Monday, August 8, 2022

शिंदे होंगे महाराष्ट्र के नये मुख्यमंत्री

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एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र के नये मुख्यमंत्री होंगे। वह आज शाम को ही मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। इसके पहले उन्होंने देवेंद्र फडणनवीस के साथ सूबे के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुलाकात कर सरकार बनाने का दावा पेश किया। बीजेपी शिंदे का समर्थन करेगी और इस बात को सुनिश्चित करेगी कि सरकार सुचारू रूप से चले। हालांकि फडणनवीस ने कहा कि वह शिंदे सरकार का हिस्सा नहीं होंगे।

इससे पहले शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने बीती रात महाराष्ट्र में महाविकास आघाड़ी (एमवीए) गठबंधन के विधायक दल के नेता, विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा देने के अलावा मुख्यमंत्री पद से भी अपना त्यागपत्र राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को सौंपकर वो कदम उठाया जो 1996 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) संसदीय दल के नेता के रूप में पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेई भी नहीं कर सके थे। दिवंगत वाजपेई ने अपनी सरकार के प्रति लोकसभा में पेश विश्वासमत प्रस्ताव पर हुई बहस के बाद वोटिंग के ऐन पहले सदन में ही यह कह कर कि अब वह राष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र देने जा रहे हैं उस सियासी प्रकरण का पटाक्षेप कर दिया था। उद्धव ठाकरे ने तीन बरस पुरानी अपनी सरकार के प्रति विधानसभा में 30 जून को विश्वासमत प्राप्त करने के राज्यपाल के फरमान की वैधानिकता को भारत के सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वाली शिवसेना की याचिका पर 29 जून को शाम पाँच बजे से रात नौ बजे सुनवाई के बाद खारिज कर देने के पहले ही सियासी और न्यायिक हवा का रुख भांप कर अपनी सरकार का इस्तीफा दे देने की तैयारी कर ली थी। वह मुख्यमंत्री का राजकीय आवास पहले ही खाली कर चुके थे। राज्यपाल ने उनसे कोई वैकल्पिक व्यवस्था होने तक मुख्यमंत्री बने रहने के लिए कहा है।

आज फ्लोर टेस्ट नहीं होगा

उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद महाराष्ट्र विधानसभा सचिव राजेंद्र भागवत ने सभी राज्य विधायकों को सूचित किया कि राज्यपाल के आदेश के अनुसार, अब फ्लोर टेस्ट की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए आज का विशेष सत्र नहीं बुलाया जाएगा। शिव सेना के सभी बागी विधायक गुवाहाटी से एक चार्टर्ड प्लेन से वापस मुंबई लौट आए हैं।

 

ठाकरे सरकार के अंतिम अहम फैसले

उद्धव ठाकरे ने सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना की दाखिल याचिका पर सुनवाई खत्म होने के पहले ही अपने मंत्रिमण्डल की बुलाई आखरी बैठक में औरंगाबाद का नाम बदल कर संभाजी नगर, उस्मानाबाद का धाराशिवनगर और नवी मुंबई एयरपोर्ट का नाम देश के पूर्व रक्षा मंत्री शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानि एनसीपी के दिवंगत नेता के नाम पर डीबी पाटील इंटरनेशनल एयरपोर्ट करने का प्रस्ताव पारित करवा लिया। उद्धव ठाकरे ने इसके बाद फेसबुक लाइव सम्बोधन में बातें भी कहीं जिसका सार था कि दूसरों ने नहीं बल्कि शिवसेना के ही कुछ मंत्रियों और विधायकों ने उनकी पीठ में छुरा घोंपा है।

इससे पहले उद्धव ठाकरे ने 28 जून को गुवाहाटी में एक पाँच सितारा होटल ब्ल्यू रेडिसन में कुछ दिनों से आराम फरमा रहे शिवसेना के बागी एकनाथ शिंदे गुट के करीब 40 विधायकों के प्रति भावनात्मक अपील कर पार्टी में साथ रहने के लिए मुंबई लौट आने की अपील की थी।

