Tuesday, November 29, 2022

न्यायिक जवाबदेही से बचने का रास्ता है ‘सीलबंद कवर न्यायशास्त्र’: दुष्यंत दवे

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पिछले कुछ वर्षों से विभिन्न न्यायालयों द्वारा ‘सीलबंद कवर न्यायशास्त्र’ का प्रायः इस्तेमाल किया गया है, उदाहरण के लिये राफेल फाइटर जेट समझौता (2018), बीसीसीआई सुधार मामला, भीमा कोरेगाँव मामला (2018) आदि। लेकिन‘सीलबंद कवर न्यायशास्त्र’ का विरोध भी हो रहा है क्योंकि यह भारतीय न्याय प्रणाली की पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांतों के अनुकूल नहीं है, क्योंकि यह एक खुली अदालत के विचार के विरुद्ध है, जहाँ निर्णय सार्वजनिक जाँच के अधीन हो सकते हैं। मंगलवार 1 नवम्बर 22 को सीलबंद कवर न्यायशास्त्र’ का मामला एक बार फिर तब उठा जब सुप्रीम कोर्ट में मलयालम समाचार चैनल मीडिया वन द्वारा केरल उच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान चैनल की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने मंत्रालय की ओर से कोर्ट में जमा कराई गई ‘सील्ड फाइल’ पर आपत्ति जताई।

दुष्यंत दवे ने तर्क दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के कथित संरक्षण के तहत दिए गए सीलबंद कवर, विरोधी पक्ष को पूर्वाग्रहित करते हैं।यह एक बहुत ही गंभीर मौलिक समस्या है और इस सिद्धांत के खिलाफ है कि दोनों पक्षों की उस सामग्री तक पहुंच होनी चाहिए जिस पर दूसरा पक्ष निर्भर है। क्या सीलबंद कवर पूर्वाग्रह पैदा करता है। सीलबंद कवर न्यायाधीश के दिमाग को प्रभावित करता है, क्योंकि योर लॉर्डशिप सीलबंद कवर देखते हैं। जिस पर राष्ट्रीय सुरक्षा लिखा होता है।

उन्होंने तर्क दिया कि यह पूरे देश में बार-बार हो रहा है और नागरिकों को यह जानना चाहिए कि क्या पक्षकारों द्वारा दूसरे पक्ष की पीठ के पीछे सीलबंद कवर हलफनामा दिया जा सकता है।

इस पर जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि पिछले सप्ताह स्थायी कमीशन से संबंधित एक मामले में एएफटी द्वारा सीलबंद कवर रिपोर्ट सौंपी गई थी। यह एक सर्विस मामला है तब भी इसे सीलबंद कवर में दिया गया था।

दवे ने कहा कि विदेशी न्यायालयों में भी सीलबंद कवर रिपोर्ट की सराहना नहीं की जाती है। उन्होंने कहा कि मैंने निक्सन के मामले को पढ़ा, जहां अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने इस पर बहुत सख्ती की थी।

इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया वन चैनल प्रतिबंध मामले में मुद्दों को सुलझाने के लिए “सीलबंद कवर” पर भरोसा करने की वैधता से संबंधित मुद्दे की जांच करने की सहमति जताई थी। न्यायालय मुकदमेबाजी के एक पक्ष का उल्लेख कर रहा था, ज्यादातर सरकारी पक्ष, दूसरे पक्ष को प्रतियां साझा किए बिना ‘सीलबंद कवर’ में पीठ के सामने दस्तावेज जमा करना और अदालत उन दस्तावेजों पर भरोसा करते हुए निर्णय देती है। कानूनी हलकों में इस प्रथा की काफी आलोचना हुई है।

मीडिया वन मामले में, केरल उच्च न्यायालय ने गृह मंत्रालय द्वारा सीलबंद लिफाफे में पेश किए गए कुछ दस्तावेजों के आधार पर चैनल के प्रसारण लाइसेंस को नवीनीकृत नहीं करने के केंद्र के फैसले को बरकरार रखा था, जिसने राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को उठाया था। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चैनल का मुख्य तर्क यह है कि प्रतिबंध के कारणों का खुलासा नहीं किया गया है। जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने केंद्र से कहा कि चैनल को बैन करने के कारणों का खुलासा करना होगा ताकि वे अपना बचाव कर सकें।

15 मार्च को, कोर्ट ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय के उस आदेश पर रोक लगा दी थी, जिसने केबल टीवी नेटवर्क रेगुलेशन एक्ट के तहत चैनल के लिए लाइसेंस बढ़ाने से इनकार कर दिया था। इसने चैनल के प्रसारण लाइसेंस को रिन्यू नहीं करने के सूचना और प्रसारण मंत्रालय के फैसले को बरकरार रखने के केरल उच्च न्यायालय के फैसले की आलोचना करते हुए चैनल चलाने वाली कंपनी द्वारा दायर एक विशेष अनुमति याचिका में अंतरिम आदेश पारित किया था।

पीठ ने यह आदेश गृह मंत्रालय द्वारा चैनल चलाने वाली कंपनी के संबंध में सुरक्षा चिंताओं को लेकर पेश की गई फाइलों की जांच के बाद पारित किया था। चैनल ने दलील दी थी कि मंत्रालय ने अपने फैसले के कारणों का खुलासा नहीं किया। इसने याचिकाकर्ता के साथ सामग्री साझा किए बिना, केंद्र द्वारा प्रस्तुत सीलबंद कवर दस्तावेजों के आधार पर याचिका को खारिज करने के उच्च न्यायालय के फैसले पर भी आपत्ति जताई।

