धोखा, घपला, मनी लॉन्ड्रिंग और अडानी समूह का ढहता साम्राज्य

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हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट आए पूरा एक महीना हो गया पर अब तक अडानी समूह ने उस संस्था के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई तक शुरू नहीं की। जबकि हिंडनबर्ग की वजह से अडानी समूह के मालिक गौतम अडानी, जो कभी दुनिया के दूसरे-तीसरे नंबर के अमीर व्यक्ति थे, अब मात्र एक महीने में ही खिसक कर तैंतीसवें स्थान पर आ गए हैं। अर्थ विशेषज्ञों की मानें तो यह गिरावट अभी और हो सकती है।

हिंडनबर्ग ने तो अपनी रिपोर्ट में ही कह दिया था कि अडानी समूह के शेयर 85% अधिक मूल्य पर बाजार में हैं। अब तक 70% की गिरावट उसमें आ चुकी है। यह एक ढहता हुआ आर्थिक साम्राज्य है। एक ऐसा आर्थिक साम्राज्य जिसे सरकार का भरपूर समर्थन और अतिशय राजकृपा पिछले आठ साल से मिल रही थी।

जब देश की जनता की आय गिर रही थी, कल कारखाने बंद हो रहे थे, नौकरियां कम हो रही थीं, तब देश के दो बड़े पूंजीपति घराने तेजी से अमीरी के सोपान पर चढ़ते चले जा रहे थे। उसमें भी अडानी तो सोपान से नहीं, बल्कि एलिवेटर से शिखरोन्मुख थे।

अडानी का ढहता साम्राज्य हमें खुशी नहीं देता है, क्योंकि इसने पहले से ही ऑफशोर पनाहगाहों में अरबों रुपये जमा कर रखे होंगे। इसका कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। पर वे खुदरा निवेशक, आम जनता, जिन्हें हम अपने परिवारों, दोस्तों के रूप में जानते हैं, वे आज अडानी के छल छद्म के पर्दाफाश से अपनी गाढ़ी कमाई का धन गंवा रहे हैं उनकी व्यथा जरूर हमें पीड़ित करती है। बात उनकी होनी चाहिए।

हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बारे में दुनियाभर के अखबार बातें कर रहे हैं, अपने आकलन लिख रहे हैं, अपने विश्लेषण से निवेशकों को सजग कर रहे हैं। दुनिया भर की शीर्षस्थ रेटिंग एजेंसियां शेयरों के दाम और कंपनी की हैसियत का मूल्यांकन कर रही हैं।

आम निवेशकों और सरकारी बैंकों, एलआईसी, अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा अडानी समूह को दिए गए ऋण पर संकट आ खड़ा है लेकिन हर्षद मेहता, केतन पारिख जैसे बड़े घोटालों से भी बड़े घोटाले को लेकर कोई जांच होने की तो बात ही छोड़ दीजिए, संसद में चर्चा तक नहीं हो रही है।

अडानी का नाम लेना वर्जित है, अडानी के बारे में सवाल पूछना मना है और रहा सवाल अडानी और सरकार या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आपसी संबंधों पर कुछ बोलना तो ईशनिंदा जैसा हो गया है। सदन में जेपीसी यानी संयुक्त संसदीय समिति की मांग ठुकरा दी गई।

सदन में विपक्ष के नेताओं राहुल गांधी तथा अन्य ने जो सवाल इस हिंडनबर्ग रिपोर्ट के संदर्भ में सरकार से जानना चाहे, उन्हे भी सदन की कार्यवाही से हटा दिया गया। आखिर, अडानी के नाम से इतनी परेशानी क्यों? यहीं यह संदेह उठता है, कुछ तो है, जिसकी पर्दादारी है!

पर यह पर्दा धीरे धीरे उठ रहा है। सूचना क्रांति के इस युग में अब कोई राज़ पोशीदा रह जाय, यह मुमकिन नहीं रहा। 2014 में सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे में जब गौतम अडानी उनके साथ दिखे, तो उस तस्वीर में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की तत्कालीन चेयरपर्सन अरुंधती घोष भी दिखीं थी।

अरुंधती घोष एसबीआई से रिटायर होने के तुरंत बाद ही रिलायंस के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में शामिल हो गई थीं, को अडानी के ऑस्ट्रेलिया की कोयले खदान के लिए ऋण स्वीकृति के लिए ऑस्ट्रेलिया बुलाया गया था। यह एक प्रकार का संदेश था कि गौतम अडानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कितने नजदीक है।

फिर इसी तरह के और भी दौरे हुए जहां पीएम के दौरे के बाद अडानी समूह को उक्त देश से व्यवसायिक लाभ प्राप्त हुआ। जैसे श्रीलंका का बंदरगाह और बिजली प्रोजेक्ट तथा इजराइल का हाइफा बंदरगाह। श्रीलंका की संसद में तो मंत्री ने खुलेआम यह कहा भी कि अडानी को ठेका देने के लिए पीएम नरेंद्र मोदी ने सिफारिश की थी। यह अलग बात है कि उन्होंने बाद में इससे इंकार कर दिया।

