शहरों से घरों की ओर लौट रहे प्रवासियों के साथ पुलिस कर रही है अमानवीय और बर्बरतापूर्ण व्यवहार

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रास्ते में प्रवासियों का उत्पीड़न।

नई दिल्ली। आज वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन ने कोरोना वायरस से निपटने के क्रम में एक लाख सत्तर हज़ार करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की है। इसमें एक हिस्सा ग़रीबों, किसानों, मज़दूरों और वंचितों के लिए भी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह सहायता लोगों तक पहुँचेगी कैसे? जिस समय शहरों में रहने वाले प्रवासी मज़दूरों और मेहतनकश तबकों को इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी। उस समय पूरी सरकार और उसका महकमा नदारद रहा। अब जबकि कोई सहायता की उम्मीद न देख वह अपने घरों की ओर पलायन कर गया है। तब सीतारमन ने ये घोषणाएँ की हैं। इन प्रवासी मजदूरों की सहायता करने की बात तो दूर पुलिस-प्रशासन उनके साथ बेरुख़ी से पेश आ रहा है। जिस प्रशासन और पुलिस को संकट की इस घड़ी में मज़दूरों और मेहतनकशों की मदद करनी चाहिए वह उनकी लाठियों और डंडों से स्वागत कर रहा है।

यह न तो किसी लोकतंत्र का चेहरा हो सकता है और न ही किसी सभ्य समाज में इसके बारे में सोचा जा सकता है। निर्मला सीतारमन ने जो घोषणाएँ आज की हैं क्या इनको बहुत पहले नहीं करना चाहिए था। साथ ही लॉक डाउन घोषित करने से पहले क्या पीएम मोदी लोगों को इस बात की छूट नहीं देनी चाहिए था कि वे बाज़ार से खाने-पीने के ज़रूरी सामानों की ख़रीदारी कर सकें। और अब जब लोग अपने घरों से बाहर निकल रहे हैं तो पुलिस उन पर लाठियाँ बरसा रही है।

वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने आज एनएच-24 पर पैदल अपने घरों की ओर जा रहे कुछ लोगों से उनके दिल्ली छोड़कर जाने के बारे में बात की। उनका कहना था कि कमरे से बाहर निकलने पर पुलिस लाठी मार रही है। और घर में न तो खाने-पीने का इतना सामान है और न ही इतना पैसा कि रहा जा सके। लिहाज़ा उन लोगों ने अब पैदल ही बदायूँ से लेकर आज़मगढ़ का रुख़ कर लिया है। इनके सिर पर मौजूद गठरियाँ विभाजन के समय की यादें ताज़ा कर दे रही हैं। यह कुछ उसी तरह की तस्वीरें हैं जब पाकिस्तान से भारत और भारत से पाकिस्तान लोगों को अपना सब कुछ छोड़कर जाना पड़ा था। उस समय तो कम से कम सरकार कुछ सवारियाँ भी उपलब्ध करा दे रही थी। लेकिन इनके लिए तो वे सुविधाएँ भी मयस्सर नहीं हैं। इनमें कोई तीन दिनों से भूखा है तो किसी के पास पैसे नहीं हैं कि वह कुछ खा-पी सके।

और इन प्रवासियों के साथ पुलिस कैसा व्यवहार कर रही है उसको नीचे दिया गया वीडियो बता रहा है। ग्वालियर से बदायूँ पहुँचे इस युवाओं का पुलिस लाठियों से स्वागत कर रही है। इतना ही नहीं उन्हें सड़क पर घुटनों के बल चलने की सज़ा दी गयी है। अब कोई पुलिसकर्मियों से यह पूछ ही सकता है कि आख़िर उनका क़सूर क्या है? गरीब होने के सिवा। उन्हें ग्वालियर में कोई भोजन देने वाला नहीं है। और वहाँ रहने का मतलब है कोरोना से पहले भूख से मौत। ऐसे में इनके पास अपने घरों की ओर लौटने के सिवा और क्या चारा था? लेकिन उनकी स्थितियों को समझने और उन्हें ज़रूरी सुविधाएं मुहैया कराने की जगह उन्हें देने के लिए पुलिस के पास सिर्फ़ लाठियाँ और सज़ा है। फासीवाद का यह नंगा नाच आज जगह-जगह सड़कों पर देखा जा सकता है।

