Tue. Oct 22nd, 2019

राजस्थान ने फिर की ऐतिहासिक पहल, 13 विभागों की 23 योजनाओं से जुड़ी सूचनाओं को किया सार्वजनिक

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उद्घाटन सत्र।

जयपुर। सूचना के अधिकार के क्षेत्र में देश को रास्ता दिखाने वाले राजस्थान सरकार ने एक बार फिर एक नई पहल की है। उसने तमाम ऐसी सूचनाओं को सार्वजनिक करने की शुरुआत कर दी है जिसके लिए अभी तक लोगों को आटीआई आवेदन देना पड़ता था। इसके तहत उसने 13 विभागों की 23 योजनाओं से शुरुआत की है। जिसके लिए सरकार ने बाकायदा अलग से jansoochna.rajasthan.gov.in नाम का एक पोर्टल ही बनाया है।

शुक्रवार को सूबे के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसका उद्घाटन किया। और इस मौके पर उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट भी उपस्थित थे। कार्यक्रम में सूचना के अधिकार से जुड़ी तमाम हस्तियों समेत देश के विभिन्न हिस्सों से जनता के आंदोलनों की अगुआई करने वाले लोग शामिल हुए।

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दरअसल आरटीआई एक्ट-2005 के सेक्शन-4 में एक प्रावधान दिया गया है जिसमें सभी सरकारों को खुद से ही सरकार से जुड़ी सभी सूचनाओं को जनता को मुहैया कराना है। इसके लिए उन्हें किसी आवेदन की जरूरत नहीं होनी चाहिए। लेकिन अभी तक न तो केंद्र ने और न ही किसी राज्य ने इस दिशा में कोई पहल की थी। इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की बात तो दूर केंद्र ने उल्टे इसमें कटौती करना शुरू कर दिया है।

उद्घाटन सत्र में मौजूद लोग।

जिसके तहत उसने अभी हाल में सूचना आयुक्तों से जुड़ी वेतन और नौकरी की शर्तों को बदलकर उन्हें अपने हाथ में लेने वाला विधेयक पारित कराया है। इसके साथ ही केंद्रीय सूचना आयोग की स्वतंत्रता पर ही सवालिया निशान लग गया है। अब चाहकर भी कोई सूचना आयुक्त सरकार के खिलाफ नहीं जा सकेगा। ऐसा करने पर उसे तमाम तरह को जोखिम उठाने पड़ सकते हैं।

ऐसे मौके पर अगर किसी राज्य सरकार आगे बढ़कर इसको और मजबूत करने का काम किया है तो उस पर जरूर गौर किया जाना जरूरी है।

अभी तक जिन 23 विभागों को इससे जोड़ा गया है उनमें सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग, जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग, ग्रामीण विकास व पंचायती राज विभाग, प्रारंभिक शिक्षा एवं माध्यमिक शिक्षा विभाग, श्रम एवं रोजगार विभाग, खान एवं भूविज्ञान विभाग, राजस्व विभाग, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग, सहकारिता विभाग, ऊर्जा विभाग, आयोजना व सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार विभाग और प्रशासनिक सुधार विभाग शामिल हैं।

एमकेएसएस की मुखिया अरुणा रॉय।

दिलचस्प बात यह है कि इसके लिए सरकार ने गांवों में ई-मित्र तैनात कर रखे हैं। जिसके तहत एक-एक ग्राम सभा में औसतन 3 से लेकर 4 ई मित्र बनाए गए हैं। जिनसे कोई भी नागरिक या ग्रामीण जाकर मदद ले सकता है। सूचनाओं को देखने और जानने के लिए सरकार ने जगह-जगह एटीएम की तर्ज पर मशीनें लगा रखी हैं। जहां से अपनी पहचान संबंधी जरूरी नंबर डालकर कोई किसी भी तरह की सूचना हासिल कर सकता है। हालांकि सरकार ने अभी इन मशीनों को ग्राम पंचायत घरों में ही रखा हुआ है जिसके चलते वह 24 घंटे लोगों के लिए उपलब्ध नहीं हो सकती हैं। लिहाजा जनता की तरफ से यह मांग उठी है कि उन्हें किसी सार्वजनिक स्थान पर रखवाया जाए।

