकी लंबाई भी बढ़ानी है। और इस तरह से दक्षिण एशिया के जिगर के इन टुकड़ों को हमेशा-हमेशा के लिए एक दूसरे से अलग करने की स्थाई व्यवस्था करनी है। दरअसल इनका अखंड भारत हिंदू भारत है जिसमें मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं है। और अगर वह उन्हें कुछ देते भी हैं तो वह है दोयम दर्जा।

अब कोई पूछ सकता है कि 21वीं सदी के दौर में एक आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र में कोई दोयम दर्जा लेकर रहना चाहेगा। या फिर ऐसा कोई वक्त आ सकता है जिसमें पाकिस्तान या फिर बांग्लादेश से मुसलमानों का पूरा का पूरा सफाया हो जाए? जब ऐसे अप्रत्याशित और असंभाव्य लक्ष्य नहीं हासिल किए जा सकते हैं तब इस तरह के इतिहास के घावों को कुरेदने का भला क्या मतलब हो सकता है। यह कोई ऐसा ही शख्स कर सकता है जिसे प्रेम और भाईचारा नहीं बल्कि बंटवारे के साथ नफरत और घृणा प्यारी हो। 

इस बात को सबको याद रखना चाहिए कि किसी जिन्ना और मुस्लिम लीग से पहले बंटवारे के लिए हिंदू महासभा और उसके नेता सावरकर जिम्मेदार हैं जिन्हें बीजेपी अपना पुरखा मानती है और उन्हें उसने भारत रत्न से नवाजा है। इस ‘रत्न’ ने ही सबसे पहले द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत दिया था। 1937 के हिंदू महासभा के सम्मेलन में सावरकर ने कहा था कि हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते हैं क्योंकि दोनों अलग-अलग राष्ट्र हैं। और उसके बाद जो मुस्लिम लीग अभी तक मुसलमानों की पार्टी के तौर पर काम करती लेकिन विभाजन या फिर किसी पाकिस्तान के वजूद का कोई विचार उसकी जेहन में नहीं था उसने 1940 में देश का बंटवारा कर अलग पाकिस्तान की मांग शुरू कर दी। लिहाजा इस बंटवारे की वैचारिक पृष्ठभूमि हिंदू महासभा और उसके नेता सावरकर ने तैयार की थी। 

इसमें पीएम मोदी का दोष नहीं है। दरअसल उनकी पूरी विचारधारा और सोच ही बंटवारे और विखंडन पर आधारित है। उसमें प्रेम और भाईचारे के लिए कोई जगह नहीं है। वह नफरत और घृणा पर ही फलती-फूलती है। उसमें सौहार्द और एकता नहीं बल्कि कटुता और वैमनस्य है। जहां असहमति को कोई स्थान नहीं है। विविधता की जगह एकरूपता पसंद की जाती है। इसलिए इन नारंगीपोश निक्करधारियों के लिए इंसान-इंसान नहीं बल्कि वह हिंदू-मुसलमान है। वह ब्राह्मण और शूद्र है। वह राज्यों में विभाजित है। वह रंगों में बंटा है। वहां छूआछूत है। वहां पूंजी और श्रम में पूंजी की तरफदारी है। सामंती व्यवस्था में भूमिहीन मजदूरों की नहीं खेती के मालिकों की पक्षधरता है। इसलिए हर तरह के अन्याय की वहां वकालत है। यानि पूरी राजनीति एक दूसरे के खिलाफ लड़ाई पर आधारित है और उसमें भी पक्षधरता वंचितों की नहीं बल्कि सत्ता के पोशकों की है।

अनायास नहीं जब पार्टी सत्ता में है तो विभाजन का हर रूप अपने उरूज पर है। घर परिवार से लेकर जाति और धर्म यहां तक कि राज्यों के बीच संघर्ष इस दौर की प्रमुख पहचान बन गयी है। और इस बात को आसानी से समझा जा सकता है कि कोई भी ऐसा मुल्क जिसकी जनता लगातार आपस में लड़ती हो भला वह कैसे तरक्की कर सकता है। सीआईआई के सम्मेलन में मोदी से लेकर गोयल तक ने कारपोरेट और पूंजीपतियों को लानतें भेजी हैं। जिसमें उन्होंने टैक्स से लेकर कर्ज माफी तक इतनी छूट देने के बाद भी उनके द्वारा कोई निवेश न किए जाने का सवाल उठाया है। गोयल ने तो उन्हें राष्ट्रद्रोही तक करार दे दिया है। लेकिन कोई इनसे पूछे कि देश में जो हिंसा और नफरत का माहौल पैदा हो रहा है उसमें कोई भी निवेशकर्ता सुरक्षित महसूस कर सकता है।

किसी भी तरह के निवेश के लिए कानून और व्यवस्था का पुख्ता होना उसकी पहली शर्त बन जाती है। लेकिन यहां कब कहां दंगे हो जाएं, किसको राह चलते लिंच कर दिया जाए कुछ नहीं कहा जा सकता है। ऐसे में इतनी असुरक्षा और अनिश्चितता के बीच भला कोई नई शुरुआत क्यों करना चाहेगा। इस सिलसिले में कुछ बाहर से जो पूंजी आने की संभावनाएं थीं सरकार के कर्ताधर्ताओं ने अपनी इन करतूतों से उसको भी रोक दिया। लिहाजा एक विपन्न भारत फिर सामने खड़ा है जिसमें भूख है। बेरोजगारी है। महंगाई है। और लूट की पूरी व्यवस्था है। शायद इन्हीं परिस्थितियों में नफरत और घृणा का माहौल भी पलता है। लिहाजा मोदी, बीजेपी और आरएसएस ने अपने वोटों की फसल के लिए खेतों की अच्छी हलवाही कर ली है। और उसी का नतीजा है कि सारे संकटों के बावजूद देश की जनता का एक हिस्सा इनका स्थाई पैरोकार बन गया है। और वे इतने अंधभक्त हो गए हैं कि न तो उन्हें अपनी भलाई के बारे में पता है। न ही देश की। और नेतृत्व अगर उनके सामने बंगाल की खाड़ी में गिराने का प्रस्ताव देता है तो वे खुशी-खुशी उसके पीछे चल देने के लिए तैयार हैं। 

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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