Subscribe for notification

सार्क देशों में समन्वय के प्रयत्नों की शिक्षा

सार्क के मंच को नष्ट करने का नुक़सान शायद मोदी जी को अब समझ में आ रहा होगा। पर, सार्क देशों के बीच समन्वय बनाने के पहले क्या यह ज़रूरी नहीं था कि भारत के सभी राज्यों के बीच भी समन्वित कार्रवाई का एक सांस्थानिक ढाँचा विकसित किया जाता, जो अभी कहीं नज़र नहीं आ रहा है ।

सार्क के कोरोना कोष में उदारता से एक करोड़ डालर डालने वाली सरकार क्या बताएगी कि उसके गृह मंत्रालय ने राज्य विपदा कोष से कोरोना से लड़ने के लिए खर्च करने की जो अनुमति दी थी, उसे क्यों रद्द कर दिया? इसमें कोरोना से पीड़ित रोगियों के इलाज के लिये अस्पताल का खर्च उठाने और इससे मरने वालों के परिजनों को चार लाख रुपयों का मुआवज़ा देने की बात कही गई थी ।

एक और महत्वपूर्ण सवाल है कि सार्क देशों के प्रधानों के साथ वार्ता में भी प्रधानमंत्री ने भारत में कोरोना से लड़ने की तैयारियों के बारे में ग़लत बातें क्यों कही ? क्यों उन्होंने कहा कि भारत में जनवरी महीने के मध्य से ही हवाई अड्डों पर जाँच की व्यवस्था शुरू कर दी गई थी, जबकि ऐसी जाँच काफ़ी बाद में शुरू हुई है? चंद रोज़ पहले तक विदेशी नागरिक भी यहाँ बिना जाँच के प्रवेश कर पा रहे थे। मोदी जी ने भारत में रैपिड रिस्पांस फ़ोर्स की बात की, जब कि भारत के लोगों को ही ऐसी किसी फ़ोर्स की कोई जानकारी नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना से पीड़ित देशों में भारत में ही तुलनात्मक रूप से सबसे कम जाँच की व्यवस्था है ।

अचानक, बिना पूर्व तैयारी के सार्क देशों के प्रमुखों से वार्ता की इस पहल का जो परिणाम निकलना था, वही निकला । पाकिस्तान ने कश्मीर के मुद्दे को उठा कर भारत की इस पूरी पहल पर ही सवाल उठा दिया; एक जन-स्वास्थ्य के विषय को राजनीतिक रंग देने से परहेज़ नहीं किया। समन्वय हो, क्षेत्रीय समन्वय और सारी दुनिया के देशों के बीच समन्वय हो, इससे आज कोई भी आदमी इंकार नहीं कर सकता है। ऐसी किसी भी पहल का हर कोई स्वागत करेगा। लेकिन समन्वय के नाम पर किसी भी प्रकार का मिथ्याचार, ख़ास तौर पर कूटनीतिक जगत में छिपता नहीं है । पर हमारे मोदी जी लाचार हैं !

बहरहाल, क्षेत्रीय सहयोग के मंचों की अहमियत को नज़रंदाज़ करके पिछले दिनों भारत ने अपने पड़ोसी देशों के साथ जिस प्रकार संबंध बिगाड़े हैं, आज की विपदा की घड़ी में इन्हें फ़ौरन सुधारने की ज़रूरत है। ऐसे समय में पाकिस्तान के रुख़ का तुर्की दर तुर्की जवाब बुद्धिमत्ता नहीं कहलाएगी । कभी-कभी ग़म पीना भी कूटनीति के लिये ज़रूरी होता है ।

पुन:, सार्क देशों के बीच समन्वय से कम महत्वपूर्ण नहीं है, भारत के सभी राज्यों के बीच समन्वय क़ायम करना। ऐसे समय में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने वाली सारी गतिविधियाँ, विधायकों को गाय-बैल की तरह बसों में लाद कर एक राज्य से दूसरे राज्य में घुमाना केंद्र और राज्य के बीच समन्वय को बनाने के बजाय उसे तोड़ने की नग्न कोशिश है । अफ़सोस की बात यह है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय अभी ऐसे बुरे कामों में ही मुब्तिला है।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं आजकल आप कोलकाता में रहते हैं।)

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

This post was last modified on March 16, 2020 6:43 pm

Share