पूंजीवादी व्यवस्था में सरकार पूंजीपतियों की लॉबी को दुनिया भर में उनके व्यवसायिक हितों के लिए भी काम करती है। पर यहां तो पूंजीपतियों की कोई लॉबी नहीं, बस दो ही पूंजीपति ऐसे हैं, जिनके लिए सरकार या बेहतर होगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुल कर उनके हितों की रक्षा की।

गौतम अडानी का उदाहरण ऊपर दिया जा चुका है और दूसरा महत्वपूर्ण उदाहरण है अनिल अंबानी का जिन्हे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड HAL से राफेल का तयशुदा ठेका रद्द कर सौंप दिया गया। विमान निर्माण में एचएएल का लंबा अनुभव धरा का धरा रह गया और अनिल अंबानी वह ठेका ले उड़े, जो फिलहाल खुद को दिवालिया कह चुके हैं। पर बात फिलहाल गौतम अडानी की ही की जाय तो उचित है, अन्यथा अनावश्यक विषयांतर हो जायेगा।

अडानी समूह पर हिंडनबर्ग रिपोर्ट के आए एक माह बाद भी सरकार और प्रधानमंत्री की चुप्पी इस बात को ही पुष्ट करती है कि अडानी और पीएम के रिश्तों में कुछ ऐसा है जिसे न तो सरकार खोलना चाहती है और न ही बीजेपी। और तो और खुद को सांस्कृतिक संगठन कहने वाली आरएसएस भी इस मुद्दे पर अडानी के साथ है।

हिंडनबर्ग के 88 सवालों का जवाब तो अडानी को देना है पर सरकार भी इन सवालों से बच नहीं सकती है। आप को याद होगा 2014 के आम चुनाव में भ्रष्टाचार और कलाधन सबसे बड़े चुनावी मुद्दे थे। सरकार ने कालाधन का पता लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एक कमेटी का गठन किया।

एक एसआईटी भी गठित की गई। उसकी एक रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में सीलबंद लिफाफे में सौंपी भी गई पर उसका कोई भी विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया। काले धन के मुद्दे पर हर बार बात होती है और इधर बात पर बात होती रहती है और उधर विदेशों में काला धन बढ़ता रहता है।

हिंडनबर्ग रिपोर्ट में मूल बिंदु ही शेल कंपनियों से अडानी समूह को निवेश का है। यह सारी कंपनियां मारिशस, साइप्रस जैसे ऐसे देश से हैं जिन्हे टैक्स हेवेन कहा जाता है और वह कालाधन का स्वर्ग कहा जाता है। यह सारी कंपनियां विनोद अडानी की हैं, और विनोद, गौतम अडानी के बड़े भाई हैं, जो भारतीय नागरिक नहीं हैं।

इस बात की पूरी संभावना है कि इन शेल कंपनियों से अडानी समूह में आया हुआ पूरा निवेश मनी लांड्रिंग के माध्यम से आया हुआ काला धन हो, जो भारतीय कानून के अंतर्गत एक दंडनीय अपराध है। क्या सरकार को इस बात की जांच नहीं करनी चाहिए कि यह शेल कंपनियां किसकी हैं। वे करती क्या हैं। उनके आय के स्रोत क्या हैं। और यह मनी लांड्रिंग का कोई मामला तो नहीं है।

इन बिंदुओं पर प्रवर्तन निदेशालय जैसी एजेंसियों को अब तक सक्रिय हो जाना चाहिए था पर जांच की कोई सुगबुगाहट तक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर एक स्वागतयोग्य पहल की है और अदालत एक एक्सपर्ट का पैनल जांच के लिए बनाने जा रही है। अभी पैनल के नामों का खुलासा नहीं हुआ है।

संसद में अडानी घोटाले की चर्चा भले ही बाधित कर दी जाय। अडानी शब्द का उल्लेख भले ही सदन में ट्रेजरी बेंच का ब्लड प्रेशर बढ़ा दे पर जिस तरह से समूह के शेयरों में पिछले एक माह से लगातार गिरावट जारी है, उसे देखते हुए दुनिया भर के अर्थ विशेषज्ञ यह आशंका जता रहे हैं कि कहीं अडानी समूह का वर्तमान संकट एनरॉन कंपनी की ही तर्ज पर तो नहीं है?

