Sunday, October 17, 2021

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शरणार्थी बने 40 परिवारों को घर लौटने की बात से ही लगता है डर

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नई दिल्ली। यमुना पार के गढ़ी मेंडू गांव से 40 परिवारों के तकरीबन 200 लोग पलायन कर गए हैं। सभी लोगों ने पुराने खजूरी ख़ास में स्थित राजीव विहार के सामुदायिक भवन में शरण ले रखी है। इनके घर, मस्जिद, वाहनों को तोड़ा-फोड़ा, लूटा और फिर जला दिया गया। उसके बाद ‘भाग जाओ यहां से, वरना मारे जाओगे’ कहते हुए मार-पीटकर उन्हें भगा दिया गया। हमलावर बाहर से थे लेकिन घर के भेदियों की अंगुली पकड़कर आए थे। डरते-डरते कुछ लोग बयान करते हैं। 

हमला होने पर मो. हनीफ जंगलों के रास्ते घर से निकल भागे। हनीफ ने बताया कि “जब 24 तारीख़ को अजान देते वक़्त मस्जिद में इमाम साहब पर हमला हुआ तो वो हमारे घर की तरफ भाग आए। हम उनको बचाने आए। लेकिन जब हमने देखा कि उनके पीछे 15-20 लोग हैं तो हम वापस अपने घर में घुस गए। उनको बचाने नहीं गए। जैसे ही इमाम आगे गए। हमलावरों ने हमारे घर को घेर लिया। हमें निकलने नहीं दिया। वो लोग बाहर खड़े होकर चिल्लाने लगे – ‘मुल्लों निकलो, आज तुम्हें काटेंगे’। 

मस्जिद में की गयी तोड़-फोड़।

बत्ती बंद करके हम घर में ही बैठे रहे। जैसे ही वो साइड होने लगे तभी हम दो-तीन परिवार निकलकर जंगल की तरफ से तीसरे पुस्ते पर निकल गए। फिर शास्त्री पार्क में अपने रिश्तेदार के घर एक दिन रहे। 25 तारीख़ को सारे मुस्लिम परिवारों को पहले लूटा गया फिर सभी घरों में आग लगा दी गयी। जब हमें पता चला कि सब यहां आकर रुके हैं हम भी यहीं आ गए।”

74 साल के महबूब हसन गढ़ी मेंडू मस्जिद के इमाम हैं। उन्होंने बताया कि ‘पीर के दिन 24 तारीख़ को रात करीब 9.30 पर हम नमाज़ की तैयारी कर रहे थे। तभी मस्जिद की छत पर बहुत ज़ोर से पत्थर आया। मैं देखने बाहर आया तो वहां 10-15 आदमी खड़े थे। उन्होंने मुझे पकड़कर डंडों से पीटना शुरु कर दिया। मैं गिर गया। उठकर बाहर भागा तो वहां भी 10-15 आदमी खड़े थे। फिर उन्होंने मारा। वहां से भागा तो आगे 4-5 आदमी खड़े मिले। वो भी मारने लगे। हमला करने वालों ने तीन मोर्चे बना रखे थे। एक मस्जिद के अंदर एक बाहर और एक कुछ दूर हटकर’।

बिल्कुल बांयी तरफ दाढ़ी में इमाम महबूब हसन।

यह पूछने पर कि आपको क्यों मार रहे थे। महबूब हसन ने कहा कि ‘‘कह रहे थे अजान पढ़ोगे…पढ़ोगे अजान…क्यों पढ़ी अजान तुमने? मैंने कोई जवाब नहीं दिया और अपने घर आया भाग कर। प्रधान जी के घर के पास ही मेरा मकान है।”

