Friday, January 21, 2022

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प्रधानमंत्री जी, आप कैलाशा चले जाइये!

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प्रधानमंत्री जी अगर आप इस देश में सुरक्षित नहीं हैं तो आपको कैलाशा चले जाना चाहिए। जिस जनता के वोट के बल पर आप चुने गए अगर वही जनता आपको आपके खून की प्यासी दिख रही है तब तो फिर आपके पूरे संवैधानिक अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा हो जाता है। जिस जनता की सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी आप लिए हुए हैं आप उससे ही डर रहे हैं। यह अपने आप में विडंबनापूर्ण है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो आपने लोकतंत्र को ही सिर के बल खड़ा कर दिया है। सुरक्षा के पांच चक्रों के बीच अगर आपको अपनी जान का खतरा सता रहा है तो फिर इस देश की जनता की सुरक्षा का क्या हाल होगा। यह बता पाना किसी के लिए मुश्किल नहीं है।

अगर आपको एसपीजी सुरक्षा नहीं दे पा रही है जो इस देश की सर्वोच्च सुरक्षा एजेंसी है तो फिर अब किस पर भरोसा किया जा सकता है। उसके पीछे आईबी से लेकर राज्य की पुलिस तक दूसरी पांच से ज्यादा एजेंसियां लगी रहती हैं और कम से कम पीएम की सुरक्षा के मामले में वो अपना 100 फीसदी जिम्मेदारी निभाती हैं। लेकिन उसके बाद भी आप को अपनी जान जाने का खतरा सता रहा है। देश का नेतृत्व अगर इस तरह से भयभीत हो गया तो बाकी जनता असुरक्षा के किस मनोवैज्ञानिक स्थिति में पहुंच जाएगी वह आसानी से समझा जा सकता है। और अगर आप सचमुच में असुरक्षित महसूस कर रहे हैं तो इस स्थिति तक देश को लाने के लिए कौन जिम्मेदार है? इसकी प्राथमिक जवाबदेही किसी और की नहीं बल्कि आप की बनती है। 

आपका कार्यकाल शुरू होने के साथ ही जिस तरह से अल्पसंख्यकों समेत सरकार विरोधी लोगों के खिलाफ एजेंसियों और संघी हाइड्रा संगठनों को छोड़ दिया गया था उससे सचमुच में देश में अपने तरह की एक असुरक्षा पैदा हो गयी है। राह चलते लिंचिंग की घटनाओं ने केवल अल्पसंख्यकों को ही नहीं बल्कि आम नागरिकों को भी असुरक्षा के घेरे में डाल दिया था। पता नहीं किस बात पर किसी के खिलाफ कोई भीड़ उतर जाए और उसकी हत्या कर दे। कुछ कहा नहीं जा सकता था। और ऐसी कई घटनाएं कई जगहों पर हुईं। जिसके न केवल मुस्लिम बल्कि दूसरे लोग भी शिकार बने।

और उसका नतीजा यह रहा कि तमाम क्षेत्रों से असुरक्षा की तमाम स्वाभाविक आवाजें आनी शुरू हो गयीं। लेकिन उनका और उनसे जुड़े लोगों का आप के भक्त समेत संघी संगठनों के लोग मजाक उड़ाते रहे और किसी को पाकिस्तान तो किसी को दूसरे मुल्क भेजते रहे। और इस कड़ी में आपने देश को वहां ले जाकर खड़ा कर दिया है। जहां 20000 से ज्यादा ऊंचे तबके के लोगों ने पलायन कर दूसरे देशों की राह पकड़ ली है। इसमें आपके सबसे विश्वसनीय और दाहिने हाथ समझे जाने वाले अंबानी तक शामिल हैं जिन्होंने इंग्लैंड में अपना स्थाई आवास बना लिया है। वह एंटीलिया जैसे अपने बहुमंजिला महल में सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे थे। बावजूद इसके किसी ने अभी तक आप को कैलाशा में बसने की सलाह नहीं दी है। 

