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जनता को तो पता चल गया, सरकार को भी उसकी जवाबदेही बता दीजिए मी लॉर्ड?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सार्वजनिक स्थानों पर लंबे समय तक कब्ज़ा कर के धरना प्रदर्शन नहीं किया जा सकता है। पर कितने समय तक धरना-प्रदर्शन करने के लिये सार्वजनिक स्थलों पर टिका रहा जा सकता है ? यह अवधि अदालत तय करेगी या सरकार ?

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश लागू कैसे कराया जाएगा यह समस्या सरकार की है। आइये कुछ सम्भावनाओं पर विचार करते हैं।

● क्या सरकार कोई समय सीमा तय कर के कहेगी कि अब इससे अधिक यह धरना प्रदर्शन नहीं चलेगा।

● उस तय समय सीमा के बाद भी अगर धरना जारी रहा तो फिर सरकार क्या करेगी ?

● यह कहा जा सकता है कि सरकार व्यापक गिरफ्तारी करेगी और धरने में जो हज़ारों लोग सम्मिलित हैं तो क्या उन सबकी गिरफ्तारी सम्भव होगी ?

● फिर पानी की बौछार, आंसू गैस, लाठी और अंत में गोली यानी सरकार अपने लिये अनेक नए आंदोलनों का रास्ता खुद ही बना लेगी ?

● अगर यह आदेश सरकार लागू नहीं कर पाती है तो क्या फिर सुप्रीम कोर्ट इसे अदालत की अवहेलना मानेगी और वह सबको अवमानना की नोटिस जारी करेगी ?

इन सबके बाद तो आंदोलनकारियों को और प्रचार ही मिलेगा और सरकार के ज़ुल्म, जो वह करेगी, उसकी विपरीत प्रतिक्रिया और व्यापक होगी। सरकार के अफसर बदहवासी में नए-नए उपाय सुझाएंगे और इन सबका ठीकरा सरकार पर ही अंत में फूटेगा। इसी बीच सरकार की कार्रवाई के खिलाफ कोई न कोई पीआईएल या तो हाईकोर्ट में या सुप्रीम कोर्ट में दायर हो जाएगी और अदालत सरकार से कहेगी कि वह इस मसले को हल करे और आंदोलनकारियों से बात करे। याद कीजिए शाहीनबाग में सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही अपना वार्ताकार भेजा था और उनके वार्ताकारों ने भी वहां जाकर यही कहा था कि आप का धरना जायज है। सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि सरकार इसे बलपूर्वक खाली कराये। यह कहना सुप्रीम कोर्ट का काम भी नहीं है।

” सार्वजनिक जगहों को अनिश्चित समय के लिए विरोध-प्रदर्शनों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।” यह फ़ैसला शाहीन बाग़ में महीनों तक चले प्रदर्शन के ख़िलाफ़, सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया। अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा कि ” कोई भी व्यक्ति विरोध-प्रदर्शन के मक़सद से किसी सार्वजनिक स्थान या रास्ते को नहीं रोक सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्तिचकालीन के लिए इस तरह धरना या प्रदर्शन स्वीकार्य नहीं है और ऐसे मामलों में सम्बन्धित अधिकारियों को इससे निबटना चाहिए। ”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “शाहीन बाग़ को खाली कराना दिल्ली पुलिस की ज़िम्मेदारी थी। विरोध-प्रदर्शनों के लिए किसी भी सार्वजनिक स्थान का अनिश्चितकाल के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, चाहे वो शाहीन बाग़ हो या कोई और जगह। प्रदर्शन निर्धारित जगहों पर ही होने चाहिए।”

फ़ैसला सुनाने वाले जज थे जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस अनिरुद्ध बोस और जस्टिस कृष्ण मुरारी। सुप्रीम कोर्ट में इस संदर्भ में कई याचिकाएँ दायर की गई थीं। शाहीन बाग़ में कई महीनों तक प्रदर्शनकारियों ने नागरिकता संशोधन क़ानून के खिलाफ दिल्ली और नोएडा को जोड़ने वाली एक मुख्य सड़क को जाम कर दिया था । सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ” विरोध-प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से किया जा सकता है लेकिन ‘विरोध-प्रदर्शन का अधिकार निरंकुशता पूर्ण नहीं है। यह एक अधिकार है। “

आंदोलन किसी न किसी कारण से ही होते हैं। कुछ आंदोलन निजी हित या स्वार्थ के वशीभूत होकर हो जाते है। पर उन्हें कुछ ही दिन के बाद व्यापक जन समर्थन नहीं मिलता है। ऐसे आंदोलन जो निजी हित और स्वार्थ के कारण होते हैं वे लंबे समय तक चल भी नहीं पाते क्योंकि आंदोलनकारियों में अपने सरोकारों के प्रति नैतिक जुड़ाव का अभाव रहता है। लेकिन वे आंदोलन जो किसी महत्तर उद्देश्य के लिये होते हैं उनसे निपटना, सरकार या पुलिस के लिये आसान नहीं होता है। ऐसे में, जब सरकार किन्ही कारणों से आंदोलनकारियों से बात नहीं करना चाहती तो,  आंदोलनकारियों को थका कर, उबा देने की योजना पर काम किया जाता है। शाहीनबाग में यही हुआ था। कभी-कभी यह तरीका काम कर जाता है तो कभी यह बैक फायर हो जाता है।

