Monday, December 5, 2022

ग्राउंड रिपोर्ट:दुमका में 1953 का स्थापित स्कूल विलय में हुआ बंद, गांव के बच्चों ने छोड़ दी पढ़ाई

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किसी भी राष्ट्र और राज्य की उन्नति में शिक्षा की अहम् भूमिका होती है। शिक्षा से ही आम जन में जागरूकता पैदा होती है, जो उन्हें उनके हक अधिकार की जानकारी के साथ साथ उनके कर्तव्य का भी बोध कराता है।

लिहाजा प्रत्येक बच्चे को शिक्षा उपलब्ध हो, इस कारण भारत सरकार द्वारा शिक्षा का अधिकार अधिनियम कानून, 2009 (आरटीई) पारित किया गया।

आपको बता दें कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत 6 से14 वर्ष के हर बच्चे को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा देने का प्रावधान है। गरीब-अमीर सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा देने के लिए वर्ष 2009 में भारत सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम बनाया। लेकिन यह अधिनियम पूरे देश में अप्रैल 2010 में लागू किया गया।

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बावजूद इसके आज देश में शिक्षा की जो बदतर स्थिति है वह किसी से छुपी नहीं है। मतलब शिक्षा का अधिकार अधिनियम केवल कागजों तक सिमट कर रह गया है।

एक रिपोर्ट के अनुसार देश में लगभग 1.2 लाख एकल-शिक्षक विद्यालय हैं, जिनमें से 89% ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को शिक्षकों की मौजूदा कमी को पूरा करने के लिये 11.16 लाख अतिरिक्त शिक्षकों की ज़रूरत है।

बता दें कि निजी क्षेत्र में कार्यरत शिक्षकों का अनुपात 2013-14 के 21% से बढ़कर 2018-19 में 35% हो गया। जबकि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अनुसार, छात्र-शिक्षक अनुपात (पीटीआर) कक्षा 1-5 तक 30:1 और उच्च कक्षाओं में 35:1 होना चाहिये।

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रिपोर्ट बताती है कि स्कूलों में कंप्यूटिंग डिवाइस (डेस्कटॉप या लैपटॉप) की कुल उपलब्धता शहरी क्षेत्रों में 43% और समग्र भारत के स्तर पर 22% है। शहरों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में कंप्यूटिंग डिवाइस की कुल उपलब्धता मात्र 18% है।

पूरे भारत में स्कूलों में इंटरनेट की पहुंच शहरी क्षेत्रों में 42% की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 14% है और समग्र भारत के स्तर पर यह 19% है।

अतः इन आंकड़ों से देश में शिक्षा की स्थिति को स्वतः समझा जा सकता है।

झारखंड की बात करें तो राज्य के शिक्षा विभाग (Jharkhand Education Department) के आंकड़ों के अनुसार राज्य स्थापना वर्ष यानी 2000 में राज्य में 16,022 सरकारी स्कूल थे। वहीं आज इनकी संख्या 41,196 हो गई है। बता दें कि कुल 41,196 स्कूलों में शहरी क्षेत्र में 1,666 प्राइमरी स्कूल, 407 सेकेंडरी व हायर सेकेंडरी और ग्रामीण क्षेत्र में 36,461 प्राइमरी स्कूल तथा 2,662 सेकेंडरी व हायर सेकेंडरी स्कूल हैं।

समय के साथ सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी होती चली गई, लेकिन शिक्षक नगण्य रहे।

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ऐसे में शिक्षक बढ़ाने की बजाय राज्य की पिछली रघुवर सरकार ने 2017-19 के बीच दो चरणों में करीब 5,700 स्कूलों को दूसरे स्कूलों में विलय करके उन्हें बंद कर दिया। जिसके कारण ग्रामीण क्षेत्र के कई बच्चों ने स्कूल जाना इसलिए छोड़ दिया कि विलय किए गए स्कूल उनके पहले स्कूल से काफी दूर हो गए।

झारखंड में 2,863 स्कूल ऐसे हैं जहां 25 से भी कम संख्या में बच्चे नामांकित हैं। इनमें 32 हाई स्कूल हैं। वहीं चिंताजनक बात यह है कि एक दर्जन ऐसे स्कूल हैं जहां एक भी बच्चे का नामांकन नहीं हुआ है। राज्य के 4,872 स्कूलों में नामांकन में कमी आई है।

यह बात हाल ही में शिक्षा विभाग की हुई समीक्षा बैठक में सामने आई है। समीक्षा में यह बात सामने आई है कि रांची, गुमला, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम, खूंटी, साहिबगंज, हजारीबाग, धनबाद, दुमका तथा बोकारो में ऐसे स्कूलों की संख्या अधिक है जहां 25 से कम संख्या में बच्चे नामांकित हैं। रांची में ऐसे स्कूलों की संख्या 350, गुमला में 250, पूर्वी सिंहभूम में 200 तथा दुमका में 200 हैं। देवघर के संस्कृत विद्यालय में दो साल से इसलिए नामांकन नहीं हुआ क्योंकि वहां एक भी शिक्षक नहीं है।

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बताना जरूरी हो जाता है कि एक लंबे संघर्ष और कुर्बानी के बाद हमारा देश आजाद हुआ। आजाद भारत में सबको शिक्षा, सबको स्वास्थ्य, सबको रोजगार की बात हुई। लेकिन आजादी के 75 वर्ष बाद और झारखंड अलग राज्य गठन के 22 वर्ष बाद भी समानुपातिक विकास आज भी कोसों दूर है।