आपने अपनी इन हरकतों से न केवल पंजाब को बदनाम किया बल्कि एसपीजी की पूरी साख को ही दांव पर लगा दिया है। और उससे भी ऊपर दुनिया में इस बात का संज्ञान लिया जा रहा है कि भारत का प्रधानमंत्री खुद अपने देश में ही सुरक्षित नहीं है। ऐसे में तमाम देश भारत के बारे में क्या सोच रहे होंगे? यह आप से ज्यादा भला कौन समझ सकता है। लेकिन न तो आप को अपने देश से लेना-देना है और न ही उसकी साख से। आपको तो सिर्फ अपनी कुर्सी प्यारी है। अपने पूरे कार्यकाल के दौरान आपने देश की तमाम लोकतांत्रिक संस्थाओं को दो कौड़ी का बना दिया है। न उनकी साख रही और न ही वह अब अपने अस्तित्व को बचाने में सफल हैं।

दरअसल किसी के महामानव बनने की पहली शर्त ही यही होती है कि वह न केवल दूसरे लोगों बल्कि संस्थाओं तक को बौना कर दे और फिर उसकी कब्र पर ही इस तरह कोई भीमकाय शख्स खड़ा हो सकता है। जिस तरह से देश में आपकी जिंदगी के लिए आपके समर्थकों और तमाम संवैधानिक पदों पर बैठे लोग यज्ञ-होम और न जाने कितने किस्म के कर्मकांड और आयोजन कर रहे हैं दरअसल यह आपको महामानव बनाने का ही प्रायोजन है। 

पहली बात तो भटिंडा और फिरोजपुर के बीच जो कुछ भी हुआ वह सब आपकी एसपीजी के फैसलों के तहत हुआ। जिसने आपकी सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी ले रखी है। और अभी तक जो चीजें सामने आयी हैं उनमें बीजेपी समर्थक झंडे लेकर आपके काफिले के सबसे नजदीक नारेबाजी करते दिख रहे हैं अगर किसी से आप की जान को खतरा हो सकता था तो वह उन्हीं लोगों से न कि दो किमी दूर बैठे उन किसानों से जिन्होंने पिछले 1 साल से देश में शांतिपूर्ण आंदोलन चलाने की ऐतिहासिक मिसाल कायम की है। और यह बात हर सोचने-समझने वाला शख्स जानता है कि एसीपीजी की सुरक्षा के घेरे में और करोड़ों रुपये की बुलेट प्रूफ गाड़ी में बैठे आप को किसी भी तरह का जान का खतरा नहीं था। लेकिन आप तो आपदा को भी अवसर में बदलना जानते हैं।

लिहाजा इस मौके का भी आपने भरपूर इस्तेमाल किया। आपको भटिंडा एयरपोर्ट पर ही पता चल गया होगा कि रैली में लोग नहीं केवल कुर्सियां हैं। अगर आप उन खाली कुर्सियों को संबोधित करते तो फिर पांच राज्यों के इस चुनाव के मौसम में उसका क्या असर पड़ता। यह अंदाजा लगा पाना कठिन नहीं है। यूपी में तो आप पूरी सरकारी मशीनरी लगा कर  उसके जमावड़े पर रैली कर ले रहे हैं लेकिन पंजाब में जब वह संभव नहीं हो सका तो आपकी लोकप्रियता की हकीकत सामने आ गयी है। लिहाजा खाली कुर्सियों को संबोधित करने के उस खतरनाक मैसेज को जाने से पहले आपने उसके डैमेज कंट्रोल का रास्ता निकाला। और अपनी जान के खतरे के शिगूफे को छोड़ दिया। और फिर अपने समर्थकों से लेकर  सरकारी एजेंसियों और भाड़ मीडिया इसको लेकर उड़ पड़े।

इतना ही नहीं आपके लिए इस मसले को हाइप देना कितना महत्वपूर्ण लगा उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली लौटते ही आप ने राष्ट्रपति से मुलाकात की और अपनी सुरक्षा से जुड़े इस मसले से उन्हें अवगत कराया। जबकि सच्चाई यह है कि छह महीने के भीतर कम से कम एक बार पीएम को राष्ट्रपति से मिल कर उन्हें सरकार की रिपोर्ट देने और देश की स्थित पर उनके साथ राय-मशविरा करने का प्रोटोकाल है। शायद ही आप उसका पालन करते हैं। लेकिन जब अपको अपनी जान के खतरे को पीक पर ले जाना था तो आपने राष्ट्रपति जैसी संस्था का भी इस्तेमाल कर लिया।