भाजपा के खुले एक्शन

इस अपील की प्रतिक्रिया में पिछले आठ बरस से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा खुल कर एक्शन में आ गई। पूर्व मुख्यमंत्री और विधानसभा में अभी विपक्ष और भाजपा के नेता देवेन्द्र फडणवीस तुरंत नई दिल्ली गए। वह वहाँ प्रधानमंत्री से मिले। फिर उन्होंने केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ बैठक में उद्धव ठाकरे सरकार का तख्ता पलटने की नई रणनीति तय कर उसी रात मुंबई में अपने सागर बंगले पर लौट आए जहां उनकी कोर टीम इंतजार में बैठी थी। भाजपा खेमा के वकील और   वाजपेई सरकार में विधि एवं न्याय मंत्री रहे दिवंगत राम जेठमलानी के पुत्र महेश जेठमलानी, फडणवीस के साथ दिल्ली से मुंबई आए। दो बार मुख्यमंत्री रहे फडणवीस ने अपने सरकारी बंगले से महाराष्ट्र राजभवन पहुंच लंबे अरसे से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानि आरएसएस से जुड़े हुए और उत्तराखंड में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को एक पत्र सौंप कर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को विधानसभा में अपनी सरकार के प्रति विश्वासमत प्रस्ताव पेश करने का निर्देश देने की मांग की। कोरोना कोविड संक्रमण के कारण अस्पताल में भर्ती रहे राज्यपाल कोश्यारी उसी दिन राजभवन लौटे थे। राज्यपाल को 8 निर्दलीय विधायकों के भेजे ईमेल में भी यही मांग की गई। राज्यपाल कोश्यारी ने यही किया भी। लेकिन इस कवायद में भाजपा के इस दावे के झूठ की कलाई खुल गई कि शिवसेना विधायकों के विद्रोह और उद्धव सरकार को गिराने की कोशिशों में उसका कोई हाथ नहीं है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना, कांग्रेस, पूर्व रक्षा मंत्री शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और अन्य की गठबंधन सरकार को गिराने की कोशिशों में भाजपाबुरी तरह फंस चुकी थी। इससे उबरने भाजपा को सुप्रीम कोर्टऔर राज्यपाल कोश्यारी के आदेशों का ही सहारा बचा था। अस्पताल से डिस्चार्ज होते ही राज्यपाल भी एक्शन में आ गए। उन्होंने ठाकरे सरकार से राजकाज के पिछले तीन दिन की फाइलों का हिसाब मांगा।