वैसे हम जब पूरे झारखंड की बात करें तो आज भी समस्याओं की एक लंबी फेहरिश्त है जो प्रशासनिक व राजनीतिक भ्रष्टाचार का शिकार है।

हम आते हैं दुमका जिला के रानीश्वर प्रखंड के रंगरलिया पंचायत के पाथरचाल गांव के प्राथमिक विद्यालय पर जिसे विलय के क्रम में बंद कर दिया गया है। उल्लेखनीय है कि अभी झारखंड के 5,700 प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालय बंद हो चुके हैं।

पिछले कोविड काल के बाद ज्ञान विज्ञान समिति झारखंड ने ऑनलाइन शिक्षा के प्रभाव का एक अध्ययन किया था, जिसमें उसने पाया था कि 87% बच्चों के पास मोबाइल नहीं है। ‘ऑनलाइन शिक्षा बच्चे कैसे प्राप्त करें?’ जैसे सवालों पर समिति ने झारखंड के 5 जिलों के 15 प्रखंडों की 100 पंचायतों में सामुदायिक शिक्षण केंद्र शुरू किया। नाम रखा गया ‘खेत खलियान में शिक्षा।’

इस क्रम में दुमका के रानीश्वर प्रखंड की 5 पंचायतों में 62 सामुदायिक शिक्षण केंद्र शुरू किया गया। समिति ने देखा कि अनुसूचित जनजाति व अनुसूचित जाति के क्षेत्र में अधिकतर स्कूल बंद कर दिए गए हैं। अगर किसी को बंद नहीं किया गया तो वे सिर्फ एक पारा शिक्षक के द्वारा चलाया जा रहा स्कूल को।

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भारत ज्ञान समिति के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. काशी नाथ चटर्जी ने बताया कि ऐसे बंद स्कूल को देखने और बंद होने के प्रभाव के अध्ययन के लिए प्रो. डॉ. डीके सेन, प्रखंड को-ऑर्डिनेटर पुराणचंद, पंचायत को-ऑर्डिनेटर सामुदायिक शिक्षण केंद्र के संचालक जयसेन टुडू साथ पहाड़ व जंगल के बीच बसा दुमका जिले के रानीश्वर प्रखंड के रंगरलिया पंचायत के पाथरचाल गांव के प्राथमिक विद्यालय को देखने गए जिसे विलय के क्रम में बंद कर दिया गया है। पाथरचाल मुख्य सड़क मार्ग से 5 किलोमीटर दूर स्थित है। उन्होंने बताया कि पक्के कच्चे सकरे रास्ते से गुजरते हुए हम लोग गांव पहुंचे। बहुत सारे गांव के लोग हमारा इंतजार कर रहे थे।

पाथरचाल गांव में 83 घर हैं। जिसमें संताल आदिवासी 72 घर, महली आदिवासी के 5 घर और राय के 6 घर शामिल हैं। चटर्जी बताते हैं कि हम गांव के लोगों ने एक स्कूल में ही बैठक शुरू की, जिसमें लगभग 30-40 ग्रामीण शामिल हुए। बातचीत शुरू हुई, सबसे  पहले भुवन टुडू के साथ जो इस स्कूल में 1953 में शिक्षा ग्रहण किया था। उन्होंने बताया कि 1953 में यह स्कूल झोपड़ी में चलता था। फिर गांव के लोगों ने जमीन दी और उनके सहयोग से स्कूल बनना शुरू हुआ। उस समय के शिक्षक का नाम भोलानाथ झा था। टूडू बाद में 10 वीं तक पढ़े और कुछ दिनों तक सरकारी नौकरी भी की।

1972 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा दी थी। 1977 में उन्हें कम्युनिटी हेल्थ वर्कर की नौकरी मिली। 1980 में उन्हें हटा दिया गया। उस समय के यह गांव के सबसे पढ़े लिखे व्यक्ति रहे हैं।

यहां के अधिकतर लोग खेती करते हैं और पशु पालते हैं। यहां किसी की भी सरकारी नौकरी नहीं है। जब बातचीत शुरू हुई तो लोगों ने बताया कि 1953 से चलने वाला स्कूल अचानक बंद हो जाने से यहां के बच्चों की पढ़ाई छूट गई है। यहां से पलाश पाड़ा गांव का प्राथमिक विद्यालय डेढ़ किलोमीटर, हकीकतपुर का विद्यालय 2 किलोमीटर और जय पहाड़ी का विद्यालय डेढ़ किलोमीटर जहां बच्चों को जंगल से होकर जाने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इसलिए कुछ बच्चे इस गांव को छोड़कर पढ़ने के लिए रिश्तेदार यहां चले गए हैं, कुछ बच्चे पढ़ना छोड़ दिए हैं।

दो बच्चों से मुलाकात हुई, जोशी मुर्मू और संतोष मुर्मू जो स्कूल बंद होने के बाद पढ़ाई छोड़ चुके हैं। उनके अभिभावक से जब बात की गयी तो उन्होंने बताया कि दूर के स्कूल में हमारे बच्चे नहीं जाना चाहते। अभी वे जयसेन टुडू के सामुदायिक शिक्षण केंद्र में अध्ययन रत है।

जयसेन ने बताया कि वे ग्रामीणों ने मिलकर निर्णय लिया कि अभी वे इस स्कूल में बच्चों को पढ़ाएंगे और सारे ग्रामीण स्कूल खोलने के लिए पंचायत स्तर पर धरना देंगे। अगर स्कूल नहीं खुला तो वे प्रखंड स्तर व जिला कार्यालय पर भी धरना देंगे।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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