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राज्यों को आर्थिक तौर पर कंगाल बनाने की केंद्र सरकार की रणनीति के निहितार्थ

संघ नियंत्रित भाजपा, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विभिन्न तरीकों से देश की विविधता एवं विकेंद्रीकरण को समाप्त करने की कोशिश कर रही है। इसका लक्ष्य पूरे देश में संघ की सामाजिक-सांस्कृतिक नीतियों को थोपने के मार्ग की सारी रूकावटों को दूर करना और दूसरा पूरे देश के कार्पोरेटीकरण की प्रक्रिया को तीव्र करना। इन दोनों लक्ष्यों को तेजी से हासिल करने की एक अनिवार्य शर्त है, राज्यों की संवैधानिक स्वायत्तता को कम से कम कर देना या करीब-करीब समाप्त कर देना।

हम सभी जानते हैं कि भारतीय संविधान ने राज्यों और केंद्र के बीच शक्तियों का बंटवारा तीन रूपों में सूचीबद्ध किया है। पहली वह सूची जो पूरी तरह राज्यों के अधिकार क्षेत्र में है और दूसरी वह सूची जिसमें राज्यों और केंद्र दोनों का समान अधिकार है, जिसे समवर्ती सूची कहते हैं और तीसरी वह सूची जो पूरी तरह केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में है।

पूरे देश में संघ-भाजपा पोषित हिंदू राष्ट्रवाद की संकल्पना लागू करने का काम और देश का पूरी तरह कार्पोरेटीकरण करने का कार्य भाजपा दो तरीकों से कर सकती थी। पहला केंद्र के साथ सभी राज्यों में अपनी सरकारें बनाकर और दूसरा सभी राज्यों के केंद्र की इच्छानुसार चलाकर। केंद्र के साथ सभी राज्यों में एक साथ सरकार बनाए रखना एक मुश्किल कार्य है, भाजपा के तमाम हथकंडों के बाद भी विभिन्न प्रदेशों में गैर-भाजपा सरकारें बन रही हैं। ऐसे में दूसरा रास्ता बनता है, वह गैर-भाजपा सरकारों को केंद्र भाजपा सरकार के इशारे पर चलने के लिए मजबूर करना। इसके लिए भाजपा तरह-तरह के हथकंडे इस्तेमाल कर रही है, जिसमें विभिन्न केंद्रीय एजेंसियों का गैर-भाजपा सरकार के खिलाफ इस्तेमाल भी शामिल है।

विभिन्न राज्यों की गैर-भाजपा सरकारों  को नियंत्रित करने, उन्हें जनता के बीच अलोकप्रिय बनाने और उन्हें दबाव में लेकर इच्छानुसार संचालित करने के लिए केंद्र की भाजपा सरकार राज्यों को आर्थिक तौर पर कंगाल बना रही है और यह कार्य कोविड-19 के दौरान जोर-शोर से किया जा रहा है। यहां भी भाजपा आपदा को अवसर के रूप में इस्तेमाल कर रही है।

आर्थिक तौर पर राज्यों को कंगाल बनाने का सबसे ताजा उदाहरण राज्यों को जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) की क्षतिपूर्ति देने से इंकार कर देना, जिसके लिए केंद्र राज्यों के साथ किए गए जीएसटी समझौते के तहत नैतिक और कानूनी तौर पर बाध्य है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कोविड-19 को एक्ट ऑफ गॉड (भगवान की कार्रवाई) कह कर राज्यों को कर क्षतिपूर्ति देने से इंकार कर दिया।

उन्होंने यह भी कह दिया कि राज्य अपने आर्थिक संसाधन खुद जुटाएं, जबकि तथ्य यह है कि राज्यों के हाथ में आर्थिक संसाधन जुटाने के वित्तीय स्रोत और अधिकार नहीं के बराबर बचे हैं। यहां याद कर लेना जरूरी है कि जीएसटी से पहले राज्य अपने प्रदेशों विभिन्न तरह के कर लगाने को स्वतंत्र थे। जीएसटी के बाद सिर्फ पेट्रोलियम पदार्थ, शराब  रियल स्टेट और बिजली ही ऐसे क्षेत्र बचे हैं, जहां राज्य सरकारें अपनी इच्छानुसार कर लगाने को स्वतंत्र हैं।