शिंदे गुट

इस बीच, शिवसेना विद्रोही नेताएकनाथ शिंदे के गुट की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने उसके विधायकों की सदन की सदस्यता खत्म करने की विधान सभा उपाध्यक्ष नरहरि जिरवाल की नोटिस पर आगे की सुनवाई होने तक कोई कारवाई पर 12 जुलाई तक रोक लगा दी थी। एकनाथ शिंदे के साथ के विधायक भाजपा शासित असम की राजधानी गुवाहाटी के एक भव्य होटल में पिछले कई दिनों से ठहरे हुए थे। वे मुंबई नहीं आ रहे थे। उन्हें डर लगता था कि वे मुंबई आने पर सुरक्षित नहीं रह सकेंगे। इन बागी विधायकों के मुंबई लौटे बगैर उद्धव सरकार के भविष्य का कोई ठोस फैसला नहीं हो सकता था। शिंदे जी ने उनकी संख्या शिवसेना के कुल विधायकों की करीब दो-तिहाई होने का दावा कर रखा है। सुप्रीम कोर्ट के कर्नाटक के एसआर बोम्मई सरकार के 1988 मामले में दिए निर्णय के अनुसार देश में किसी भी सरकार के पास विधायकों का बहुमत समर्थन होने या फिर नहीं होने का निर्णय विधानसभा में ही हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार मामले में भी यही निर्णय बरकरार रखा था। इस निर्णय में राज्यपालों को हिदायत दी गयी है कि किसी भी राज्य सरकार को बहुमत है या फिर नहीं है इसका निर्णय राजभवन में नहीं विधानसभा में होना चाहिए’ शिंदे जी गुवाहाटी में आराम से होटल में बैठ राज्यपाल कोश्यारी को पत्र भेज कर ठाकरे सरकार को नहीं गिरा सकते थे। बागी गुट को भाजपा की शह पर यह सरकार गिराने राज्य विधान सभा में अविश्वास प्रस्ताव पारित कराना जरूरी था। अविश्वास प्रस्ताव पेश करने के लिए उन्हें पहले इसकी नोटिस देनी थी जिस पर वोटिंग कराने की स्थिति में सदन के सभी विधायकों को अपना गुप्त वोट देना था। ठाकरे सरकार के पास सदन में अपनी पहल पर विश्वास मत प्रस्ताव पेश करने का विकल्प खुला था। विश्वास मत प्रस्ताव पर वोट देने विधायकों की सदन में शारीरिक उपस्थिति जरूरी है। शिंदे गुट के विधायक मुंबई नहीं लौटते तो विश्वास मत प्रस्ताव के विरोध में भाजपा के ही विधायक वोट दे सकते थे जिनकी संख्या अधिकतम 113 है। महाविकास अघाड़ी में उद्धव ठाकरे के बचे विधायकों में शिवसेना के आमदारों यानि विधायकों के अलावा एनसीपी के 53 , कांग्रेस के 44, बहुजन विकास आघाडी यानि बीवीए के तीन, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव की समाजवादी पार्टी यानि सपा और पीजेपी के 2-2, शेतकरी कामगार पक्ष यानि पीडब्ल्यूपीआई के एक और 8 निर्दलीय हैं। ऐसे में ठाकरे सरकार का बागी विधायकों की अनुपस्थिति में सदन में विश्वास मत हासिल कर लेने में कुछ ही शंका थी। भाजपा ने विगत में जिस तरह उत्तराखंड, गोवा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस की निर्वाचित सरकारों को विधायकों की तोड़ फोड़ से गिराकर अपनी सरकार बना ली थी वह खेल महाराष्ट्र में सफल होना लगभग असंभव था।  

इस बीच शिवसैनिकों ने पूरे महाराष्ट्र में बागी विधायकों के दफ्तरों पर तोड़फोड़ की। कार्यकर्ताओं ने उस्मानाबाद के विधायक बालाजी कल्याणकर के घर पर हमला करने की कोशिश की। शिवसेना के छह कार्यकर्ताओं को शिंदे जी के बेटे और कल्याण से लोकसभा सदस्य श्रीकांत शिंदे के उल्हासनगर कार्यालय पर पथराव करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इन सबसे गुवाहाटी में बागी विधायकों का डर और बढ़ा दिया। बागी विधायकों के महाराष्ट्र लौटने पर उन्हें राज्य पुलिस की सुरक्षा प्रदान करने के आश्वासन के बावजूद उनमें मुंबई वापस आने का साहस नहीं था। बागी विधायकों ने गुवाहाटी के होटल के प्रबंधन से वहां अपने ठहरने की अवधि बढ़ाने के लिए कहा था। असम सरकार में भाजपा के आवास और शहरी मामलों के मंत्री अशोक सिंघल औरसंसदीय कार्य मंत्री पीयूष हजारिका ने बागी विधायकों से भेंट की। सिलचर से बाढ़ का जायजा लेकर लौटे असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर 37 के गुवाहाटी के उस गोतानगर इलाके में कुछ देर रुके जहां पर यह होटलहै।

ऐसे में मोदी सरकार ने शिवसेना के 15 बाग़ी विधायकों को वाय प्लस श्रेणी की सुरक्षा प्रदान कर दी। इनमें रमेश बोर्नारे, मंगेश कुदलकर, संजय शिरसत, लताबाई सोनवणे और प्रकाश सुर्वे शामिल हैं। इन विधायकों को केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के जवानों का सुरक्षा घेरा प्रदान किया गया। केंद्र सरकार द्वारा महाराष्ट्र में भी इन सभी बागी विधायकों को सुरक्षा प्रदान करने के उपाय किये गए।   

