सिद्धार्थ ने पलायन नहीं किया था: पलायन दुख से दूर भागने के लिए होता है, सुख से दूर जाने के लिए नहीं

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राज ज्योतिषी ने जिस राजा के इकलौते बेटे के संन्यासी बन जाने की भविष्यवाणी कर दी हो उसकी चिंताएं समझी जा सकती हैं। सत्ता के हाथ से खिसक जाने का भय, बेटे के निर्मोही हो जाने की आशंका, कितनी वेदना थी वृद्ध पिता के लिए इन बातों में। सत्ता विरासत में सिर्फ अपने ही पुत्र को मिले, यह एक आदिम कामना रही है हर सम्राट की। और कितनी मन्नतों के बाद सिद्धार्थ का जन्म हुआ था। सिंहासन का अकेला वारिस राजसत्ता के साथ मिलने वाली अपार ताकत और सुख से मुंह मोड़ ले, तो कौन सा पिता होगा जो अवसाद में नहीं डूब जाएगा। और कितनी विचित्र बात भी तो होगी यह। क्या कहेंगे अड़ोस-पड़ोस के शाही खानदान।

पर शुद्धोधन के पुत्र सिद्धार्थ ने गृहत्याग की ठान ली थी। समूचे घटनाक्रम के बारे में कुछ कहना तो अटकलबाजी ही होगी क्योंकि 2600 बरस पुराने कई तथ्य कहानी-किस्सों की रूमानियत और अटकलों की धुंध के पीछे छिप गए हैं। कइयों का महानायक, सत्यान्वेषी युवक न जाने कितनों की नज़र में एक कायर पलायनवादी, एक क्रूर जीवनसाथी, गैर ज़िम्मेदार पिता भी है। एक अवज्ञाकारी, बागी और असंवेदनशील पुत्र भी।

प्रश्न यह है कि राजकुमार सिद्धार्थ ने अपने घर-परिवार के साथ क्या खुद को भी तज नहीं दिया था? सिर्फ दुख के कारण का पता करने और उनका अंत करने के लिए? यह दुख उनका व्यक्तिगत दुख भी तो नहीं था। जन्म, जरा, व्याधि, मृत्यु सब के हिस्से में आते हैं। आगे चल कर दुख के बारे में उनकी अन्तर्दृष्टियां समूची मानवता पर लागू हुईं। राजकुमार दुख के अंत के लिए निकला था; ‘अपने दुख’ के अंत के लिए नहीं। दुःख-ध्वंस के प्रयास में लगा कोई इंसान क्या पलायनवादी होता है?

लोग अक्सर कहते हैं, वह अपनी संगिनी यशोधरा को भी तो ले जा सकते थे? बेटे राहुल की फिक्र नहीं की? अपरिचित, अज्ञात की खोज में कहां कोई किसी का साथी होता है? सिद्धार्थ किसी आनंद यात्रा पर तो निकले नहीं थे। जो कुछ भी त्यागा, उसे किसी और के लिए, किसी तथाकथित बेहतर ज़िंदगी के लिए, किसी अन्य स्त्री के लिए नहीं त्यागा। वह असन्तुष्ट थे। जिस जीवन में थे, वह उन्हें असह्य था। जैसे हैमलेट के लिए डेनमार्क एक जेल में तब्दील हो गया था, वैसे ही सिद्धार्थ के लिए आराम और ऐय्याशी का जीवन विष-सा बन चुका था।

एक अबूझ असंतोष की आग ने राजकुमार के मन को लील लिया था। वह कहां जा रहे थे, इसकी उन्हें खुद ही खबर नहीं थी। संबोधि के बारे में कोई पूर्वनिर्मित धारणा को लेकर वह नहीं निकले थे। जन्म से उन्हें जो धार्मिक, सामाजिक तौर-तरीके मिले थे, उनके लिए कचरा साबित हो चुके थे। ऐसी अनिश्चितता के साथ रहने वाला कोई किसी को अपने साथ कैसे ले जाता। क्या यह संभव नहीं यशोधरा और राहुल की फिक्र के कारण वह अकेले निकले हों?