यह पूछे जाने पर कि क्या प्रधान जी हिंदू हैं। उन्होंने कहा कि‘‘हां, गूजर हैं। प्रधान जी का लड़का कहने लगा कि जाना नहीं यहां से। मैंने उनकी बात पर यक़ीन नहीं किया। और हम अपने परिवार के साथ अपना घर-सामान सब छोड़कर यहां भाग आए।” उन्होंने कहा कि ‘‘24 तारीख़ से पहले हम ठीक-ठाक रह रहे थे। बेफिक्र होकर। कोई दिक्कत नहीं थी। ऐसा आभास भी नहीं हुआ कि कुछ होने वाला है।” 

सामुदायिक भवन में बच्चे।

जान के नुकसान के सवाल पर उन्होंने कहा कि ‘नहीं, कोई जान नहीं गई। चोटें आई हैं लोगों को बहुत। ईंट-पत्थर मारे गए हैं। निसार भाई के घर में बेटी की शादी का दहेज रखा था। सब लूट कर ले गए। मकान तोड़े-फोड़े गए।” इस पूरे वाकयात के बाद लोग बेहद डर गए हैं। और जल्द वापस जाने के लिए भी नहीं तैयार हैं। इमाम साहब ने कहा कि ‘‘देखो जी, ऐसी पोजिशन में तो हम नहीं जा सकते। 24 तारीख़ से हम यहां हैं। वापस नहीं गए। सुना है पीछे से घर में तोड़-फोड़, चोरी हुई है।” 

लौटने की संभावना के सवाल पर उनका कहना था कि ‘‘डर है हमें। जब तक पुलिस की सेफ्टी ना हो, भरोसा ना हो कैसे जाएंगे वहां पर। पहले उनकी गिरफ्तारी हो जिन्होंने हमारे साथ ऐसा किया है। उन पर मुकदमा चले तब कहीं कुछ हो।”

सामुदायिक भवन के बाहर विधिक कार्यवाही।

लिहाजा अपने घरों को लौटने की जगह लोग किराए पर रहने के बारे में सोच रहे हैं। इमाम महबूब हसन भी कुछ यही ख्याल रखते हैं। उन्होंने कहा कि ‘‘ कहीं किराए पर मकान देखेंगे। ये तो मुसाफ़िर खाना है। यहां कैसे रहेंगे।”

खाना-पीना मिलने के सवाल पर उन्होंने कहा कि ‘‘कुछ सामाजिक लोग मदद कर रहे हैं। कोई कुछ दे जाता है, कोई कुछ ऐसे ही चल रहा है। खजूरी के लोग भी मदद कर रहे हैं।”  

गढ़ी मेंडू से ही अंजुम भी अपने पिता बहन-भाई और छोटे-छोटे बच्चों के साथ 24 फरवरी से ही समुदाय भवन में हैं। 

अपने साथ घटी घटना के बारे में अंजुम ने बताया कि ‘‘हमारा तो मकान जला दिया। बच्चे लेकर हम भाग आए वहां से बस। हमारे सामने मकान जलाया। हमने हाथ-पैर भी जोड़े पर वो माने ही नहीं। ये और कह दिया कि -‘‘चले जाओ, वरना तुम्हें भी मार देंगे।”  अपने-अपने बच्चे लेकर हम सब चले आए। पैसा-कौड़ी सब छोड़ आए।” 

मकान-सामान को नुकसान पहुंचा रहे थे… मुझे बीच में ही रोकते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘पर इंसानों को छोड़ दिया। जो नहीं जा रहे थे। उनको मार-मार कर भगाया है।” 

अंजुम किराए पर रहते हैं और उनकी एक परचून की दुकान है। उसी से उनके घर परिवार का पेट पलता था। दंगाइयों ने उसे भी लूट ली। आगे की योजना के बारे में बात करते हुए अंजुम ने भी वहां जाने से इंकार कर दिया। उनका कहना था कि वहां खतरा है। उनके बच्चे सयाने हैं और उन्हें डर लगता है।