आदित्य ठाकरे

उद्धव ठाकरे के पुत्र और उनकी सरकार में पर्यावरण एवं वन मंत्री आदित्य ठाकरे ने कहा था कि बागी विधायकों को पार्टी में वापस नहीं लिया जाएगा।  उन्होंने बागी विधायकों को फिर से चुनाव लड़ने की चुनौती दी थी। उनका भाजपा का नाम लिए बगैर कहना था कि उन्हें शर्म आती है कि जो पार्टी केंद्र और असम में सत्ता में है उसने महाराष्ट्र के सत्तारूढ़ दल के विधायकों को ले जाकर पूर्वोत्तर के एक ऐसे राज्य में रखा है जो बाढ़ की चपेट में है। उनके मुताबिक बागी विधायकों को कैदियों की तरह गुवाहाटी ले जाया गया। उन्होंने जोर देकर कहा यह सच और झूठ की लड़ाई है, सच हमारे साथ है और हम जीतेंगे। इस बीच, शिवसेना की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने बागियों के खिलाफ किसी भी कार्रवाई के लिए उद्धव ठाकरे को अधिकृत कर दिया।

शिवसेना मुखपत्र सामना के कार्यकारी संपादक और राज्यसभा के हाल में महाराष्ट्र से ही फिर निर्वाचित हुए सदस्य संजय राउत ने कहा हमने सबक सीख लिया है कि किस पर भरोसा किया जाना चाहिए। “ वे (बागी विधायक) ऐसे शरीर हैं, जिनकी आत्मा मर चुकी है। उनके शब्द हैं “। संजय राउत ने बागी विधायकों को विधानसभा की सदस्यता छोड़ नए सिरे से चुनाव लड़ने की चुनौती दी है। लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि जो वापस आना चाहते हैं, उनके लिए पार्टी के द्वार खुले हैं। राऊत जी के मुताबिक अतीत में शिव सेना छोड़ने वाले छगन भुजबल, नारायण राणे और उनके समर्थकों ने अन्य दलों में शामिल होने के लिए शिवसेना विधायक के रूप में इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने अपने एक ट्वीट में लिखा: “ कब तक वे (विधायक) असम के गुवाहाटी में छिपे रहेंगे, आखिरकार उन्हें चौपाटी आना ही होगा। ”

गौरतलब है कि महाराष्ट्र विधान मण्डल परिसर, मुख्यमंत्री का आधिकारिक बंगला वर्षा, राज्य सरकार का मंत्रालय , सचिवालय, अधिकतर विधायकों के सरकारी आवास दक्षिण मुंबई में अरब सागर तटवर्ती के उस क्षेत्र में ही स्थित हैं, जिसे स्थानीय लोग चौपाटी कहते हैं। इस बीच महाराष्ट्र पुलिस ने राज्य के सभी हवाई अड्डों के आसपास सुरक्षा बालों को अलर्ट कर दिया है।

शिवसेना के चीफ ह्विप (मुख्य सचेतक) सुनील प्रभु की अर्जी पर विधानसभा के प्रधान सचिव राजेंद्र भागवत द्वारा हस्ताक्षरित शनिवार को जारी नोटिस में लिखित जवाब मांगा गया है। अर्जी के मुताबिक गुवाहाटी में डेरा डाले इन सभी नामित 16 विधायकों को मुंबई में बुधवार को पार्टी की बैठक में शामिल होने के लिए ह्विप जारी किया गया था। पर उनमें से कोई भी बैठक में नहीं आए। शिवसेना ने विधानसभा सचिवालय को सौंपे पत्रों में शिंदे समेत इन सभी 16 विधायकों को सदन की सदस्यता से अयोग्य घोषित करने की याचना की गई है। नोटिस में लिखा है कि सुनील प्रभु ने विधानसभा उपाध्यक्ष को सौंपे पत्र में महाराष्ट्र विधानसभा सदस्य (दलबदल  अयोग्यता) नियमावली, 1986 के तहत उनकी अयोग्यता की मांग की है। विधान सभा अध्यक्ष पद अभी रिक्त है।