दरअसल यह कुछ और नहीं बल्कि प्रधानमंत्री की एक बिल्कुल सोची-समझी रणनीति थी। जिसमें वह एक विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं। जिसके जरिये वह अपने प्रति देश में सहानुभूति पैदा करना चाहते हैं। क्योंकि उन्हें इस बात का पता है कि देश में अब उनकी साख रसातल में पहुंच गयी है। वह एक झूठे और जुमलेबाज प्रधानमंत्री के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। उनके मुंह से निकलने वाला हर शब्द जुमले की फेहरिस्त में शामिल हो जाता है। और यही वजह है कि यूपी समेत तमाम सूबों की रैलियों में उनको सुनने जनता नहीं आ रही है। लिहाजा इसके जरिये एक बार फिर से खुद को पीड़ित के तौर पेश किए जाने से अपने प्रति वह कोई नया आकर्षण पैदा कर सकें इसकी संभावना पीएम मोदी इस प्रकरण में देख रहे हैं। और इसीलिए पार्टी के संगठन से लेकर संघ के तमाम आनुषंगिक संगठनों को इस काम में लगा दिया गया है। 

दरअसल मोदी जी को इस खेल में महारत हासिल है। गुजरात में सीएम की कुर्सी पर बैठने के दौरान वह इसको इतनी बार खेल चुके हैं कि उसका अंदाजा लगा पाना मुश्किल है। तत्कालीन सीएम मोदी की हत्या की साजिशों के प्रकरण में सैकड़ों लोग मौत के घाट उतारे जा चुके हैं। यहां तक कि जब केंद्र में भी अपने विरोधियों से निपटने की बारी आयी तो उन्होंने इसी कार्ड का इस्तेमाल किया। जिसका नतीजा यह है कि भीमा कोरेगांव मामले में समाज के तमाम एक्टिविस्ट, मानवाधिकार कार्यकर्ता, लेखक और बुद्धिजीवी सालों से जेल की सलाखों के पीछे हैं। और उनके खिलाफ पीएम की हत्या की साजिश का जो आरोप लगाया गया है वह उस मालवेयर के जरिये स्थापित किया गया है जिसे दूसरी एजेंसियों ने जेल में बंद आरोपियों के लैपटाप और गैजगेट में डाला था। जिसको उन लोगों ने अपने कंप्यूटर में खोला तक नहीं। इसलिए यह पूरा खेल पांच राज्यों के चुनावों के लिए रचा गया है और एक बार फिर अपने प्रति सहानुभूति पैदा कर उसे वोट में बदले जाने की कोशिश का हिस्सा है।

और वैसे भी प्रधानमंत्री जी आप जिस जनता को अपने संभावित हत्यारे के तौर पर पेश कर रहे हैं वह आम किसान थे जो अपनी लंबित मांगों को लेकर सड़क पर उतरे थे। और यह उनका बुनियादी संवैधानिक अधिकार है। सरकार और सत्ता के खिलाफ प्रदर्शन करना इस देश में किसी भी नागरिक या फिर नागरिकों के समूहों का मूलभूत लोकतांत्रिक अधिकार है। उससे न तो आप वंचित कर सकते हैं न ही इस देश की कोई दूसरी संस्था। संविधान के व्याख्याता सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी किसान आंदोलन के दौरान उस पर मुहर लगायी थी। आपको अगर देश में रहना है और प्रधानमंत्री बने रहना है तो जनता का सामना करना ही होगा। आप उससे बच नहीं सकते हैं। लेकिन शायद पिछले सात सालों की आपकी जनविरोधी नीतियों ने इस जनता को आप से बहुत दूर कर दिया है।

और आपकी नीतियों की कहर का नतीजा है कि वह भी अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरने के लिए मजबूर है। इस गैप ने ही आपके भीतर भय पैदा कर दिया है। जिससे आपको उससे निकल पाना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर किसी देश का शासक खुद भयभीत हो गया हो तो वह जनता को क्या सुरक्षा दे पाएगा? नैतिकता को यही कहती है कि उसे तत्काल अपने पद से इस्तीफा देकर हट जाना चाहिए। और उसके बाद भी अगर आपको असुरक्षा का कोई अहसास हो रहा है तो आप कैलाशा चले जाइये और अपने उम्र का चौथा पड़ाव वहीं बिताइये। हां यहां रहने के लिए आपके पास एक और रास्ता है। वह यह कि आप यहां की जनता को ही बदल दीजिए।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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