यह सोच कर कि कम से कम वे दोनों तो महल में सुरक्षित रहेंगे। बीहड़ जंगलों में उनकी सुरक्षा को वह खतरे में भला क्यों डालना चाहते। उनका तो कोई ठौर-ठिकाना ही नहीं था। खुले में सोते थे, एक के बाद दूसरे शिक्षक के पास जाते, असंतोष और प्यास से भरे फिर आगे बढ़ जाते, बार-बार अन्न-जल का त्याग करते, कांटों भरे पथो पर नंगे पांव चल पड़ते थे। ऐसी यात्रा में वह किसे साथ ले जाते? और क्यों? यह प्रयोग तो उनका अपना था। उनका स्वयं का अस्तित्व उनके सामने विराट, सुलगते हुए प्रश्न लिए खड़ा था। उत्तर तो उनको ही ढूंढना था।

राजकुमार ने तो खुद के खिलाफ ही बगावत कर डाली थी। जिस जमीन पर खड़े थे, उसे ध्वस्त कर डाला था। इस तरह के प्रयोग में अपनी पत्नी और बच्चे को शामिल करना भी क्रूरता होती। उन्हें घर पर छोड़ कर जाने में कठोरता थी या नहीं, यह तो विवादास्पद है। पर जिस जीवन की ओर वह चल निकले थे, उसमें अपनी संगिनी और शिशु को ले जाना तो जरूर क्रूरता होती।

एक संवेदनशील युवक अपनी पत्नी और छोटे बच्चे को ऐसी यात्रा पर कैसे ले जाता? यह भूलना भी नहीं चाहिए कि संबोधि के बाद वह घर भी लौटे थे। राहुल बाद में एक भिक्खु भी बन गया था। बुद्ध के जीवनकाल में 52 वर्ष की उम्र में राहुल की मृत्यु भी हो गई थी। पर इससे पहले जीवन की मांग थी कि सिद्धार्थ सिर्फ और सिर्फ अपने निर्मम निपट अकेलेपन के साथ रहें।

सम्राट पिता ने 28 साल की उम्र तक सिद्धार्थ को एक मूर्ख राजकुमार की तरह पाले रखा, जिसे जीवन के बुनियादी तथ्यों के बारे में भी नहीं मालूम था। यही राजनीति की मांग थी, यही सत्ता की निरंतरता की नीति थी। लोग बीमार और बूढ़े होते हैं, आखिरकार मर जाते हैं, यह सत्य भी सिद्धार्थ से छिपाया गया था। सिर्फ सुख के अंधेरे में, महल के नर्म-गुनगुने पालने में वह झूल रहा था।

उसके चारों ओर बस कभी न मुरझाने वाला, खिला हुआ सौंदर्य था। और एक झटके में इस झीने कृत्रिम झूठ के पीछे छिपाई गई सच की दीवार सामने आ गई। अब जो दिख चुका था, उसे अनदेखा कैसे किया जाता। वह भी ऐसे युवक द्वारा जिसे आगे चलकर मानव जीवन की सबसे जटिल गुत्थियां हल करनी थीं। बाहर की दुनिया और उसकी सच्चाइयों ने सिद्धार्थ के लिए सदमे का काम किया होगा। उसे भीतर तक झकझोर दिया होगा।

जिसने खुद की परवाह नहीं की, वह फिर किस चीज़ की परवाह करता। आत्मविस्मृत अवस्था में किसी की कोई कैसे परवाह कर सकता है। बाहर से कठोर, असंवेदनशील दिखने वाला पर भीतर से सर्वोच्च समानुभूति और कोमलता का क्षण होगा यह। राजकुमार के लिए, और अनंत काल से दुख के सागर में डूबती उतरती मानवता के लिए भी।

सिद्धार्थ ने पलायन नहीं किया था। पलायन दुख से दूर भागने के लिए होता हैं। सुख से दूर जाने के लिए, दुख की आंखों में झांकने के लिए नहीं, उसके विष-बुझे तीरों के सामने अपना सीना उघाड़ देने के लिए नहीं। अभी भी तो धरा ढूंढ रही है आंसुओं का स्रोत। अभी भी पृथ्वी न्योत रही है रोज़ किसी बुद्ध को। क्योंकि आज भी रोज दहाड़ें मार कर विलाप कर रहा है दुख। धरा के इस छोर से उस छोर तक।

(चैतन्य नागर लेखक, अनुवादक और पत्रकार हैं।)

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