Tuesday, November 29, 2022

ग्राउंड जीरो से गुजरात: परिवर्तन का आगाज है नाउम्मीदी और निराशा से पैदा लोगों का गुस्सा

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दानी लिमड़ा (अहमदाबाद)। अहमदाबाद की सुरक्षित सीट दानी लिमड़ा और उसकी एक दलित बस्ती सवाय नात की चाली। मेन रोड से सटी यह बस्ती गलियों से भरी पड़ी है। अंदाजा लगाना कठिन हो जाता है कि गलियों में बस्ती है या फिर बस्ती में गलियां। और मकान इतने छोटे कि गली से शुरू होते ही एकाएक खत्म। शाम का वक्त और अलसाई धूप के बीच बतकही करते 7-8 बुजुर्गों से मुखातिब होने पर पहले तो वो चुनाव संबंधी कोई बात करने के लिए तैयार नहीं होते। ऐसा देखा गया है कि किसी और सूबे के मुकाबले गुजरात में यह आम बात दिखती है कि चुनाव के समय भी यहां के लोग खुल कर बात नहीं करते। एक अजीब किस्म का डर या कहिए निराशा या फिर अपने तरह की नाउम्मीदी उनके जीवन का हिस्सा बन गयी है। 

इससे पहले इसी बस्ती के एक स्थान पर देर तक मान-मनौव्वल के बाद भी दो-तीन बुजुर्ग और अधेड़ लोग बातचीत के लिए तैयार नहीं हुए। लिहाजा यह बातचीत की दूसरी कोशिश थी यहां भी अपने तरीके का ना था। लेकिन तकरीबन जबरन सवालों का सिलसिला जब शुरू हुआ तो जवाब देना लोगों की मजबूरी बनती गयी। और एक बार जब हिचकिचाहट की गांठें खुलीं तो फिर मानो सालों-साल का गुबार ज्वार-भाटा बनकर फूट पड़ा। फिर बुजुर्गों ने समस्याओं का वह अंबार गिनाया जो किसी हिमालय से भी ऊंचा था। जिन्हें हल करने के लिए किसी सत्ता प्रतिष्ठान को सिर के बल खड़े होना पड़ सकता है। तकरीबन 60 साल के रमेश भाई की नाराजगी उनके नथुनों के पार जाने लगी। और अचानक उनका चेहरा लाल हो गया। सवाल सुनते ही उनका गुस्सा सरकार और उसके कारिंदों पर फूट पड़ा।

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उनका कहना था कि सरकार कोई काम नहीं करती है और अगर करती है तो सिर्फ अपने चेलों- चपाटों और अपने कार्यकर्ताओं का। यहां गरीबों के लिए जो भी मकान आवंटित हुए हैं वो आम लोगों को नहीं बल्कि सत्तारूढ़ पार्टी के कार्यकर्ताओं को मिले हैं। यह पीड़ा और नाराजगी इस स्तर तक थी कि उन्होंने सूबे में राष्ट्रपति शासन तक लागू करने की मांग कर डाली। उनका कहना था कि सरकारी अफसर काम नहीं करते हैं और जो भी काम करते हैं वह पैसा बनाने के लिए करते हैं। इसलिए काम वही होगा जिसमें उनको पैसा मिलेगा। आपको बता दें कि गुजरात में जो रिश्वत दी जाती है उसे ‘व्यवहार’ कहा जाता है। यानि यहां भ्रष्टाचार को व्यवहार में बदल दिया गया है। या दूसरे तरीके से कहें तो उसे जीवन का हिस्सा बना दिया गया है। 

बुधवार को कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता और पूर्व मंत्री मनीष तिवारी ने अहमदाबाद स्थित कांग्रेस राज्य मुख्यालय पर अपनी प्रेस कांफ्रेंस में भी इस बात को विशेष रूप से चिन्हित किया। उन्होंने कहा कि गुजरात मॉडल का यह नया प्रयोग है जिसमें भ्रष्टाचार को जीवन का हिस्सा बना दिया गया है। बहरहाल जब बात जीवन की दूसरी जरूरतों मसलन शिक्षा और स्वास्थ्य पर आयी तो रमेश भाई ने बताया कि मोहल्ले में कोई अस्पताल नहीं है। एक अस्पताल है वह भी बहुत दूर। जहां जाने पर घंटों लाइन में खड़े रहना पड़ता है और कोई ढंग का इलाज भी नहीं हो पाता है। ऐसे में मजबूरन निजी चिकित्सकों की शरण लेनी पड़ती है। जहां लोगों की जेबें कटती हैं। तब तक पास में अपने पोते को गोद में लिए बैठे एक दूसरे मोटे सज्जन ने कहा कि अनाज बंद हो गया है। पहले तो उनकी बात समझ में नहीं आयी। मेरे यह कहने पर कि मोदी जी तो देश में घूम-घूम कर कह रहे हैं कि वह 80 करोड़ लोगों को बैठा कर खिला रहे हैं। इस पर उन्होंने मामले को और साफ करते हुए कहा कि कार्ड होने के बावजूद कोटे से अनाज नहीं मिलता है। 