यह पूछने पर कि इससे पहले भी कभी इस तरह से डर लगा था उन्होंने न कहते हुए सिर हिलाया। कभी डर की कोई बात नहीं थी। छोटी-मोटी तो वो धमकी देते थे कि ‘‘तुम्हें बताएंगे…तुम्हें बताएंगे।”  पर ऐसा कभी नहीं सोचा था कि इतना कुछ हो जाएगा।   

यह पूछने पर कि ऐसी धमकी उन्हें मुसलमान होने के चलते मिलती थी। उन्होंने हां में सिर हिलाया। घटना के बारे में उनका कहना था कि उन्हें क्या पता ऐसा उन लोगों ने क्यों किया? पास बैठे अपने पिता की तरफ इशारा कर अंजुम ने बताया कि ये मेरे पिता हैं। इनका भी सारा मकान जला दिया। कुछ दिन बाद मेरी बहन की शादी थी। उसके लिए सामान-चीज़ें इकट्ठा कर रहे थे। सब लूट लिया। घर में आग लगा दी। ये इतने बूढ़े हैं। क्या अब इनके बस का है कमाना? कैसे गृहस्थी जोड़ेंगे। छोटी बहन की शादी कैसे कर पाएंगे हम लोग। उन लोगों ने किसी पर तरस नहीं खाया। सबके घर जला दिए।

अंजुम से बात करके जैसे ही हम आगे बढ़े इमाम महबूब हसन हमें बुला कर कहते हैं कि ‘‘मुझे एक बात और कहनी है। अगर कहीं पर भी दो हिंदू, दो मुसलमान रहते हों। और हिंदू भाई के कुछ रिश्तेदार दूर रहते हों और उसके साथ कोई परेशानी हो जाए तो जो उसका पड़ोसी मुसलमान है फौरी तौर पर वही साथ देगा ना, या कोई और देगा? हमने हर हाल में उनका साथ दिया। लेकिन हमें उन लोगों ने नाजायज़ मारा। कोई ग़लती नहीं थी हमारी, किसी आदमी की भी। क्या अब हम उनका साथ दे देंगे? कोई भी नहीं देगा। 

इस पूरी घटना ने महबूब हसन के जिस्म ही नहीं ज़हन पर भी गहरे ज़ख़्म दिए हैं। सिर पर लगी चोट के ज़ख़्म तो भर गए हैं लेकिन उनके दिल का घाव भरने में पता नहीं कितना समय लेगा। और वह उपचार मिलेगा इसका भी क्या ठिकाना?

श्री राम काॅलोनी से गढ़ी मेंडू के लोगों की सहायता करने सायरा और शबनम रोज़ समुदाय भवन आती हैं। इनके बड़े भाई के 30 साल के बेटे बब्बू को राजीव विहार के ढलान से पहले पड़ने वाली लाल बत्ती पर ही 25 फरवरी शाम करीब 4 बजे पीट-पीटकर मार डाला गया। देखने वालों ने बताया कि पुलिस बाक़ायदा हमलावरों का साथ दे रही थी। 

बब्बू आॅटो रिक्शा चलाते थे। खाना खाने अपने घर श्री राम काॅलोनी लौट रहे थे। घर के नज़दीक ही उसकी हत्या कर दी गई। 

सायरा कहती हैं कि “बुरी हालत में ठेले पर लोग उसे घर लेकर आए। घर पहुंचने तक कोई-कोई सांस ही बची थी उसमें।”  

तभी शबनम बीच में बोल पड़ती हैं, ‘‘वो बच कर कूड़ेदान में छुप गया था। पुलिस वालों ने कहा, ‘साले को बाहर निकालो, मारो ये रहा’। फिर दंगाइयों ने डंडों-लठों से मारा। चार जगह से सिर फटा हुआ था उसका। उसके तीन छोटे-छोटे बच्चे हैं। एक बच्चा तो 8 महीने का ही है। किराए के मकान में रहते हैं। बूढ़े मां-बाप हैं। पिता 9 साल से बीमार हैं। वो कोई काम नहीं कर सकते।” 