अदालती कदम

बागी गुट के प्रवक्ता दीपक केसरकर के मुताबिक उनके पास दो तिहाई बहुमत है। उन्होंने कहा शिवसेना प्रमुख और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से उनके मतभेद का मुख्य कारण पार्टी का 2019 में भाजपा के साथ गठबंधन समाप्त कर एनसीपी और कांग्रेस से हाथ मिलाने का निर्णय है। उन्होंने गुवाहाटी से एक ऑनलाइन प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि इन विधायकों ने शिवसेना नहीं छोड़ी है पर अपने समूह का नाम शिवसेना (बालासाहेब) रखा है। उन्होंने यह भी कहा कि यह गुट महाराष्ट्र विधानसभा उपाध्यक्ष के आदेश को अदालत में चुनौती देगा। यह पूछे जाने पर कि क्या शिंदे गुट उद्धव ठाकरे सरकार से समर्थन वापस लेगा, उन्होंने कहा, ‘हमें समर्थन क्यों वापस लेना चाहिए? हम शिवसेना हैं। हमने पार्टी को हाईजैक नहीं किया है, एनसीपी और कांग्रेस ने इसे हाईजैक कर लिया है। हम शिवसेना नहीं तोड़ रहे हैं। हम तो उनसे (उद्धव से) भाजपा से हाथ मिलाने के लिए कह रहे हैं।’

मोदी सरकार में रेलवे, कोयला एवं खान राज्य मंत्री रावसाहेब दानवे ने राज्य सरकार में एनसीपी के मंत्री राजेश टोपे की उपस्थिति में जालना में कृषि विभाग भवन के उद्घाटन समारोह में दावा किया था कि ठाकरे शिवसेना विधायकों की बगावत से भाजपा का कोई लेना-देना नहीं है। उनके मुताबिक शिवसेना के बागियों की मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से नाराजगी है। शिंदे गुट के भाजपा में विलय की संभावना के बारे में पूछने पर  उन्होंने कहा ऐसा प्रस्ताव नहीं है और अगर कोई प्रस्ताव मिलेगा तो भाजपा नेतृत्व फैसला करेगा। उन्होंने यह भी कहा था कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की कोई संभावना नहीं है।

शरद पवार ने एमवीए के घटक दलों के नेताओं के साथ बैठक की। उन्होंने एनसीपी नेताओं के साथ ही कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण और वरीय नेता बालासाहेब थोराट और शिवसेना के अनिल परब और अनिल देसाई से चर्चा करने के बाद कहा था कि सभी मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के साथ हैं।

चुनावी इतिहास

देश में लोकसभा की सर्वाधिक 80 सीटें उत्तर प्रदेश में और उसके बाद सबसे ज्यादा 48 महाराष्ट्र में ही हैं। लोकसभा के 2019 के पिछले चुनाव में महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा की भगवा युति कायम थी जिसने कुछेक अन्य दलों को साथ रख 48 में से 40 सीटें जीती थी। इनमें से 18 शिवसेना ने जीती जो उसकी सर्वश्रेष्ठ चुनावी सफलता है। इससे पहले उसने सबसे अधिक 15 सीटें 1996 के आम चुनाव में जीती थी। जब 2019 में ही विधानसभा चुनाव हुए तो युति टूट गई। शिवसेना ने उस चुनाव में भाजपा से विधानसभा की 288 सीटों में से बराबर का बँटवारा करने की मांग की थी जो नहीं मानी गयी। दोनों अलग -अलग चुनाव लड़े। भाजपा 122 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। शिवसेना ने 63 सीटें जीती थी और उसने नई सरकार बनाने के लिए भाजपा को अपना समर्थन दे दिया।  राज्य में देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्रित्व में भाजपा की बनी पहली सरकार में शिवसेना भी शामिल हो गई। अंतर्विरोध के बावजूद शिवसेना केंद्र की मोदी सरकार और महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार में बहुत दिनों तक बनी रही । लोकसभा चुनाव में इस युति में किसान नेता राजू शेट्टी का स्वाभिमानी पक्ष भी शामिल था जिसकी तरफ से एक सीट खुद शेट्टी ने हातकणंगले से जीती थी। बाद में स्वाभिमानी पक्ष ने मोदी सरकार पर किसान -विरोधी नीतियों पर चलने का आरोप लगा कर भाजपा का साथ छोड़ दिया।