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यह बिल्कुल नये किस्म का मामला था। और अपने तरीके से रहस्यमयी भी। क्योंकि कॉर्ड है तो कोटे से अनाज क्यों नहीं? उनसे कुछ दूरी पर बैठे एक दूसरे सांवले सज्जन ने इस रहस्य से पर्दा उठाया। उन्होंने बताया कि कोटेदार कॉर्ड के अलावा आधार कार्ड या फिर इसी तरह के दूसरे दस्तावेजों की मांग करता है जो आमतौर पर सभी लोगों के पास नहीं होते हैं। और फिर उन्हें अनाज मिलने से वंचित कर दिया जाता है। यानि अनाज न देने के बहाने तलाशे जाते हैं। जिसकी मार सीधे-सीधे गरीबी की रेखा के नीचे जीवन बसर करने वालों पर पड़ती है। उनकी इस बात का पास बैठे सभी लोगों ने समर्थन किया। यह पूछे जाने पर कि इस तरह से इलाके के कितने परिवार हैं जिनको अनाज नहीं मिल पाता तो बताया गया कि 300 से लेकर 400 तक। एक छोटे इलाके में अगर यह संख्या इतनी है तो आसानी से समझा जा सकता है कि कोटे के अनाज में किस तरह के बड़े भ्रष्टाचार का बोलबाला है। यह गुजरात में ‘व्यवहार’ का नया रूप है। इसके अलावा इलाके के लोग बिजली के बिल से भी खासे परेशान हैं। चश्माधारी सांवले वाले सज्जन का कहना था कि बिजली के बिल ने तो जान ही निकाल ली है। 

एक हजार से लेकर 1500 रुपये तक बिजली का बिल आता है। बिजली का मीटर तो राजधानी ट्रेन की माफिक भागता है। आपको बता दें कि अहमदाबाद में बिजली वितरण का काम निजी कंपनियों के हाथ में है। और यहां टोरेंट कंपनी इस काम को करती है। जिसके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगते रहे हैं। बावजूद इसके आज तक उसका कोई बाल-बांका नहीं कर सका। जबकि गरीब तो गरीब मध्य वर्ग के लोग कई बार इसके खिलाफ सड़कों पर उतर चुके हैं। लेकिन सरकार के कान में जू तक नहीं रेंगी। और शायद बेतहाशा कमाई का यही नतीजा है कि टोरेंट कंपनी दिन दूनी और रात चौगुनी के हिसाब से तरक्की कर रही है। और आज उसने देश भर में पेट्रोल पंपों और सीएनजी गैस स्टेशनों का जाल बिछा दिया है। लेकिन सबको पता नहीं है कि उसने यह मुकाम गुजरातियों का खून चूसने के जरिये हासिल किया है। मोदी जी ऐसे ही नही कहते हैं कि उनके खून में व्यापार है। अब समझ में आ रहा है कि आम गुजरातियों के खून को सीधे-सीधे व्यापारियों के मुनाफे से कैसे जोड़ा गया है।

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सज्जन का कहना था कि गरीबों की अपनी कमाई का एक हिस्सा बिल चुकाने में ही चला जा रहा है। महंगाई शब्द सुनते ही लोग मानो उबल पड़े। कई आवाजें एक साथ फूट पड़ीं। तकरीबन एक सुर में सभी ने कहा कि सारी चीजें महंगी हो गयी हैं। खाने-पीने से लेकर तेल-अनाज सब के दाम आसमान छू रहे हैं। पास खड़े चारखाने की शर्ट पहने एक युवक ने इसको और साफ करते हुए बताया कि गैस का दाम है, पेट्रोल है, शिक्षा सब कुछ महंगी हो गयी है। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने एक स्थानीय स्तर की बड़ी समस्या की तरफ भी इशारा किया। उन्होंने अपने सामने के इलाके को दिखाते हुए बताया कि यहां बरसात में कमर तक पानी लग जाता है जिससे इलाके में आना-जाना मुश्किल हो जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि गटर लाइन कमजोर है और उससे पानी की निकासी नहीं हो पाती है। नतीजतन लोग नाले के पानी से होकर ही अपने घरों या फिर बाहर आने-जाने के लिए मजबूर होते हैं। 