जीएसटी लागू करते समय जो समझौता हुआ था, उसके अनुसार पांच सालों ( 2017-22) तक केंद्र सरकार को जीएसटी क्षतिपूर्ति फंड से राज्यों को प्रत्येक दो महीने पर उतनी क्षतिपूर्ति देनी थी, जितना राज्यों के करों का नुकसान होगा। वर्तमान समय में केंद्र सरकार को राज्यों को करीब 2.35 लाख करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति देनी थी। लेकिन 27 अगस्त, 2020 को हुई जीएसटी काउंसिल की बैठक में केंद्र सरकार ने कह दिया है कि राज्यों के कर में हुई 2.35 लाख करोड़ रुपये की क्षति में सिर्फ 97,000 करोड़ रुपया जीएसटी लागू होने के चलते हुए हैं, शेष नुकसान कोविड-19 के चलते यानि भगवान की कार्रवाई ( एक्ट ऑफ गॉड) के चलते हुआ है, जिसके लिए केंद्र सरकार जिम्मेदार नहीं है। यह बात मीटिंग में स्वयं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कही।

देश के कई सारे राज्यों की स्थिति यह है कि उनके पास आवश्यक खर्चों के लिए पैसा नहीं है, यहां तक कि वे कोविड-19 के दौर में फ्रंट लाइन के सबसे अगली पंक्ति के चिकित्साकर्मियों को भी तनख्वाह देने की स्थिति में नहीं हैं। केंद्र सरकार ने राज्यों को अपने तरीके से संसाधन जुटाने, बचाने और उधार लेने के परामर्श दिए। जबकि सच्चाई यह है कि राज्यों के पास वित्तीय संसाधन जुटाने के बहुत कम स्रोत और अधिकार हैं।

करीब सभी गैर-भाजपा सरकारों ने केंद्र के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। प्रदेशों की भाजपा सरकारें भी मन-मसोस कर चुप हैं, क्योंकि वे अपने पोलिटिकल बॉस (नरेंद्र मोदी) की मुखालफत करने की सोच भी नहीं सकते, क्योंकि भाजपा शासित राज्यों के अधिकांश मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्रियों की अपनी स्वतंत्र राजनीतिक हैसियत नहीं के बराबर है, अधिकांश संघ-मोदी की कृपा से मुख्यमंत्री बने हुए हैं और बने रह सकते हैं।

जीएसटी के बाद राज्य सरकारों द्वारा वित्तीय स्रोत जुटाने के अवसर अत्यन्त सीमित हो गए हैं, जबकि केंद्र कई तरीकों से संसाधन जुटा सकता है। केंद्र सरकार के पास उधार लेने का अधिकार है, जबकि राज्य सरकारें केंद्र सरकार की अनुमति के बिना उधार नहीं ले सकती हैं। केंद्र सरकार बहुत कम ब्याज दर पर उधार ले सकती है, जबकि राज्य सरकारों को ऊंची ब्याज दर पर उधार लेना पड़ता है। केंद्र सरकार आरबीआई के लाभांश और रिजर्व को ले सकती है और लेती रहती है, जबकि राज्यों को यह भी अधिकार नहीं है।

राज्यों को आर्थिक तौर पर कंगाल बनाकर और उन्हें जनकल्याण के कार्यों के लिए खर्च करके आर्थिक तौर पर अक्षम बनाकर उनकी राजनीतिक जमीन खिसका देना चाहती है और देश के हिंदूकरण और कार्पोरेटाइजेशन के लिए बाध्य करने की पूरी परिस्थिति बना रही है और काफी हद तक बना चुकी है और साथ ही संघीय ढांचे को तहस-नहस करके भारतीय लोकतंत्र के एक अन्य पहलू को अत्यन्त कमजोर बना चुकी है।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक सलाहकार संपादक हैं।)

This post was last modified on September 21, 2020 10:01 am

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