शाहीन बाग बहुत लंबे समय तक चलने वाला आंदोलन रहा है। यह आंदोलन नागरिकता संशोधन कानून 2019 के विरुद्ध था। सुप्रीम कोर्ट, जो आज यह निर्देश दे रहा है उसी ने पहले सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े, साधना रामाचंद्रन और पूर्व नौकरशाह वजाहत हबीबुल्लाह को मध्यस्थता के लिये भेजा था ताकि वो प्रदर्शनकारियों से बात करें और उन्हें कहीं और जाकर प्रदर्शन करने के लिए मनाने पर राजी कर सकें। सुप्रीम कोर्ट धरने के खिलाफ नहीं था, बल्कि वह सड़क जाम के खिलाफ था। फ़रवरी 2020 में मध्यस्थों की टीम ने अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सौंपी थी। फिर यह सब करने के बाद उसने आंदोलनकारियों को सार्वजनिक स्थल से हटाने के लिये सरकार को किसी प्रकार का निर्देश देने से मना कर दिया था। ज़ाहिर है सुप्रीम कोर्ट पुलिस का काम नहीं कर सकता है। यह काम पुलिस का था।

अब कुछ बड़े आंदोलनों के बारे में पढ़ लें। शाहीन बाग के पहले 1987 में मेरठ में किसान नेता और भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में मेरठ के मंडलायुक्त का आवास और कैम्प कार्यालय का घेराव किया गया था। यह घेराव एक महीने से भी अधिक दिनों तक चला। उस घेराव के दौरान दो किसानों की मृत्यु भी हो गई थी। उनके दाह संस्कार भी वहीं धरना स्थल पर ही किसानों ने किया था। तब वीर बहादुर सिंह मुख्यमंत्री थे और कांग्रेस की सरकार थी। बाद में सरकार ने किसानों की मांग स्वीकार कर ली और यह धरना खत्म हो गया।

इसी प्रकार 1988 में कानपुर में सूती मिलों के मजदूरों द्वारा जूही रेलवे अंडरपास के ऊपर मज़दूर संगठनों ने रेल का ट्रैक जाम कर दिया था। यह ट्रैक दिल्ली और कलकत्ता को जोड़ने वाला प्रमुख ट्रैक था। मैं तब कानपुर में ही नियुक्त था और धरना स्थल मेरे ही क्षेत्र में था। मुझे बराबर वहां रहना पड़ता था। धरना शांतिपूर्ण था। रेलवे ने सरकार से कहा कि ” रेल यातायात बंद है और मालगाड़ियों के आवागमन बंद होने से कोयले तथा अन्य वस्तुओं की आपूर्ति भी बाधित हो रही है। ट्रेनें इलाहाबाद से झांसी और फिर वहां से दिल्ली या दिल्ली से लखनऊ, वाराणसी होते हुए दौड़ाई जा रही हैं। यह धरना स्थल खाली कराया जाए।” उस समय भी यूपी में कांग्रेस की सरकार थी और, मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी थे।

लखनऊ से कहा गया कि बल प्रयोग करके ट्रैक खाली कराया जाए। पर तब के डीएम वृहस्पति शर्मा और एसएसपी विक्रम सिंह ने बल प्रयोग के लिये दृढ़तापूर्वक मना कर दिया था। क्योंकि पानी की बौछार, आंसू गैस और लाठी से कुछ नहीं होता। भीड़ बहुत थी और रेलवे ट्रैक पर चारों तरफ पत्थर पड़े थे। भीड़ ज़बरदस्त पथराव कर सकती थी। अंत मे पुलिस को गोली ही चलानी पड़ाती। तब बहुत लोग हताहत हो सकते थे। अभी तक तो एनटीसी और बीआईसी की कपड़ा मिलों के ही मज़दूर इस धरने में शामिल थे। तब सभी ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों के मज़दूर भी इस धरने में शामिल हो सकते थे। यही संभावना डीएम और एसएसपी ने लखनऊ में सरकार को बताई और सरकार को हालात की गंभीरता समझ में आयी।

जब यह सारी जटिलतायें सरकार को समझ में आ गयीं, तब जाकर भारत सरकार ने मज़दूरों की कुछ मांगों को माना और कुछ मांगों को मानने का आश्वासन दिया। यह मांगें टेक्सटाइल कामगारों के लिये एक घोषित पांडेय अवार्ड रद्द करने से सम्बंधित थीं। फिर  एनटीसी, बीआईसी और लेबर कमिश्नर के कुछ प्रतिनिधि धरना स्थल पर गए। साथ में मैं भी था और मेरे साथी एक सेंगर साहब मजिस्ट्रेट भी थे। वहीं इस बात की घोषणा हुयी कि सरकार ने मांगें मान ली हैं। फिर डेढ़ दो घँटे में ट्रैक खाली हो गया। यह दुनिया भर में लंबे समय तक रेलवे ट्रैक जाम कर धरना देने का पहला रिकॉर्ड तब के अखबारों ने बताया था।