इस बीच बातचीत के स्थान पर एक महिला पहुंच गयीं। एत्तल नाम की इन महिला से जब बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछा गया तो उन्होंने जो तस्वीर पेश की वह बेहद परेशान करने वाली थी। उन्होंने बताया कि उनके दो बच्चे हैं एक 9 साल का, दूसरा 15 साल का। उनका कहना था कि वह अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं भेजती हैं। क्योंकि वहां पढ़ाई नहीं होती है। उनके दोनों बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं। एक बच्चे की फीस माफ है जबकि दूसरे बच्चे की फीस के मद में 15 हजार रुपये देने पड़ते हैं। यह पूछने पर कि पति क्या करते हैं? उन्होंने बताया कि कूरियर में सर्विस करते हैं और वह खुद गृहणी हैं। ऐसे में सिर्फ और सिर्फ बच्चे के भविष्य के लिहाज से पति-पत्नी अपने मेहनत की आधी कमाई प्राइवेट स्कूलों के हवाले कर दे रहे हैं। और यह आम नजारा है। तकरीबन उन सारे परिवारों को इन्हीं स्थितियों से गुजरना पड़ रहा है जिनको अपने बच्चों के भविष्य की फिक्र है। 

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हां एक चीज यहां जो भरपूर मात्रा में दिखी वह मंदिर है। लबे मेन रोड से कतार में तीन बड़े मंदिर दिखे। हालांकि उनमें रखी मूर्तियां जानी-पहचानी नहीं थीं। वो किसी आसानी से न पहचाने जाने वाले देवी-देवताओं की थीं। यह सिलसिला यहीं नहीं खत्म हुआ हर गली के प्रवेश द्वार पर एक छोटा मंदिर दिखा। इतना ही नहीं बाहरी दीवारों पर लगी प्लेटों को भी नहीं बख्शा गया था उन पर भी किसी न किसी देवी-देवता की फोटो चस्पा कर दी गयी थी। देखने में यह अहसास हो रहा था कि मानो हम किसी दलित नहीं बल्कि मंदिरों की बस्ती में प्रवेश कर गए हों। आम तौर पर यूपी और बिहार की दलित बस्तियों में जाने पर अंबेडकर की प्रतिमा या फिर उनकी फोटो दिख जाती है। लिहाजा यह नजारा देखने के बाद हमने बरबस पूछ ही लिया कि क्या कोई अंबेडकर की भी यहां प्रतिमा है? तो मंदिर के पास खड़े एक सज्जन ने उसके कुछ दूरी पर होने की बात कही। लेकिन यह बात गौर करने वाली है कि दलित बस्ती में किसी भी दरवाजे या फिर दीवार पर अंबेडकर की कोई फोटो नहीं दिखी। 

आप को यहां यह बात याद दिलाना जरूरी है कि 2002 के गुजरात दंगों में मुसलमानों की हत्याओं में इन दलितों का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया गया था। अनायास नहीं दलित अशोक मोची उसके प्रतीक बन गए थे। और दंगाइयों के एक ब्रांड के तौर पर पेश किए जाने लगे थे। हालांकि बाद में उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने अपनी उस छवि के लिए लोगों से माफी मांगी। और साथ ही यह भी बताया कि वह उनकी प्रायोजित फोटो थी। जिसे एक कैमरा मैन के कहने पर उन्होंने वह पोज दिया था। मौजूदा स्थित यह है कि आजकल वह बीजेपी के खिलाफ जबर्दस्त हमलावर रुख रखते हैं। 

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आखिर में इलाके की राजनीतिक तस्वीर और उसके समीकरणों पर बात किए बगैर यह बात पूरी नहीं होगी। दानी लिमड़ा अहमदाबाद के पश्चिम में स्थित सुरक्षित सीट है। जिसकी आबादी तकरीबन तीन लाख तीस हजार है। और उसमें वोटरों की संख्या तकरीबन 2 लाख 60 हजार है। पिछली बार यानी 2017 के विधानसभा चुनाव में यहां से कांग्रेस के प्रत्याशी शैलेश परमार जीते थे। दलितों की आबादी 20 फीसदी और मुस्लिम 40 फीसदी का निर्माण करते हैं। पार्टियां यहां मुस्लिम दलित समीकरण को साधने के प्रयास में मुस्लिम या फिर दलित उम्मीदवार खड़ी करती हैं। कांग्रेस ने एक बार फिर शैलेश परमार पर अपना दांव लगाया है। जो दलित समुदाय से आते हैं। इसके अलावा बीजेपी, आप और ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने भी अपने प्रत्याशी उतारे हैं। ओवैसी ने इस बार एक महिला कौशिक परमार को अपना प्रत्याशी बनाया है। 

(अहमदाबाद से महेंद्र मिश्र की रिपोर्ट।)

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