इन मशीनों से पेंशन से लेकर छात्रवृत्ति और आयुष्मान से लेकर कोटे पर राशन संबंधी कोई भी जानकारी हासिल की जा सकती है। एक उदाहरण के मुताबिक अगर कोई लाभार्थी सरकारी राशन की दुकान पर गया और कोटेदार ने बताया कि राशन खत्म हो गया है तो वह उसे पोर्टल पर राशन का स्टाक होने की जानकारी दे सकता है। और नहीं मिलने पर ऊपरी महकमे में उसकी शिकायत कर सकता है।

उद्घाटन सत्र में मौजूद लोग।

पेंशन या फिर किसी तरह की छात्रवृत्ति को कोई भी शख्स महीने के क्रम में चेक कर सकता है। कब और कितना पैसा उसके खाते में आया है। और नहीं आने पर वह उसकी शिकायत भी कर सकता है। इस तरह से “आपका पैसा, आप का हक” नारे से शुरू हुआ यह आंदोलन अब अपने तार्किक मुकाम तक पहुंच गया है जब जनता को सार्वजनिक योजनाओं से जुड़ी सारी जानकारियां हासिल हो रही हैं।

दरअसल यह सब कुछ संभव हुआ है मजदूर किसान संघर्ष समिति यानी एमकेएसएस और उसके नेताओं खासकर डॉ. अरुणा राय, निखिल डे और उनकी टीम के सहयोग से। आपको बता दें सूचना के अधिकार की पूरी अवधारणा ही अरुणा राय के दिमाग की उपज थी। 1997 से धरना और प्रदर्शन के जरिये दबाव बनाने का जो सिलसिला शुरू हुआ तो सबसे पहले उन्होंने इसे राज्य में लागू करवाने में सफलता हासिल की। और फिर उसके बाद सोनिया गांधी की एडवाइजरी कौंसिल में रहते उन्होंने इसे केंद्र में 2005 में संसद से पारित करवाया।

लिहाजा सूचना के अधिकार के सेक्शन-4 को कैसे आगे बढ़ाया जाए इस संगठन के सामने यह एक बड़ी चुनौती थी। पहले टीम ने सरकार से बात की और जब राजनैतिक नेतृत्व ने हरी झंडी दे दी तब पोर्टल के निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में एमकेएसएस और सरकार ने संयुक्त रूप से प्रयास किया। और इन प्रयासों का ही नतीजा जन सूचना पोर्टल है।

उद्घाटन सत्र।

दिलचस्प बात यह है कि इस पोर्टल पर दी गयी तमाम विभागों से जुड़ी सारी सूचनाएं आटोमैटिक रूप से अपडेट होती रहेंगी। उनके लिए किसी अलग तरह का कोई मैनुअल सहयोग नहीं चाहिए होगा। यह एप एंड्राएड फोन से लेकर डेस्कटाप कहीं पर भी डाउनलोड किया जा सकता है और इस तरह से सरकार से जुड़ी सारी सूचनाएं अपनी मुट्ठी में की जा सकती हैं।

जयपुर के बिड़ला सभागर में उद्घाटन के मौके पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसको पूरा करने की प्रतिबद्धता जाहिर की। उन्होंने कहा कि सूचना के अधिकार का रास्ता भी देश को राजस्थान ने ही दिखाया था और एक बार उसने इस दिशा में नई शुरुआत कर दी है। और उम्मीद है कि दूसरे सूबे और केंद्र भी इस दिशा में आगे बढ़ेंगे। उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने कहा कि केंद्र में मंत्री रहने के दौरान भी सूचना प्रौद्योगिकी उनकी प्राथमिकता में था और अब राज्य में सत्ता में होने के चलते यह उनकी अहम जिम्मेदारी बन जाती है।

एमकेएसएस की मुखिया और मैगसेसे पुरस्कार विजेता अरुणा रॉय ने कहा कि यह उनके सपनों के पूरा होने जैसा है। उनका कहना था कि हमें तकनीक का गुलाम नहीं बनना है बल्कि तकनीक को सार्वजनिक हितों के लिए नियंत्रित करना है। इस पहल से गांव की गरीब और आम जनता सशक्त होगी। साथ ही पूरा समाज और सिविल सोसाइटी इसका लाभ हासिल कर सकेगा।

दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस एपी शाह ने कहा कि कोई भी संसदीय जनतंत्र बगैर सूचना के अधिकार के जिंदा नहीं रह सकता है। साथ ही उनका कहना था कि संविधान में दिए गए नागरिकों के मूलभूत अधिकारों की गारंटी भी इसके बगैर संभव नहीं है।

भारत में यूएन की रेजिडेंट कोआर्डिनेटर रेनाटा लॉक डिसैलियन ने कहा कि पिछले एक दशक में न केवल भारत का आधुनिकीकरण हुआ है बल्कि सभी भारतीय डिजिटली बेहद सशक्त हुए हैं।

जन सूचना पोर्टल का प्रदर्शन करते आर के शर्मा और उनकी टीम।

इसके पहले पूर्व और देश के प्रथम केंद्रीय सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह ने कहा कि आरटीआई का सेक्शन 4 पहले से ही मौजूद था लेकिन उस पर अभी तक किसी सरकार ने पहल नहीं की थी। यह अच्छी बात है कि राजस्थान ने एक बार फिर देश को रास्ता दिखाने का काम किया है।

पूर्व सूचना आयुक्त प्रोफेसर श्रीधर आचार्युलु ने कहा कि राजस्थान की इस पहल को पूरे देश में ले जाने की जरूरत है। और जगह-जगह इसको लेकर सरकारों पर कैसे दबाव बनाया जा सके यह एक महत्वपूर्ण काम हो गया है।

इस मौके पर मैगसेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडेय, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रैटिक राइट के जगदीप छोकर और सूचना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके राजू ने भी अपनी बात रखी।

दरअसल दो दिनों तक चले इस कार्यक्रम में तीन सत्र शामिल थे। बृहस्पतिवार को शाम को चले सत्र में देश के अलग-अलग हिस्सों से आये प्रतिनिधियों के सामने पोर्टल के संचालन और उसके कंटेट का प्रदर्शन किया गया है। उसके बाद उसमें कमियों समेत तमाम दूसरी चीजों को जोड़ने के लिए सुझाव मांगे गए। जिसमें अलग-अलग राज्यों और संगठनों से आए प्रतिनिधियों ने अपने बहुमूल्य सुझाव दिए। जिसमें एक बात को लेकर आम सहमति थी कि पोर्टल को पारदर्शी के साथ-साथ जवाबदेह बनाना होगा। और इसकी साख को बनाए रखने के लिए जिडिटल डायलाग को द्विपक्षीय बनाना होगा। साथ ही सूचना संबंधी गल्तियों पर विरोध जताने के साथ ही शिकायत करने और उन्हें हल करने की अलग से व्यवस्था की बात की गयी।

सार्वजनिक तौर पर जारी करने से पहले दो दिनों तक चले विचारों के आदान-प्रदान में तमाम जरूरी कमियों और सुझावों पर गंभीरता से विमर्श किया गया। जिसमें यह बात खुलकर आयी कि किसी चीज को विश्वसनीय बनाने के लिए साख और जवाबदेही का होना उसकी बुनियादी शर्त होती है। लिहाजा सूचनाओं को देने के साथ ही तथ्यात्मकता की जांच और उसका काउंटर फीडबैक पूरी कवायद का अभिन्न हिस्सा हो जाता है। लिहाजा डिजिटल डायलाग को टू वे प्रक्रिया को सुनिश्चित करने के साथ ही उसके मुकाम तक पहुंचाया जा सकता है।

पूरे आयोजन के सूत्रधार रहे एसकेएसएस के निखिल डे ने आखिर में एक बार फिर देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रतिनिधियों को बैठाकर उनसे जरूरी सुझाव मांगे। जिसमें यह बात खुलकर आयी कि इसे दूसरे प्रदेशों में तमाम संगठनों के जरिये प्रचारित करने के साथ ही सरकार से उन्हें लागू करने के लिए प्रस्ताव पारित कराने की जरूरत है। इसके साथ ही इसको लेकर राष्ट्रीय स्तर पर सेमिनार और सम्मेलन का आयोजन इस दिशा में बेहद कारगर साबित हो सकता है।

उद्घाटन के मौके पर राजस्थान की ग्राम और क्षेत्र पंचायतों के 10 हजार से ज्यादा प्रतिनिधि मौजूद थे।

(जयपुर से लौटकर जनचौक के संस्थापक संपादक महेंद्र मिश्र की रिपोर्ट।)

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