पाठ्यक्रम को बेहतर बनाने के नाम पर साम्प्रदायिकता को बढ़ावा

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स्कूली पाठ्पुस्तकें भी राष्ट्रवाद के विभिन्न संस्करणों के बीच युद्ध का मैदान बन सकती हैं। औपनिवेशिक भारत के दो उत्तराधिकारी, भारत और पाकिस्तान इसके समानांतर किंतु विपरीत उदाहरण हैं। चूंकि पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर अस्तित्व में आया इसलिए वहां की स्कूली पुस्तकों में इतिहास की शुरूआत 8वीं सदी में मोहम्मद बिन कासिम के सिंध का शासक बनने से होती है। हिन्दू राजाओं और हिंदुओं को इस हद तक बुरा बताया गया है कि पाकिस्तान के स्कूलों में पढ़ने वाला एक औसत बच्चा किसी भी हिन्दू को बहुत हेय दृष्टि से देखेगा।

भारत में स्थिति इससे बहुत अलग रही। यहां इतिहास को वैज्ञानिक और तर्कसम्मत बनाने का प्रयास किया गया। हमारे इतिहास लेखन में धर्म किसी राजा के शासनकाल और इतिहास के अन्य पहलुओं की पड़ताल का एकमात्र आधार नहीं था। लेकिन यह स्थिति सन् 1999 में एनडीए के सत्ता पर काबिज होने तक ही रही। फिर मानव संसाधन विकास मंत्री के तौर पर मुरली मनोहर जोशी ने ‘इतिहास और पाठ्यक्रम के भगवाकरण’ की परियोजना पर अमल शुरू किया।

भगवाकरण के तहत मोटे तौर पर इतिहास की समझ को हिन्दू राष्ट्रवादी विचारधारा के इर्दगिर्द विकसित करने का प्रयास किया गया। यह ‘गौरवशाली हिन्दू राजा बनाम दुष्ट मुस्लिम राजा’ के नजरिए पर आधारित थी। इसके अतिरिक्त आस्था पर आधारित विषयों जैसे ज्योतिष आदि को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया। ‘पुत्र कामेष्ठि यज्ञ’ (पुत्र प्राप्ति हेतु अनुष्ठान) जैसे कर्मकांड पाठ्यक्रम का भाग बन गए।

सन् 2004 में यूपीए के सत्ता में आने के बाद इस भगवाकरण को कुछ कम करने का प्रयास किया गया। अब भाजपा शासन में साम्प्रदायिकीकरण की इस प्रक्रिया को ‘तर्कसंगतता’ के नाम पर दुबारा बढ़ावा दिया जा रहा है। एनसीईआरटी, सत्ताधारियों को चुभने वाले पाठ्यक्रम के हिस्सों को हटाने के लिए यह बहाना बना रहा है कि कोविड महामारी और लाकडाउन के कारण छात्रों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा और इस कारण उन पर पर बोझ कम करना जरूरी है।

जल्दबाजी में बिना सोचे-समझे किए गए इन ‘विलोपनों’ से इतिहास की कड़ियां टूट रही हैं और इससे कई इतिहासवेत्ता हक्का-बक्का हैं। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया पर निराशा व्यक्त की है, जिसमें मुगलों से संबंधित अंशों को हटा दिया गया है जबकि विजयनगर साम्राज्य से संबंधित अंश अभी भी पाठ्यक्रम में हैं।

सत्ताधारी हिन्दू राष्ट्रवादियों की दृष्टि में इस्लाम एक ‘विदेशी’ धर्म है और मुस्लिम राजा आक्रांता थे जो तलवार की नोंक पर इस्लाम को फैलाने के लिए यहां आए थे। इस अवधि में समाज के विभिन्न वर्गों के बीच मेल-मिलाप और समन्वय संबंधी विवरण हटा दिए गए हैं। भगवा चिंतक उस कालखण्ड में हुए सिक्ख धर्म, भक्ति और सूफी परंपरा के उदय को कैसे प्रस्तुत करेंगे यह देखने वाली बात होगी। मुगल काल या ऐसे ही किसी अन्य काल को मात्र राजा के धर्म के आधार पर नहीं समझा जा सकता।