गुजराती लंपट पूंजी और देशी मराठी पूंजी की लड़ाई

महाराष्ट्र की सियासत में मची घमासान लड़ाई गुजराती लंपट पूंजी और देशी ( मराठी ) पूंजी के बीच 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने पर पिछले आठ बरस से रस्साकसी का चरम माना जा सकता है। आर्थिक-वित्तीय मामलों के विशेषज्ञ और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट मुकेश असीम के अनुसार राज्य में हालिया सियासी टकराव को समझने के लिए संक्षिप्त ऐतिहासिक संदर्भ जरुरी है। मुंबई 19वीं सदी से ही पहले औद्योगिक और फिर वित्तीय पूंजी का बड़ा केंद्र रहा है, भारतीय राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा आधार ही मुंबई की गुजराती व कलकत्ता की मारवाड़ी पूंजी का गठबंधन था जिसमें मद्रास और लाहौर की छोटी भूमिका थी।

कानपुर के मारवाड़ियों को कलकत्ता का हिस्सा माना गया। इस राष्ट्रवाद का वैचारिक आधार पुरातन हिंदू गौरव था। मुंबई में प्रभुत्वशाली गुजराती पूंजी का द्वंद्व मराठी पूंजी से था जो छोटी थी और जिसका विकास मुख्यतः कृषि, सहकारिता, चीनी मिलों और अन्य छोटे उद्योग-व्यापार में ही हुआ था। मुंबई प्रांत का पहली मई 1960 को पुनर्गठन होने पर उसे महाराष्ट्र और गुजरात के दो अलग राज्यों में बाँट दिए जाने के बाद गुजराती पूंजी के विरोध के बावजूद मराठी पूंजी के स्वतंत्र’ विकास के लिए मुंबई को महाराष्ट्र में बनाए रखने के लिए सशक्त जनआंदोलन हुआ। अंततः मुंबई को महाराष्ट्र में ही रखा गया। मराठी मानूस का नारा देने वाली शिवसेना के गुजराती विरोध का यही कारण है। जब तक बड़ी पूंजी की विश्वस्त पार्टी कांग्रेस थी और भाजपा विपक्ष में थी हिंदुत्व के आधार पर दोनों साथ चलते रहे। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान भारत के पूंजीपति वर्ग में वर्चस्व कायम कर चुकी गुजराती पूंजी द्वारा हिंदी हिंदुत्व हिंदुस्तान के राष्ट्रवाद के नारे पर अपना दांव चलने के साथ ही शिवसेना के लिए दिक्कत खड़ी हो गई और भाजपा के साथ उसका अंतर्विरोध शुरू हो गया।

महाराष्ट्र मेंदेवेंद्र फड़णवीस के नेतृत्व में भाजपा की पहली सरकार बनते ही उसने गुजराती पूंजी के प्रभुत्व को बढ़ाने कई फैसले लिए और सत्ता के बल पर मराठी पूंजी के आधार सहकारी बैंकों और चीनी मिलों के प्रबंधन पर कब्जे का अभियान आरंभ किया। फड़णवीस, मुख्यमंत्री पद पर पहले कार्यकाल मे 31 अक्टूबर 2014 से 12 नवंबर 2019 तक और दूसरे में 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद जोड़-तोड़ से मुख्यमंत्री बन जाने के बावजूद सदन में बहुमत के अभाव में तीन दिन ही इस गद्दी पर टिक सके थे। लेकिन फडणवीस राज में राजनीति में प्रभुत्वशाली मराठी परिवारों को भाजपा में शामिल होने के लिए मजबूर होना पड़ा। इससे शिवसेना-एनसीपी के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया। अंततः मराठी आधार वाले दलों को भाजपा के खिलाफ मोर्चा बनाना पड़ा। इस द्वंद्व की कटुता इतनी अधिक है कि भाजपा ने केन्द्रीय सत्ता बल से महाराष्ट्र सरकार के हर फैसले को अटकाने की कोशिश की है।