लोकतंत्र में जनता को अपनी बात कहने और शांतिपूर्ण आंदोलन करने का वैधानिक अधिकार है। इसे सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के समय भी कहा है। इसी अधिकार के अंतर्गत, तरह तरह की यूनियनों के गठन की परंपरा है। हड़ताल करने, हड़ताल पर जाने के भी नियम हैं। यह सब श्रमिक कानूनों के हिस्से हैं कि एक कामगार के क्या क्या अधिकार होंगे। धरना प्रदर्शन जब भी होंगे, सार्वजनिक स्थानों, सड़क, पार्क, मैदानों में ही होंगे और बहुधा जिलों में कचहरी में होते हैं क्योंकि वहां कलेक्ट्रेट और पुलिस कार्यालय होता है। उद्देश्य यह रहता है कि कलेक्टर को ज्ञापन दिया जाए और उसके माध्यम से सरकार को अपनी व्यथा बताई जाए।

जिस सीएए के खिलाफ शाहीनबाग का आंदोलन चला और अंतरराष्ट्रीय खबरों में छाया रहा, उसी कानून को चुनौती देते हुए अनेक याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर हुयी थीं। उन पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई त्वरित सुनवाई नहीं की। आंदोलनकारियों की निराशा का एक कारण यह भी था। साथ ही सरकार ने भी अपनी तरफ से आंदोलनकारियों से कोई संवाद नहीं किया। यह आंदोलन दिल्ली तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि नार्थ ईस्ट से शुरू होकर देशव्यापी बन गया था। सरकार ने कहीं भी बात नहीं की क्योंकि सरकार लोकतांत्रिक संवाद में संभवतः यक़ीन नहीं करती है, इसलिए यह आंदोलन जोर पकड़ता गया। अंत मे यही कह दिया गया कि यह एक अंतर्राष्ट्रीय साज़िश है।

आजकल किसान बिल के खिलाफ किसानों के आंदोलन चल रहे हैं। इस बारे में भी सरकार चुप्पी साधे हुए हैं। किसान संगठनों के नेताओं से बात करके सरकार अपना पक्ष तो रख ही सकती है और उन्हें यह विश्वास दिला सकती है कि यह बिल उनके हित में है। संवादहीनता सदैव भ्रम उत्पन्न करती है और सरकार के असंवेदनशील और अहंकारी चेहरे को सामने लाती है। सुप्रीम कोर्ट को सरकार को यह भी निर्देश देना चाहिए कि वह लंबे समय तक जनता द्वारा किये जा रहे धरना-प्रदर्शनों के प्रति चुप्पी न साधे रहे। या तो आंदोलनकारियों से उन्हें बातचीत के लिये मेज पर ले आये या उनकी समस्याओं का समाधान ढूंढे।

लोकतंत्र में धरना-प्रदर्शन तो होंगे ही और भारत ही नहीं दुनिया भर में ऐसे धरना प्रदर्शन होते हैं। फिर सरकार को एक जगह तय करनी पड़ेगी जहां लोग अपनी बात कह सकने के लिये एकत्र हो सकें। शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन पर किसी भी प्रकार की कोई रोक, आक्रोश को हिंसक बना देता है, यह बात ध्यान में रखना ज़रूरी है। इस आदेश में भी सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को यही कहा है कि वह ऐसे आंदोलनों से निपटे। अदालत सरकार को ऐसे आंदोलन से निपटने के तऱीके नहीं बताने जा रही है और न ही यह अदालत का कार्य है। उसने एक सैद्धांतिक बात कह दी कि धरना प्रदर्शन के नाम पर सार्वजनिक स्थल जाम नहीं किये जा सकते हैं। अब सरकार जाने और उसका काम कि कैसे वह इन समस्याओं को हल करती है।

मेरा अनुभव कहता है कि जवाहर बाग या शाहीन बाग रातों रात नहीं होता है। सरकार का जब जनता या आंदोलनकारियों से संवाद कम या बंद हो जाता है तो ऐसे बड़े आंदोलन खड़े हो ही जाते हैं। दो दिन जब निजीकरण और बिजलीघर बेचो अभियान के खिलाफ पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश की बिजली बंद रही तो सरकार के होश ठिकाने आ गए और सरकार ने बिजली कर्मचारियों की बात मान ली।

कल अगर किसान अपने आंदोलन के क्रम में नेशनल हाइवे जाम कर के बैठ जाएं तो सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश लागू कैसे कराया जाएगा, यह मुझे नहीं मालूम है । जब तक जन सरोकार से जुड़ी समस्याएं उपजती रहेंगी, तब तक आंदोलन तो होंगे ही। ऐसे जन आक्रोश से उत्पन्न जन समस्याओं के समाधान के लिये, सरकार को  जनता से संवाद बनाये रखने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं। )

This post was last modified on October 7, 2020 11:10 pm

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