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Friday, September 24, 2021

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पीयूसीएल ने अघोषित आपातकाल खत्म कर सामाजिक कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग की

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(आपातकाल की पूर्व संध्या पर छत्तीसगढ़ पीयूसीएल ने एक पर्चा जारी कर बेबुनियाद आरोपों के तहत जेल में बंद पत्रकारों समेत सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग की है। इसमें उसने भीमा कोरेगांव से लेकर दिल्ली दंगों और लॉकडाउन के दौरान होने वाली उत्पीड़न की घटनाओं को शामिल किया है। संगठन का कहना है कि पत्रकारों को निशाना बनाकर सरकार ने साबित कर दिया है कि उसका आपातकाल अब अघोषित नहीं रहा। इस मौके पर पीयूसीएल ने जेलों में बंद इन सभी लोगों को तत्काल रिहा करने और उनके ऊपर दर्ज मुकदमों को वापस लेने की मांग की है। पेश है पीयूएसीएल का पूरा बयान-संपादक)

सन 1975 को इस दिन, तत्कालीन भारत सरकार ने आपातकाल की घोषणा कर सभी मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया था और भारतीय लोकतंत्र के एक अंधकाल की शुरुआत हुई थी। आज, पैंतालीस वर्षों बाद, हम भारत के लोग फिर उन्हीं परिस्थितियों को झेल रहे हैं –  जो वास्तविक रूप से आपातकाल की स्थिति है, पर औपचारिक रूप से घोषित नहीं की गई है, जहां दर्जनों नागरिकों को मात्र आलोचना करने पर ही उन गम्भीर कानूनों के तहत गिरफ्तार किया जा रहा है जो केवल अंतरराष्ट्रीय आतंक के दुर्लभ मामलों के लिए बनाये गये थे। पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ इकाई इस दिन को आपातकाल-विरोधी दिवस के रूप में मनाते हुए कैद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग करती है, और भारत के संविधान को, और उसमें उल्लेखित स्वतंत्रता और समानता के वादों को सुरक्षित रखने का दृढ़ संकल्प लेती है।

परिरुद्ध मानव अधिकार कार्यकर्ता: भीमा कोरेगांव मामले में जून 2018 में शुरू हुई गिरफ्तारियों को दो साल हो रहे हैं। सन 1818 में भीमा कोरेगाँव युद्ध स्थल पर दलितों के एक दल ने पेशवा राज पर विजय हासिल की थी, और उसकी 200 वीं वर्षगांठ के अवसर पर वहाँ हुई दलित-विरोधी हिंसा का आरोप वहीं के कुछ हिन्दुत्व संगठनों पर लगा था। लेकिन पुलिस ने उनकी गंभीरता से जांच नहीं की, परन्तु आज भारत के 11 अग्रणी बुद्धिजीवी, वकील, लेखक, विद्वान, कार्यकर्ता इस मामले के अन्तर्गत जेल में हैं, और सरकार को पलटने और प्रधानमंत्री की हत्या की आपराधिक साजिश के झूठे आरोपों का सामना कर रहे हैं। उनके असली अपराध वास्तव में ये हैं कि वे वर्षों से सबसे कमज़ोर समुदायों के साथ काम कर रहे थे और सरकार की नीतियों को चुनौती दे रहे हैं। इन कार्यकर्ताओं में शामिल हैं-

वरावर राव– एक 81 वर्षीय हैदराबाद के प्रसिद्ध कवि और लेखक 

सुधा भारद्वाज – छत्तीसगढ़ की एक वकील, एक ट्रेड यूनियन की नेता जिन्होंने छत्तीसगढ़ में कई विशाल खनन परियोजनाओं से उत्पन्न विस्थापन और प्रदूषण का विरोध किया था, और दिल्ली में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में एक प्रोफेसर थीं।

आनंद तेलतुम्बड़े – एक दलित विद्वान और लेखक जिन्होंने जाति और राजनीति के बीच के आपसी संबंध पर कई पुस्तकें प्रकाशित की हैं।

गौतम नवलखा – दिल्ली में एक नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, एक पत्रकार और एक राजनीतिक विश्लेषक, जिनके द्वारा कश्मीर और मध्य भारत के आदिवासी क्षेत्रों पर व्यापक लेखन किये गये हैं।

सुरेंद्र गाडलिंग – नागपुर के एक प्रसिद्ध मानवाधिकार वकील और दलित अधिकार कार्यकर्ता।