सवाल मुंबई की बड़ी पूंजी और अकूत संपत्ति से मुनाफा कमाने का है। इस कटुता को पूंजीवाद के आम दस्तूर के मुताबिक बंद दरवाजों के पीछे जनता से छिपाकर हल करना मुमकिन नहीं था। राजसत्ता के हर वैधानिक अंग के साथ अवैधानिक अंग भी मैदान में उतर आये। वैसे भी पूंजीवादी व्यवस्था में पुलिस और अपराधी गिरोहों के बीच खास फर्क नहीं होता है। पूंजीपति वर्ग के लिए दमन का जो काम क़ानूनी दायरे’ में पुलिस करती है, वहीं उस दायरे में काम न चले या सत्ता के असली चरित्र पर पर्दा डालने की जरुरत हो तो वह काम अपराधी गिरोह करते हैं। अभी फासीवादी दौर है, जनतंत्र का दिखावटी पर्दा उतार फेंका जा रहा है। तो न तो राजसत्ता और न ही कॉर्पोरेट पूंजी के बीच अलगाव दिखाने वाले परदे की ज्यादा जरुरत बची है, न ही पुलिस और अपराधी गिरोहों के बीच अलगाव’ दिखाने वाले पर्दों की जरूरत रह गई है। अब तो कॉर्पोरेट, सरकार, न्यायपालिका, पुलिस, माफिया, अफसरशाही, चुनाव आयोग सब खुलेआम एक दूसरे का सहयोग’ कर रहे हैं। बेशक फासीवादियों को कुछ दिक्कत हो रही है, उनके कई आपराधिक कारनामे जाहिर हो रहे हैं, विरोधी उनकी कुछ नीतियों पर वाल उठा रहे हैं। पर यह लड़ाई पूंजी के विभिन्न गुटों के बीच स्वार्थ के टकराव की ही।

यह समझना ठीक नहीं कि ये आपस में किसी सहमति पर नहीं पहुंचेंगे, जनहित के खिलाफ आपस में मिल जाना पूंजीपतियों का मूल चरित्र है। भारत की जनता के खिलाफ भारतीय पूंजीपति कितनी ही बार अंग्रेज साम्राज्यवादियों से मिल गए। जर्मन नाजियों के साथ सहयोग करने वाले बहुत से यहूदी पूंजीपतियों के उदाहरण हैं। महाराष्ट्र के कई प्रभुत्वशाली नेता कह रहे हैं कि भाजपा के साथ रहकर चैन की नींद सोई जा सकती है। मेहनतकश उत्पीड़ित जनता को अपने हितों के लिए लड़ना है तो अपनी ही ताकत खड़ी करनी होगी।

अब क्या होगा

बहरहाल, महाराष्ट्र की नई सरकार कब तक टिकेगी इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में है। बहरहाल, राज्य विधानसभा के नए चुनाव 2024 में निर्धारित है। लगभग तय है कि विधान सभा चुनाव लोक सभा के अगले चुनाव के साथ ही 2024 में होंगे।

(सीपी नाम से चर्चित पत्रकार,यूनाईटेड न्यूज ऑफ इंडिया के मुम्बई ब्यूरो के विशेष संवाददाता पद से दिसंबर 2017 में रिटायर होने के बाद बिहार के अपने गांव में खेतीबाड़ी करने और स्कूल चलाने के अलावा स्वतंत्र पत्रकारिता और पुस्तक लेखन करते हैं। इन दिनों वह भारत के विभिन्न राज्यों की यात्रा कर रहे हैं।)

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