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विपक्षी दलों की बैठक में सोनिया ने जमकर बोला सरकार पर हमला, कहा- लॉकडाउन को लेकर सरकार के पास कोई योजना नहीं

नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आज केंद्र सरकार पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि सरकार ने अब लोकतांत्रिक होने के दिखावे को भी ख़त्म कर दिया है। सत्ता पीएमओ में केंद्रित हो गयी है और संघवाद की पूरी भावना को ही भुला दिया गया है। वह विपक्षी दलों के साथ वर्चुअल मीटिंग को संबोधित कर रही थीं। यह बात उन्होंने इस बैठक के उद्घाटन भाषण में कही।

22 राजनीतिक दलों के नेताओं के प्रतिनिधियों को वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिये संबोधित करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने पीएम मोदी के 12 मई के 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज को देश के साथ क्रूर मज़ाक़ करार दिया।

सोनिया गांधी ने लॉकडाउन घोषित करने से पहले लोगों को सिर्फ़ चार घंटे का समय देने के मामले में भी मोदी पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि “जल्दबाज़ी और निश्चित तौर पर सरकार की अपर्याप्त तैयारी के बावजूद हम लोगों ने इसका समर्थन किया।”

राष्ट्रीय स्तर पर लॉकडाउन होने के बाद विपक्षी दलों की यह पहली बैठक थी। बैठक में जनता दल सेकुलर के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और उनके सहयोगी संजय राउत, एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार और उनकी पार्टी के नेता प्रफुल पटेल, टीएमसी मुखिया और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके सहयोगी डेरेक ओ ब्रायन, डीएमके चीफ़ एमके स्टालिन, सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी, सीपीआई महासचिव डी राजा, झारखंड मुक्ति मोर्चा चीफ़ और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन शामिल थे।

इसके अलावा लोकतांत्रिक जनता दल के शरद यादव, आरजेडी के तेजस्वी यादव, आईयूएमएल के पीके कुन्हाली कुट्टी, नेशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला, आईयूडीएफ के बदरुद्दीन अजमल, आऱएलडी के जयंत चौधरी, आरएलएसपी चीफ़ उपेंद्र कुशवाहा, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के जीतन राम माँझी,  आरएसपी के एनके प्रेम चंद्रन, केरला कांग्रेस के जोस के मणि, स्वाभिमान पक्ष के राजू शेट्टी ने भी हिस्सा लिया।

कांग्रेस की तरफ़ से सोनिया गांधी के अलावा राहुल गांधी, एके एंटनी, गुलाम नबी आज़ाद, अधीर रंजन चौधरी, मल्लिकार्जुन खड़गे और अहमद पटेल शामिल हुए।

दिलचस्प बात यह रही कि इस बैठक में बीएसपी, एसपी और आप का कोई प्रतिनिधि नहीं शामिल हुआ।

अपने शुरुआती भाषण में श्रीमती गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री ने 21 दिनों के भीतर कोरोना वायरस के देश से ख़त्म हो जाने की आशा जतायी थी लेकिन वह सही नहीं निकला।

उन्होंने दावा किया कि “ऐसा लगता है कि वायरस यहाँ अब वैक्सीन के खोजे जाने तक बना रहेगा। मेरा यह भी मानना है कि सरकार लॉकडाउन के तरीक़े को लेकर भी अस्पष्ट थी। और उसके पास इससे बाहर निकलने की भी कोई रणनीति नहीं है। एक के बाद दूसरे लॉकडाउन का कोई नतीजा नहीं निकला।”

उन्होंने कहा कि इस लॉकडाउन की सबसे त्रासदपूर्ण कहानी प्रवासी मज़दूरों पर बरपा क़हर है। जो उनके हज़ारों हज़ार किमी पैदल चलने। बगैर पैसे के भूखे रहने और कई जगहों पर आत्महत्या तक मजबूर होने जैसी घटनाओं के रूप में सामने आया है। सड़क पर बच्चों और महिलाओं की पीड़ा को पूरा देश देख रहा है।

उन्होंने कहा कि प्रवासी मज़दूरों की बेइंतहा परेशानियों के अलावा जिस एक और तबके को सबसे ज़्यादा दुख सहना पड़ा है वह समाज के सबसे निचले पायदान पर रहने वाला 13 करोड़ परिवार है। जिसमें भूमिहीन खेत मज़दूर, बटाई पर खेती करने वाले किसान, फ़ैक्टरियों से निकाले गए मज़दूर, छोटे दुकानदार, 6.3 करोड़ में 5.8 करोड़ एमएसएमई शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि भारत उसी समय आर्थिक संकट का सामना कर रहा था जब कोरोना वायरस का पहला मामला सामने आया था। अर्थव्यवस्था पहले ही नोटबंदी और जीएसटी की भेंट चढ़ चुकी थी। लगातार सात तिमाहियों में जीडीपी की गिरावट कोई सामान्य घटना नहीं थी। यह अभूतपूर्व था। बावजूद इसके सरकार ने अपनी दिशाहीन नीतियों और अक्षम शासन को जारी रखा।

और जिस अर्थव्यवस्था को सबसे ज़्यादा सहयोग और समर्थन की ज़रूरत थी उसके नाम पर 12 मई को प्रधानमंत्री द्वारा 20 लाख करोड़ के पैकेज की की गयी घोषणा किसी क्रूर मज़ाक़ से कम नहीं था।

सोनिया गांधी ने कहा कि विपक्षी दलों ने सरकार से ग़रीबों और दूसरे ज़रूरतमंदों के खातों में नगद पैसे ट्रांसफ़र करने की माँग की थी। इसके साथ ही प्रवासी मज़दूरों को घर जाने के लिए ट्रेन के साथ पर्याप्त संख्या में बसें मुहैया कराने की माँग की गयी थी। लेकिन सरकार इन सारी माँगों को पूरा करने की जगह ख़ानापूर्ति की और मज़दूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया।

उन्होंने कहा कि उनके सारे सुझावों को दरकिनार कर दिया गया। ऊपर से  सरकार श्रम क़ानूनों में तब्दीली कर और सार्वजनिक क्षेत्रों का निजीकरण का अभियान चलाकर देश के गौरवमयी संस्थानों को ख़त्म करने की तरफ़ बढ़ गयी है। इस पूरे मसले पर न तो संसद में और न ही किसी दूसरे फ़ोरम पर सरकार कोई बातचीत या बहस करना चाहती है। इस तरह की कोई ख़ानापूर्ति भी करना सरकार ने ज़रूरी नहीं समझा।

उन्होंने कहा कि न तो संसद के और न ही स्टैंडिंग कमेटियों की बैठक की नज़दीक समय में कोई उम्मीद दिख रही है। उन्होंने कहा कि सभी अर्थशास्त्री 20-21 में 5 फ़ीसदी तक नकारात्मक विकास दर के होने की आशंका जता रहे हैं। लेकिन सरकार को न तो इसकी कोई चिंता है और न ही वह उसको हल करने की दिशा में कोई कदम उठा रही है। ऊपर से ग़रीबों और कमजोर तबकों के प्रति उसका संवेदनहीन रवैया और ज़्यादा परेशान करने वाला है।

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This post was last modified on May 22, 2020 10:31 pm

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