अंग्रेजों ने फूट डालो और राज करो की अपनी नीति को लागू करने के लिए यह रास्ता चुना। मध्यकाल में मुस्लिम और हिन्दू राजाओं के बीच गठजोड़ के सारे उदाहरण भी इतिहास लेखन के इस मॉडल में गायब कर दिए जाएंगे। उदाहरण के लिए हल्दी घाटी की लड़ाई में अकबर के मुख्य सेनापति राजा मानसिंह थे और राणा प्रताप के दो सैन्य प्रमुखों में से एक हाकिम खान सूर थे।

पुस्तकों को ‘सुसंगत’ बनाने की इस कवायद का सबसे प्रमुख भाग है इतिहास से मुसलमानों को ‘डिलीट’ कर देना। परंतु इसके साथ ही कुछ अन्य घटनाओं और व्यक्त्तिवों को भी इतिहास से गायब कर दिया गया है। जो घटनाएं और जो व्यक्तित्व गायब किए गए हैं वे चिल्ला-चिल्लाकर बता रहे हैं कि सरकार का असली एजेंडा क्या है।

गांधीजी की जिंदगी लोगों में सद्भाव और प्रेम बढ़ाने पर केन्द्रित थी। वे हिन्दुओं और मुसलमानों की एकता के हामी थे। यह तथ्य इतिहास से डिलीट किया जा रहा है। जो वाक्य हटाया गया है वह इस प्रकार था – “हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए उनके (गांधीजी) द्वारा लगातार किए जा रहे दृढ़ प्रयासों से हिन्दू अतिवादी इतने भड़क गए कि उन्होंने गांधीजी की हत्या करने के अनेक प्रयास किए। गांधीजी की मृत्यु का देश की साम्प्रदायिक स्थिति पर मानो जादुई असर पड़ा। भारत सरकार ने उन संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जो साम्प्रदायिक नफरत फैला रहे थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों को कुछ समय के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया।”

साम्प्रदायिक राजनीति के चलते ही गुजरात में सन् 2002 में भयावह साम्प्रदायिक हिंसा हुई थी जिसके लिए गोधरा में ट्रेन में आग लगने की घटना को बहाना बनाया गया था। अब इस हत्याकांड की चर्चा इतिहास की किताबों से हटाई जा रही है, विशेषकर ऐसे हिस्से जिनमें भाजपा की भूमिका का संकेत हो। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कहा था कि सरकार कत्लेआम को रोकने में विफल रही, जबकि वह आसानी से ऐसा कर सकती थी, क्योंकि उसे सेना की एक बड़ी टुकड़ी उपलब्ध थी। परंतु उसने तीन दिन तक उसका उपयोग नहीं किया।

जिन हिस्सों को किताब से हटाया गया है उनमें यह अत्यंत उपयुक्त टिप्पणी शामिल है, “गुजरात जैसी घटनाएं हमें राजनैतिक उद्धेश्यों के लिए धार्मिक भावनाओं के इस्तेमाल के खतरों के प्रति आगाह करती हैं। इस तरह की घटनाएं प्रजातांत्रिक राजनीति के लिए अच्छी नहीं हैं”।

किताबों से तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की उस समय राज्य के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को राजधर्म का पालन करने की सलाह भी किताबों से हटा दी गई है। यह पंक्ति थी, “मेरा मुख्यमंत्री को एक ही संदेश है कि वे राजधर्म का पालन करें। शासक को जाति, धर्म और नस्ल के आधार पर अपने प्रजाजनों के बीच भेदभाव नहीं करना चाहिए।”