इस तरह की पुलिस की भूमिका दंगे में जगह-जगह दिखी है। जहां रोकने की जगह पुलिसकर्मियों ने खुलकर दंगाइयों का साथ दिया है। मुस्तफाबाद की मस्जिद के इमाम के साथ भी यही हुआ था। इमाम साहब ऊपर मस्जिद के एक कमरे में छुप गए थे। उनका कहना है कि पुलिस ने उन्हें पकड़ कर दंगाइयों के हवाले कर दिया। और फिर हमलावरों ने उनके चेहरे पर तेजाब फेंक दी। जिसमें उनकी दो आंखें चली गयीं। 

श्री राम काॅलोनी में और जान-माल के नुकसान के सवाल पर शबनम ने कहा कि नहीं, बस यही एक बच्चा मारा गया है। बाक़ी उनके यहां और कुछ नुकसान नहीं हुआ। उनके सभी पड़ोसी हिंदू हैं। सब के साथ अच्छे रिश्ते हैं। 

उनका कहना था कि “थोड़ा पक्की खजूरी वालों ने, नाले के उस पार जो घर हैं उन्होंने लोगों को उकसाया कि तुम लड़ो। लड़कियों के सामने छत पर खड़े होकर बदतमीज़ी की। पर फिर भी हमारी तरफ़ के लोग दबकर बैठे रहे कि दंगा करने से क्या फ़ायदा।”

समुदाय भवन से गढ़ी मेंडू के लोगों की आपबीती सुनने के बाद हम गांव गढ़ी मेंडू पहुंचे। उनके बताए हालात का जायज़ा लेने। पुस्ते के नीचे से जब आप गांव में दाखि़ल होते हैं तो पाते हैं कि इस रास्ते से किसी बाहरी का आना आसान नहीं है। अगर यहां के निवासी न चाहें तो। 

जब हम गांव में दाखि़ल हुए तो सामने ही 4-5 लोग कुर्सियों पर बैठे नज़र आए। जिनमें से दो ख़ाकी वर्दीधारी थे। हमने पास पहुंच कर बताया कि हम मीडिया से हैं। देखना चाहते हैं क्या हुआ गांव में? वो हमारी मौजूदगी से कुछ असहज जरूर लगे लेकिन गांव में जाने की इजाजत दे दी। गली के शुरू में ही हमें कालिख पुती, जली हुई एक कारखाना टाइप बड़ी सी दुकान नज़र आयी। एक के बाद एक गली के भीतर और बाहरी रोड पर कई दुकानें, घर, मोटर साइकिलें, तांगा, ट्रक, मस्जिद जले और टूटे-फूटे देखे हमने। 

गली में थोड़ा और अंदर जाने पर अपने मकान के सामने चारपाई पर बैठा एक बुजुर्ग शख्स नजर आया। पूछने पर पता चला कि ये मोहम्मद इलियास हैं। मोहम्मद इलियास ने बताया कि पड़ोस में रहने वाले भीम ने ही उन्हें परिवार सहित अपने घर में शरण दी। रात भर छुपाए रखा। इलियास हालांकि गांव में ही मौजूद हैं पर उनका बाक़ी परिवार सामुदायिक भवन में है। 

मोहम्मद इलियास ने बताया कि 25 फरवरी को करीब नौ बजे रात में अचानक दंगाई आए और तोड़-फोड़ करने लगे। कहां से आए थे लोग पूछने पर उन्होंने बताया कि ‘‘ये पता नहीं कहां से आए, किधर से आए।”

मोहम्मद इलियास बायें।

संख्या के सवाल को भी टालने के अंदाज में वह बताते हैं कि ‘अब अंधेरे में क्या पता चले कि कितने लोग थे। आए भगदड़ मचने लगी। लूटमार करने लगे। आग लगाने लगे। हम भी बंद हो गए घर में’।

