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लेबनान सरकार को अवाम ने उखाड़ फेंका, राष्ट्रपति और स्पीकर को हटाने पर भी अड़ी

आखिरकार आंदोलनरत लेबनान की अवाम ने सरकार को उखाड़ फेंका। लोहिया ने ठीक ही कहा था कि जिंदा कौमें पांच साल इंतज़ार नहीं करतीं। देश भर में सरकार के खिलाफ़ भड़के गुस्से के बाद सोमवार को लेबनान सरकार की पूरी कैबिनेट ने इस्तीफा दे दिया। प्रदर्शनकारी सिर्फ़ सरकार को हटाकर खुश नहीं हैं। अब वो राष्ट्रपति मिशेल एउन और संसद स्पीकर को भी हटाने पर अड़ गए हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि हम इन्हें भी हटाकर ही दम लेंगे, देखते हैं इसमें कितने दिन लगते हैं।

प्रधानमंत्री हसन दिआब और पूरे मंत्रिमंडल के इस्तीफा देने से कुछ दिन पहले ही सरकार के 20 में से तीन मंत्री और 128 सांसदों में से सात संसद सदस्यों ने इस्तीफा देकर सरकार और मंत्रिमंडल पर अपना अनुसरण करने के लिए दबाव बना दिया था।

इस्तीफा देने के बाद टीवी पर बोलते हुए प्रधानमंत्री हसन दियाब ने कहा, “हम लोगों के साथ खड़े होने, उनके साथ बदलाव की लड़ाई छेड़ने के लिए ये कदम उठा रहे हैं।” साथ ही उन्होंने लेबनान की समस्याओं को ठीक करने के अपने प्रयासों को विफल करने के लिए, अपने राजनीतिक दुश्मनों को दोषी ठहराया, हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया।

अपने संबोधन में हसन दिआब ने खुद को प्रदर्शनकारियों के पक्ष में रखा और देश की समस्याओं के लिए पुराने भ्रष्टाचार को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा, “मैंने पाया कि भ्रष्टाचार की व्यवस्था राज्य से बड़ी थी, और राज्य इस प्रणाली से संबद्ध है। ऐसे में इसका सामना करना या इससे छुटकारा पाना संभव नहीं है। ये लोग लेबनान के लोगों की वास्तविक त्रासदी हैं। हम लोगों के साथ खड़े होने, उनके साथ बदलाव की लड़ाई छेड़ने के लिए पीछे हट रहे हैं।”

बता दें कि इंजीनियरिंग के प्रोफेसर और पूर्व शिक्षा मंत्री डायब, शक्तिशाली आतंकवादी समूह और राजनीतिक पार्टी हिजबुल्लाह के समर्थन के साथ प्रधानमंत्री कार्यालय में आए थे, जब उनके पूर्ववर्ती साद हरीरी ने अक्टूबर 2019 में इस्तीफा दे दिया था।

विस्फोट के बाद से ही आंदोलनरत थी अवाम
पिछले हफ्ते राजधानी में हुआ विस्फोट कितना बड़ा और व्यापक था, जिसके चलते लेबनान सरकार को इस्तीफा तक देना पड़ा, सहज ही समझा जा सकता है। पिछले सप्ताह हुए विस्फोट में 200 से अधिक लोग मारे गए थे। छह हजार लोग जख्मी हुए थे, जबकि हजारों लोग बेघर हो गए थे।

5 अगस्त 2020 को लेबनान की राजधानी बेरुत के बंदरगाह में अमोनियम नाइट्रेट के भंडार में हुए विस्फोट के बाद से लेबनान की आक्रोशित जनता लगातार विरोध-प्रदर्शन कर रही थी और प्रदर्शन लगतार हिंसक भी होता जा रहा था।

हाल के दिनों में बेरूत में विरोध, प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच युद्ध स्थल में बदल गया है। मुंह पर मास्क और काला गॉगल पहने प्रदर्शनकारी पिछले तीन दिनों में तीन बार संसद की ओर कूच करते हुए रास्ते में लगे बैरिकेड पर चढ़ गए और पुलिस पर पथराव कर दिया। हर बार पुलिस ने आंसू गैस और रबर बुलेट का इस्तेमाल किया, लेकिन प्रदर्शनकारी डटे रहे।

भ्रष्टाचार और आर्थिक संकट से व्यवस्था परिवर्तन की भड़की चिंगारी
बिगड़ते आर्थिक संकट और कई दशकों के भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन को लेकर पहले से ही संकटग्रस्त लेबनान हिंसक विरोध प्रदर्शनों से हिल गया। स्थानीय मुद्रा ने अपने मूल्य को बहुत हद तक खो दिया है और बेरोजगारी और मुद्रास्फीति की दर बढ़ गई हैं। इन समस्याओं से लेबनान में विस्फोट से उबरने की क्षमता में बाधा आएगी। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अब चार्ज कौन संभालेगा, जिसमें संभावित रूप से सहायता पैकेज शामिल हैं।

मार्च में अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने के कारण लेबनान ने देश के इतिहास में पहली बार विदेशी बॉन्ड के लिए 1.2 बिलियन डॉलर के भुगतान पर डिफॉल्ट हुआ। डियाब की सरकार ने 30 अप्रैल को एक रिकवरी योजना जारी की, जिसमें कहा गया था कि अर्थव्यवस्था मुक्त गिरावट में है और लेबनान अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से 10 अरब डॉलर की सहायता लेगा, लेकिन कई दौर की वार्ताओं के बावजूद समझौते तक पहुंचने में विफल रहा और वो सहायता कभी नहीं आई।

मुद्रा दर लगातार गिरती रही, पिछली गिरावट के बाद से इसका मूल्य 80% तक कम हो गया, क्योंकि कई लेबनानी नौकरियां चली गईं और कारोबार बंद हो गए।

राजनीति से अभिजात वर्ग के वर्चस्व को खत्म करने पर अड़े प्रदर्शनकारी
सत्ता बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती। किसी भी देश की व्यवस्था को तब तक नहीं बदला जा सकता, जब तक कि व्यवस्था में काबिज उस वर्ग को नहीं हटाया जाता है, जोकि व्यवस्था की गड़बड़ी के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार है। लेबनान के लोगों की समझ में ये बात भलीभांति आ गई है, तभी वो सरकार को उखाड़ फेंकने के बावजूद राजनीतिक व्यवस्था से एलीट वर्ग को उखाड़ फेंकने पर अमादा हुए हैं।

आर्थिक संकट से उपजे गुस्से में विवेक और राजनीतिक समझ ने लेबनान के प्रदर्शनकारियों को यह विश्वास दिलाया है कि देश के आर्थिक हालात सुधारने के लिए दूरगामी राजनीतिक बदलावों और प्रधानमंत्री हसन दिआब को यहां तक पहुंचाने में मददगार नेताओं को निर्वासित करने से कम में काम नहीं चलेगा।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि देश की राजनीति से अभिजात वर्ग के कब्जे को हटाने के लिए हसन दिआब सरकार का इस्तीफा उनकी उम्मीदों और मांगों से बहुत कम है। हमें संसद के स्पीकर नबीह बेर्री और राष्ट्रपति मिशेल एउन को भी हटाना होगा।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

This post was last modified on August 11, 2020 10:57 am

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