साम्प्रदायिक राजनीति का एक महत्वपूर्ण एजेंडा होता है प्रजातंत्र का गला घोटना और जनांदोलनों को कुचलना। पिछले कुछ दशकों में देश में जो जनांदोलन हुए उनमें से कई को किताबों से गायब कर दिया गया है। चिपको आंदोलन को डिलीट कर दिया गया है और उसी तरह आदिवासियों के अधिकारों और पर्यावरण की रक्षा के लिए चलाए गए नर्मदा बचाओ आंदोलन की चर्चा भी अब पाठ्यपुस्तकों में नहीं होगी।

साम्प्रदायिक राजनीति यह भी सुनिश्चित करना चाहती है कि दलित और आदिवासी हमेशा समाज के सबसे निचले पायदान पर बने रहें और इसीलिए किताबों से दलित पैंथर आंदोलन की चर्चा भी हटा दी गई है। सन् 1970 के दशक में चले इस आंदोलन ने आम दलितों को उनकी स्थिति और उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया था। यह आंदोलन एक तरह से दलितों का विद्रोह था। इसी तरह सूचना का अधिकार आंदोलन को भी अब किताबों में जगह नहीं मिलेगी। यह आंदोलन शायद आम लोगों को सशक्त करने के प्रजातांत्रिक आंदोलनों में से सबसे महत्वपूर्ण था।

जाति के उदय के लिए पहले से ही विदेशियों को जिम्मेदार बताया जा चुका है। अतः पुस्तकों से वे सब अंश हटाए जाने होंगे जिनमें जाति के उदय के लिए भारतीयों को जिम्मेदार बताया गया है। ऐसा ही एक अंश जिसे डिलीट कर दिया गया है जो कहता है, “पंडितों ने यह भी कहा कि इन समूहों का निर्धारण जन्म से होता है। बाद में उन्होंने कुछ समूहों को अछूत के रूप में वर्गीकृत कर दिया। इनमें शामिल थे कुछ शिल्पकार, शिकारी, वन उत्पादों को इकट्ठा कर उनसे अपना जीवन यापन करने वाले और वे लोग जो अंतिम संस्कार में मदद करते थे। पंडितों ने कहा कि ऐसे समूहों के साथ संपर्क प्रदूषित करने वाला होता है।”

“जाति व्यवस्था का संचालन करने के लिए नियम बनाए गए जिनके अंतर्गत कथित अछूत केवल उनके लिए निर्धारित काम ही कर सकते थे। उदाहरण के लिए कुछ समूहों को मृत पशुओें के शवों को ठिकाने लगाने और कूड़ा-कचरा साफ करने पर मजबूर किया जाने लगा। मगर उन्हें ऊंची जातियों के लोगों के घरों में घुसने, गांव के कुएं से पानी भरने और मंदिरों में प्रवेश करने की इजाजत नहीं थी। उनके बच्चे स्कूलों में अन्य जातियों के बच्चों की बगल में नहीं बैठ सकते थे।”

नेहरू की आधुनिक भारत के मंदिरों की परिकल्पना को भी किताबों से हटा दिया गया है। आखिर नेहरू और सांप्रदायिक सोच एक ही किताब में एक साथ कैसे रह सकते थे। जो वाक्य हटाया गया है वह यह है: “आखिर इस जगह, इस भाखड़ा नंगल से महान क्या हो सकता है जहां हजारों और लाखों ने अपना खून-पसीना बहाया और अपने जीवन का बलिदान भी दिया।”

इसी तरह ‘लोकतंत्र व विविधता’ शीर्षक अध्याय और आपातकाल, जिस दौरान प्रेस और नागरिक स्वतंत्रताएं बहुत सीमित कर दी गईं थीं, पर टिप्पणियों को भी हटा दिया गया है। कुल मिलाकर जो कुछ हटाया गया है वह सिर्फ मुगलों तक सीमित नहीं है बल्कि असल में यह साम्प्रदायिक राजनीति के एजेंडे को लागू करने का प्रयास है।

(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया; लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

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