उन्होंने आगे बताया कि “जब चारों तरफ आग लगने लगी तो हमने सोचा कि हम तो जलकर मर जाएंगे। तब मैंने दरवाज़ा खोला तो सामने वाले गूजर भीम भाई थे यहां। ये लोग हमें निकालकर अपने घर ले गए। हमें बचाया, चाय भी पिलाई।”

मस्जिद के बारे पूछने पर इलियास ने बताया कि ‘‘मैं अभी देखने नहीं गया हूं। सुन रहा हूं कि तोड़-फोड़ हुई है।”

25 तारीख़ को हमला हुआ। 26 से सब शांत है और इलियास गांव ही में हैं। पर नज़दीक की मस्दिज को देखने अब तक नहीं गए। यह बातचीत उनसे 2 मार्च को हुई थी। 

पुलिस कब आई पूछने पर इलियास ने बताया कि ‘‘पुलिस तो 25 की रात को भी आई थी।”

कार्रवाई के सवाल पर उन्होंने कहा कि ‘‘हमारी तो पुलिस से बात हुई नहीं है। हम जबसे इन लोगों में हैं, बचे हुए हैं।”

एक नौजवान ने पास ही खड़े एक आदमी को दिखाते हुए कहा – ये भी था उस दिन मौके पर… फिर उस आदमी से ज़ोर से कहा -‘‘बता।”

मेरे पूछने पर महोम्मद फिरोज़ नाम के उस शख़्स ने बताया कि ‘‘ऐसी कोई बात नहीं है। मैं किराएदार हूं। यहां रहता हूं। इन लोगों ने हमारी सुरक्षा कर रखी है। रात को हंगामा हुआ था। ये लोग थे मजबूत। हम किरायेदारों से कुछ नहीं कहा। 

जिन लोगों का मकान था उनके मकानों में आग लगाई। (नौजवान की तरफ इशारा करते हुए) लेकिन इन लोगों ने नहीं लगाई। बाहर के आदमी थे। ये तो हमको बोला – ‘‘तुम सब रहो यहां पर, खाओ-पीयो मज़ा लो बेटा, तुम लोगों को कुछ नहीं होगा।”  मैं भी मुसलमान का बच्चा हूं। हमारे भी बच्चे हैं। मैं 15-16 साल से यहां रह रहा हूं।”

महोम्मद फिरोज गांव के ही कारखाने में काम करते हैं। 

तभी वहां गांव के बुर्जुग और भाीम के पिता रविन्दर आ गए। उन्होंने बताया कि हमने इलियास के परिवार को बचाया जब आग लग रही थी। अपने घर रखा रात भर। 

एक मुस्लिम को शरण देने में डर के सवाल पर उन्होंने कहा कि ‘‘नहीं हमें डर नहीं लगता।” यह पूछने पर कि भीड़ तो किसी को पहचानती नहीं। रविंदर ने कहा कि ‘‘नहीं भीड़ तो तब बाहर निकल गई थी। हमने भाईचारे में इलियास को बचाया। हमने तो सबसे कहा था कि यहीं रहो सब। पर कुछ लोग दोपहर को चले गए। पर इन्हें हमने यहीं रखा।”  

हमलावरों की पहचान के सवाल पर उन्होंने कहा कि ‘‘हां जी, बाहर के लोग थे। वो पहचाने नहीं जा रहे थे। उनका जहां जैसे भी जुगाड़ लगा वहां उन्होंने आग लगा दी। और फिर निकल गए।”   

पलायित लोगों के वापसी के सवाल पर उन्होंने कहा कि ‘‘कोई दिक्कत नहीं होगी। जो गए हैं आ जाएं। मैंने तो एक के पास फ़ोन भी किया था। तुम लोग आ जाओ यहां। डरो मत किसी से हम हैं यहां।”  