शोमा सेन– एक महिला अधिकार कार्यकर्ता, एक अकादमिक और नागपुर विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग की प्रमुख।

अरुण फरेरा– मुंबई में एक मानवाधिकार वकील, और जेल के जीवन के संस्मरण “कलर्स ऑफ़ द केज” के लेखक।

वर्नन गोंसाल्वेस– मुंबई के एक लेखक और अनुवादक, जिन्होंने चंद्रपुर में ट्रेड यूनियनों के साथ काम किया था।

सुधीर धवले– एक सांस्कृतिक कार्यकर्ता, एक मराठी पत्रिका “विद्रोही” के संस्थापक प्रकाशक।

महेश राउत– गढ़चिरोली के आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता, पूर्व “प्रधान मंत्री ग्रामीण विकास साथी,” जिन्होंने आदिवासी समुदायों के विस्थापन के खिलाफ सक्रिय रूप से अभियान चलाया है।

रोना विल्सन- जेएनयू विश्वविद्यालय के एक पीएचडी छात्र, जिन्होंने राजनीतिक कैदियों की रिहाई के लिए सक्रिय रूप से अभियान चलाया है।

हिंदुत्व के नेताओं द्वारा भड़काई गई हिंसा से ध्यान हटाने के लिये मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को दोषी ठहराने का तरीका फरवरी 2020 में दिल्ली दंगों के संदर्भ में फिर से ज़ाहिर हुआ । केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़े कपिल मिश्रा और अनुराग ठाकुर जैसे नेताओं के भड़काऊ भाषण को दिल्ली पुलिस द्वारा पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया, लेकिन उन युवा सीएए-विरोधी प्रदर्शनकारियों को, जिन्होंने एक अन्यायपूर्ण और भेदभावपूर्ण कानून के खिलाफ महीनों तक शांतिपूर्वक प्रदर्शन किया था, उनको इस जांच का लक्ष्य बनाया गया है और वे यूएपीए कानून के तहत आज भी जेल में हैं। इसमें शामिल है –

मीरान हैदर- जामिया मिलिया में पीएचडी छात्र और राजद के छात्र नेता। 

इशरत जहां – एक पूर्व कांग्रेस पार्टी की नगर पार्षद।

खालिद सैफ़ी – द्वेश अपराध विरोधी समूह “यूनाइटेड अगेंस्ट हेट” के संस्थापकों में से एक, जिसे पुलिस हिरासत में क्रूरतापूर्वक प्रताड़ित किया गया था।

नताशा नरवाल और देवांगना कलीता – जेएनयू के छात्र और पिंजरा तोड़ समूह के सदस्य, जिन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में महिला छात्रावासों के लिए कर्फ्यू समय के खिलाफ आयोजन शुरू किया था।

गुलफिशा फातिमा – 28 साल की एमबीए छात्रा।

शरजील इमाम – एक आईआईटी स्नातक जो जेएनयू में पीएचडी पूरा कर रहा था।

शिफा-उर-रहमान – जामिया के पूर्व-छात्रों के संघ के अध्यक्ष।

आसिफ इकबाल तन्हा – जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में बीए तृतीय वर्ष के छात्र।

इनके अलावा, देश के अन्य स्थानों पर भी सीएए के विरोधी कार्यकर्ताओं को कठोर कानूनों के तहत गिरफ्तार किया गया है, जिसमें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छात्र संघ के फरहान जुबेरी और अमीर मिंटोई, और असम के एक किसान नेता अखिल गोगोई भी शामिल हैं।

काले कानूनों का मनमाना और व्यापक उपयोग – यूएपीए या विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967, और भारतीय दंड संहिता की धारा 124 A (राजद्रोह) के प्रावधान कुछ ऐसे कठोर कानून हैं जिनका सरकार किसी प्रकार की आलोचना के अपराधीकरण के लिए अंधाधुंध उपयोग कर रही है। निम्न घटनाओं से हम चिन्तित हैं –

एक अभिभावक और स्कूल की प्राध्यापिका को बच्चों के सीएए विरोधी नाटक के लिये गिरफ्तार किया गया और उन पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया।

एक 19 वर्षीय कालेज छात्रा को केवल “पाकिस्तान जिंदाबाद” के नारे लगाने के लिये ( जब वह हिंदुस्तान जिंदाबाद के भी नारे लगा रही थी, और राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों का समर्थन कर रही थी) गिरफ्तार किया गया, और