दरअसल बीते कुछ दिनों में विभिन्न न्यायालयों द्वारा ‘सीलबंद कवर न्यायशास्त्र’ का प्रायः इस्तेमाल किया गया है, उदाहरण के लिये राफेल फाइटर जेट समझौता (2018), बीसीसीआई सुधार मामला, भीमा कोरेगाँव मामला (2018) आदि।यह उच्चतम न्यायालय और कभी-कभी निचली अदालतों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली एक प्रथा है, जिसके तहत सरकारी एजेंसियों से ‘सीलबंद लिफाफों’ में जानकारी मांगी जाती है और यह स्वीकार किया जाता है कि केवल न्यायाधीश ही इस सूचना को प्राप्त कर सकते हैं।

यद्यपि कोई विशिष्ट कानून ‘सीलबंद कवर’ के सिद्धांत को परिभाषित नहीं करता है, उच्चतम न्यायालय इसे उच्चतम न्यायालय के नियमों के आदेश XIII के नियम 7 और 1872 के भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 123 से उपयोग करने की शक्ति प्राप्त करता है।

नियम के अनुसार, यदि मुख्य न्यायाधीश या अदालत कुछ सूचनाओं को सीलबंद लिफाफे में रखने का निर्देश देते हैं या इसे गोपनीय प्रकृति का मानते हैं, तो किसी भी पक्ष को ऐसी जानकारी की सामग्री तक पहुँच की अनुमति नहीं दी जाएगी, सिवाय इसके कि मुख्य न्यायाधीश स्वयं आदेश दे कि विपरीत पक्ष को इसे एक्सेस करने की अनुमति दी जाए। इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि सूचना को गोपनीय रखा जा सकता है यदि इसके प्रकाशन को जनता के हित में नहीं माना जाता है।

वर्ष 1872 के भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 123 के तहत राज्य के मामलों से संबंधित आधिकारिक अप्रकाशित दस्तावेज़ों की रक्षा की जाती है और एक सरकारी अधिकारी को ऐसे दस्तावेज़ों का खुलासा करने के लिये मजबूर नहीं किया जा सकता है। अन्य उदाहरण जहाँ गोपनीयता या विश्वास के तहत जानकारी मांगी जा सकती है, इसका प्रकाशन जाँच में बाधा डालता है जैसे- विवरण जो पुलिस केस डायरी का हिस्सा है।

यह भारतीय न्याय प्रणाली की पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांतों के अनुकूल नहीं है, क्योंकि यह एक खुली अदालत के विचार के विरुद्ध है, जहाँ निर्णय सार्वजनिक जाँच के अधीन हो सकते हैं।न्याय-निर्णयन की किसी भी प्रक्रिया में विशेष रूप से जिसमें मौलिक अधिकार शामिल हैं, इसके विवादों से संबंधित साक्ष्य दोनों पक्षों के साथ साझा किये जाने चाहिये।

इससे अदालत के फैसलों में स्‍वेच्‍छाचारिता का दायरा  ब्स्धता है , क्योंकि न्यायाधीशों को अपने फैसलों के लिये तर्क देना होता है, जो तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक की वे गोपनीय रूप से प्रस्तुत की गई जानकारी पर आधारित न हों।

इसका विरोध किया जाता है कि जब कैमरे के समक्ष सुनवाई जैसे मौजूदा प्रावधान पहले से ही संवेदनशील जानकारी को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करते हैं तो क्या राज्य को गोपनीयता के साथ जानकारी प्रस्तुत करने का ऐसा विशेषाधिकार दिया जाना चाहिये। यह भी तर्क दिया जाता है कि आरोपी पक्षों को ऐसे दस्तावेज़ों तक पहुँच प्रदान नहीं करना उनके निष्पक्ष परीक्षण और न्याय-निर्णयन के मार्ग में बाधा डालता है।

सीलबंद कवर अलग-अलग न्यायाधीशों पर निर्भर होते हैं जो सामान्य अभ्यास के बजाय किसी विशेष मामले में एक बिंदु की पुष्टि करना चाहते हैं। यह अभ्यास को तदर्थ और मनमाना बनाता है।

सीलबंद कवर न्यायशास्त्र पर उच्चतम न्यायालय ने मॉडर्न डेंटल कॉलेज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2016) मामले में इज़रायल के उच्चतम  न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, अहरोन बराक द्वारा प्रस्तावित आनुपातिकता के परीक्षण को अपनाया, जिसके अनुसार “संवैधानिक अधिकार की एक सीमा संवैधानिक रूप से अनुमेय होगी यदि इसे एक उचित उद्देश्य के लिये नामित किया गया है। इस तरह की सीमा को लागू करने के लिये किये गए उपाय तर्कसंगत रूप से उस उद्देश्य की पूर्ति से जुड़े हों। किये गए उपाय इसलिये आवश्यक हैं क्योंकि ऐसा कोई वैकल्पिक उपाय मौजूद नहीं है जो समान रूप से उसी उद्देश्य को कम सीमा के साथ प्राप्त कर सके।

पी. गोपालकृष्णन बनाम केरल राज्य के मामले में 2019 के फैसले में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि आरोपी द्वारा दस्तावेज़ों का खुलासा करना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही जाँच जारी हो क्योंकि दस्तावेज़ों से मामले की जाँच में सफलता मिल सकती है।

वर्ष 2019 में आईएनएक्स मीडिया मामले में उच्चतम न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा सीलबंद लिफाफे में जमा किये गए दस्तावेज़ों के आधार पर पूर्व केंद्रीय मंत्री को जमानत देने से इनकार करने के अपने फैसले को आधार बनाने के लिये दिल्ली उच्च न्यायालय की आलोचना की थी।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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