यह कहने पर कि लोग दहशत में हैं। क्यों न आप कुछ लोग मिलकर जाएं और उन्हें लेकर आएं? रविन्दर ने कहा कि ‘‘हमने कल राह देखी थी उनकी। वो बाद में आए एसडीएम के साथ। फिर चले गए। मुझे नहीं मिले। मुझसे मिलते तो मैं उनसे रिक्वेस्ट करता। भाई जैसे तुम हो वैसे हम हैं। भाईचारे से रहो, प्यार से। कोई दिक्कत नहीं है। ना हमें ना तु्म्हें। ये तो बाहर का एक भूचाल आया था जो कर गया। पहले से प्यार है। इनसे कोई बैर थोडे है। ना इनसे हमें, ना हमें इनसे। न कोई ईर्षा। 

जब रविन्दर ने बताया कि वह इलियास के यहां ही चाय पी लेते हैं। जबकि इनका कहना है कि इनके यहां कोई चाय नहीं पीता। ऐसा कहते हुए वह मुसलमानों और हिंदुओं के बीच खान-पान की दूरियों और अलगाव को अनजाने ही बयान कर जाते हैं। 

शायद रविन्दर जिन परिवारों के नज़दीक हैं उन लोगों को ही उन्होंने संरक्षण दिया। अपनी ज़िम्मेदारी पर और बाक़ी को ना दे पाए हों। पर हमें ये भी लगा कि कुछ लोगों को जो उनके नज़दीक उनके काम के हैं इसलिए भी बचाया गया जिससे उन्हें बतौर गवाह पेश किया जा सके। ये बताने के लिए कि गांव का कोई शख्स इस भूचाली वारदात में शामिल नहीं था। पर तथ्य जो हमारे सामने गांव में मौजूद थे वे इन गवाहियों को नकार रहे थे।

रविन्दर जिस इत्मिनान से बात कर रहे थे। उससे साफ ज़ाहिर था कि ये हमला उनके लिए नहीं था। उनके घर-परिवार सुरक्षित थे। वो उसमें भले शामिल न रहे हों पर मूक दर्शक की भूमिका में ज़रूर थे।

उन्होंने बताया कि ख़तरा तो हमें भी था पर हम भागे नहीं। जब ख़तरा बराबर था तो दंगाईयों ने गांव के हिंदुओं के घर क्यों नहीं लूटे, जलाए? कोई गूजर डरकर गांव छोड़कर क्यों नहीं गया? बाहर के दंगाईयों को कैसे पता कौन सा घर मुसलमान का है कौन सा हिंदू का? चुन-चुनकर मुसलमानों के घर ही क्यों निशाना बने? 

जिस तरह दिल्ली के बाक़ी इलाकों में लोगों को मारा गया। अपमान किया गया। ऐसा यहां नहीं हुआ। घर-सामान बरबाद किया। डराने के लिए पीटा और जाने दिया।

पूरे गांव में 30-40 घर मुसलमानों के हैं जो एक साथ भी नहीं छिटके हुए हैं। लगभग सभी ग़रीब, रोज़ खाने-कमाने वाले। देखा जाए तो ना ताकत ना हैसियत किसी भी लिहाज से गांव के ये अल्पसंख्यक बहुसंख्या के लिए चुनौती नहीं थे। बल्कि उनके काम आने वाले लोग थे। जो नहीं रहेंगे तो आने वाले वक़्त में उन्हें परेशानी ही होने वाली है। फिर भी इनके साथ ऐसा बर्ताव क्यों किया गया?

संघ-बीजेपी सत्ता ने नफ़रत का जो यज्ञ शुरु किया है क्या उसमें आहुति डालना ज़रूरी और मजबूरी बन गया है? और क्या इससे ये भी पता चलता है कि ताकत के लालच की भेड़चाल इंसानियत पर भारी पड़ती है? कि इंसानी ज़मीर और ज़हनी सुकून के लिए धड़कने वाले कलेजे भी अल्पसंख्यक हो गए हैं इस दौर में?

(जनचौक दिल्ली हेड वीना की रिपोर्ट।)

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