अडानी समूह का नाम लिए बिना ही अमेरिका के पूर्व वित्तमंत्री और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के चेयरमैन लैरी समर्स ने यह आशंका जताई है। ज्ञातव्य है एनरॉन घोटाला कांड अमेरिका की सबसे बड़ी लेखा धोखाधड़ी के परिणामस्वरूप हुआ था और ऊर्जा क्षेत्र की दिग्गज कंपनी एनरॉन उस घोटाले के कारण दिवालिया हो गई थी। कहीं अडानी समूह भी उसी नक्शे कदम पर तो नहीं जा रहा है?

लैरी समर्स ने भारतीय समूह का नाम लिए बिना भारत में अडानी विवाद की तुलना अमेरिका में “संभावित एनरॉन मोमेंट” से की है और कहा कि इसका खाका जी-20 के वित्त मंत्रियों के दिमाग में होगा, जब वे इस सप्ताह के अंत में बैंगलोर में बैठक करेंगे।

17/02/23 को ब्लूमबर्ग के वॉल स्ट्रीट वीक पर सवालों का जवाब देते हुए समर्स ने समूह का नाम लिए बिना अडानी का मुद्दा उठाया। यह पूछने पर कि वह जी-20 बैठकों में क्या देखना चाहते हैं? समर्स ने कहा कि “हम अभी इसके बारे में बात नहीं करेंगे लेकिन भारत में यह एक तरह का संभावित एनरॉन जैसा है।

समर्स ने कहा कि “और मैं कल्पना करता हूं कि भारत दुनिया के सबसे बड़े देश के रूप में उभर रहा है और भारत में बैठक हो रही है। इस बारे में सभी उपस्थित लोगों में बहुत उत्सुकता होगी कि यह सब कैसे हुआ और क्या हुआ। इस पर चर्चा हो सकती है।”

एनरॉन घोटाला अमेरिका की सबसे बड़ी लेखांकन धोखाधडी accounting and auditing fraud में से एक माना जाता है। इसके परिणामस्वरूप ऊर्जा और वस्तुओं की इस दिग्गज कंपनी को दिवालिया होने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

कई वर्षों से एनरॉन के शीर्ष अधिकारी एक संदिग्ध मार्क-टू-मार्केट अकाउंटिंग तंत्र का उपयोग करके मामलों की वास्तविक हैसियत और स्थिति को छिपाते रहे, जिसने वर्तमान आय में कुछ डेरिवेटिव अनुबंधों पर भविष्य के अवास्तविक लाभों को पहचान कर भ्रामक लाभ दिखाने की कोशिश की थी।

जब मामला नियंत्रण से बाहर होने लगा तो एनरॉन के वित्तीय अधिकारियों ने कई विशेष प्रयोजन संस्थाओं (एसपीई) की स्थापना की, जहां संकटग्रस्त संपत्तियों का  अंबार था, ताकि कंपनी के बही-खाते साफ-सुथरे बने रहें। अंततः यह मामला आर्थर एंडरसन द्वारा एनरॉन से ब्रेकअप कर लेने के कारण अमेरिका के सबसे बड़े लेखा घोटाले में बदल गया। जिसने एक लेखा परीक्षक के साथ-साथ एनरॉन के सलाहकार के रूप में भी काम किया था।

इस खुलासे और घोटाले के कारण एनरॉन के कई अधिकारियों को कारावास का दंड भी मिला। इस घोटाले के परिणामस्वरूप सार्वजनिक रूप से कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए वित्तीय रिपोर्टिंग की सटीकता बढ़ाने के लिए डिज़ाइन किए गए नए नियमों और कानूनों को लाया गया। उनमें सबसे महत्वपूर्ण सरबेंस-ऑक्सले अधिनियम (2002) है, जिसमें वित्तीय रिकॉर्ड को नष्ट करने, बदलने या गढ़ने के लिए जिम्मेदार कंपनियों और अधिकारियों पर कठोर दंड का प्राविधान है।

हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट ने अडानी समूह की वित्तीय सत्यनिष्ठा पर सवाल उठाए हैं।  अडानी पर वैश्विक टैक्स हेवन में स्थित संस्थाओं से धन की मनी लांड्रिंग करने का आरोप लगाया गया है, जिनके लाभकारी स्वामित्व को अपारदर्शी कॉर्पोरेट संरचनाओं के पीछे छुपाया गया था।

मनी लांड्रिंग भारतीय कानून के अंतर्गत भी एक दंडनीय अपराध है। अंतर यह है कि अडानी पर अपनी सूचीबद्ध संस्थाओं के स्टॉक की कीमतों में इस तरह से हेरफेर करने का आरोप लगाया गया है कि इसने गौतम अडानी को सापेक्ष अस्पष्टता से विभिन्न वैश्विक अमीर सूची के शीर्ष पर पहुंचा दिया।

24 जनवरी को हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद अडानी समूह की कागजी संपत्ति सिकुड़ गई। नियामकों और शेयरधारकों को जवाब और कारण का अंदाजा टटोलते हुए छोड़ दिया गया।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस हैं)

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