यह वीडियो पटेल नगर के नेहरू नगर का बताया जा रहा है। इसमें सब्ज़ी के ठेलों को पुलिस की शह पर एक गुंडा पलट दे रहा है। उससे कोई यह नहीं पूछने वाला है कि भला उनकी क्या गलती है। और क्या अब लोगों ने सब्ज़ी खाना बंद कर दिया है या फिर लोग भूख प्रूफ़ हो गए हैं। दिलचस्प बात यह है कि मंत्रालय ने भी ज़रूरी सामानों के दुकानों को खोलने की इजाज़त दे रखी है। वीडियो में रेहड़ी-पटरी पर ठेलों को पलटने वाले शख़्स का नाम राजवीर बताया जा रहा है।

इस वीडियो में युवक की सिर्फ़ यह गलती है कि उसने बाज़ार से लॉकडाउन के दौरान अपने परिवार के खाने पीने के लिए अनाज और दूसरे सामान बाज़ार से घर ले जाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन पुलिस को यह भी बर्दाश्त नहीं। जिस पुलिस को यह सब व्यवस्था करनी चाहिए थी वह उसको ले जाने वाले को ही रोक रही है।

यही हाल एक कालोनी से सटी एक सब्ज़ी की दुकान का है। जहां कुछ लोग दुकान से जब सब्ज़ी ख़रीदते देखे गए तो पुलिस ने उनकी लाठियों से पिटाई शुरू कर दी। ट्वीट में वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने यह सवाल किया है कि उस समय पुलिस कहां थी जब ताली-थाली के बाद सत्तारूढ़ दल के नेताओं द्वारा जुलूस निकाला गया था। उनकी उस समय भुजाएँ क्यों नहीं फड़कीं। क्या ग़रीबों को देखकर ही उनको ग़ुस्सा आता है।

दिल्ली से अपने घरों की ओर पलायन करने की यह तस्वीर किसी को भी द्रवित कर सकती है। कंधे पर अपने दुधमुँहे बच्चे को ढोते इस युवक से जब पत्रकार रवीश रंजन ने सवाल किया तो उसका जवाब किसी भी सत्ता को शर्मसार करने के लिए काफ़ी था। उसने कहा कि अपने घरों की ओर न जाए तो करें क्या? दिल्ली में रहकर कंकड़-पत्थर खाएं? उससे अच्छा तो गाँव में नमक रोटी ही भली है। यहाँ तो उसको भी देने वाला कोई नहीं मिलेगा लेकिन गाँव में तो पड़ोसी और पट्टीदार कम से कम उसकी भी व्यवस्था कर देंगे।

और अब इस लॉकडाउन का नतीजा भी सामने आने लगा है। एक पेपर के हवाले से आई तस्वीर में बच्चों को घास की रोटियाँ खाते देखा जा सकता है। यह आलम तब है जबकि अभी लॉकडाउन को दो दिन भी नहीं बीते हैं। 21 दिन बाद देश की तस्वीर क्या होगी उसका किसी के लिए अंदाज़ा लगा पाना भी मुश्किल है।

लेकिन ऐसा नहीं है कि देश की पूरी पुलिस का यही चेहरा है। पंजाब के कुछ हिस्सों में पुलिसकर्मियों को झुग्गी-झोपड़ियों में सामान और अनाज की सप्लाई करते देखा गया है। नीचे के वीडियो में भी कुछ पुलिसकर्मी भूखे और ज़रूरतमंदों को खाना खिलाते देखे जा सकते हैं।

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