एक 66 वर्षीय महिला को विशाखापट्नम में उस स्टाइरीन गैस रिसाव की घटना पर सवालों को रिट्वीट करने के लिए गिरफ्तार किया गया था जिसमें 12 लोग मारे गए थे और 400 से अधिक प्रभावित हुए थे।

उपरोक्त कोई भी कृत्य किन्हीं भी हालातों में अपराध नहीं हो सकते हैं – और इन नागरिकों को दंडित कर सरकार केवल लोकतंत्र का गला घोंट रही है।

मीडिया का मुँह बंद करना – यह आलोचकों और प्रदर्शनकारियों की  गिरफ्तारियाँ भी हाल के दिनों में प्रेस और मीडिया पर एक गंभीर हमले की पृष्ठभूमि में हो रही हैं। जो रिपोर्टर अधिकारियों के खिलाफ प्रतिकूल रिपोर्ट दर्ज करते हैं, या वे लेखक जो असहज सवाल उठा रहे हैं, उनके खिलाफ आये दिन हास्यास्पद एफआईआर दर्ज किये जा रहे हैं और कुछ तो गिरफ्तार भी हो चुके हैं। एक हालिया रिपोर्ट में उभर कर आया है कि कम से कम 55 पत्रकारों ने 25 मार्च -31 मार्च के लॉकडाउन के दौरान अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग करने के लिए गिरफ्तारी, एफआईआर, समन, नोटिस या हिंसा की धमकी का सामना किया है। कुछ हाल ही में प्रताड़ित पत्रकारों के उदाहरण निम्न है –

धवल पटेल को गुजरात में राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, क्योंकि उन्होंने रिपोर्ट किया था कि राज्य के नेतृत्व में बदलाव हो सकता है ।

अंडमान और निकोबार में जुबैर अहमद को यह सवाल करने के लिए गिरफ्तार किया गया था कि परिवारों को फोन पर एक कोविड पोजिटिव रोगी को बोलने के लिए क्यों क्वारंटाइन किया जा रहा है

स्क्रॉल.इन की सुप्रिया शर्मा के खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज हुई है क्योंकि उन्होंने वाराणसी के पीएम के निर्वाचन क्षेत्र में लॉकडाउन के दौरान कमज़ोर वर्गों में व्यापक भूख की रिपोर्टिंग की थी। 

आकार पटेल, एक लेखक, के खिलाफ एक एफआईआर इसलिये दर्ज किया गया क्योंकि उन्होंने अपने लेख में सुझाव दिया था कि भारत में हाशिए के समुदायों को अमेरिका के अश्वेत समुदाय से सीख कर अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ विरोध करना चाहिए।

द वायर के संपादक, सिद्धार्थ वरदराजन, को एक महामारी के दौरान धार्मिक सभा को अनुमति देने के यूपी सरकार के फैसले के बारे में सवाल उठाने के लिए एक एफआईआर का सामना करना पड़ रहा है।

विनोद दुआ, एक राजनीतिक विश्लेषक, के खिलाफ दिल्ली दंगों के लिए भाजपा से जुड़े लोगों को जिम्मेदार ठहराने के लिए कई एफआईआर लगाये गये और उनपर राजद्रोह का आरोप भी लगाया गया। 

मसर्रत ज़हरा, एक कश्मीरी फोटोग्राफर, पर यूएपीए के धारा लगाई गई है क्योंकि पुलिस का कहना है कि वे सोशल मीडिया पर “राष्ट्र-विरोधी” पोस्ट प्रकाशित करती हैं। 

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, सामान्य नागरिकों, और पत्रकारों द्वारा राज्य के कथानक को चुनौती देना, सरकार की आलोचना करना, कार्यपालिका से असंतोष व्यक्त करना, और सरकार की नीतियों के प्रति सवाल उठाना – यह सब भारतीय संविधान के तहत संरक्षित हैं, और इनके लिये लोगों को धमकाना या उन्हें गिरफ्तार करना निन्दनीय है। इन कृत्यों को अपराधीकरण और संदेह के साथ देखा जाना तो दूर, ये गतिविधियाँ किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में अत्यावश्यक हैं, जो विचारों के मुक्त आदान-प्रदान पर आधारित है। देश के भविष्य को बचाने के लिये यह ज़रूरी है कि कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और सामान्य नागरिकों को अभिव्यक्ति की आज़ादी पूर्ण रूप से मिले, उन पर इस प्रकार के हमलों का अंत हो और इन कठोर कानूनों के तहत परिरुद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को तुरंत रिहा किया जाये।

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