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सुदर्शन टीवी के नफरती शो को डिब्बे में बंद करने का आदेश! ऊपर से सुप्रीम कोर्ट ने लगायी जमकर फटकार

भारत भर में खुल्लम खुल्ला सांप्रदायिकता का जहर बांटने वाले सुदर्शन टीवी को सुप्रीम कोर्ट से तगड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने मुस्लिम छात्रों के यूपीएसएसी में प्रवेश से जुड़े उसके शो पर रोक लगा दी है। इसके साथ ही आज उसने चैनल के संपादक को जमकर फटकार लगायी। कोर्ट ने कहा कि “यह कार्यक्रम बेहद कपटपूर्ण है। एक विशेष समुदाय के नागरिक जो एक ही परीक्षा से गुजरते हैं और एक ही पैनल को इंटरव्यू देते हैं। यह यूपीएससी परीक्षा पर भी सवाल उठाता है। हम इन मुद्दों से कैसे निपटते हैं? क्या इसे बर्दाश्त किया जा सकता है?” जस्टिस चंद्रचूड़ ने आश्‍चर्य प्रकट करते हुए कहा, “यह कैसे इतना कट्टर हो सकता है? ऐसे समुदाय को निशाना बनाना, जो सिविल सेवाओं में शामिल हो रहा है!”

कोर्ट ने कहा कि यह एक उन्माद पैदा करने वाला कार्यक्रम है। उसने यह भी कहा कि हम एक पांच सदस्यीय कमेटी के गठन करने के पक्ष में है, जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए कुछ निश्चित मानक तय कर सके। कोर्ट ने कहा कि देश के उच्चतम न्यायालय के रूप में हम आपको यह कहने की अनुमति नहीं दे सकते कि मुस्लिम नागरिक सेवाओं में घुसपैठ कर रहे हैं। मामले पर 17 सितंबर को सुनवाई होगी।

पीठ ने कहा कि ऐसा लगता है कि इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य मुस्लिम समुदाय को कलंकित करने का है। हम केबल टीवी एक्ट के तहत गठित प्रोग्राम कोड के पालन को सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हैं। एक स्थिर लोकतांत्रिक समाज की इमारत और अधिकारों और कर्तव्यों का सशर्त पालन समुदायों के सह-अस्तित्व पर आधारित है। किसी समुदाय को कलंकित करने के किसी भी प्रयास से निपटा जाना चाहिए। हमारी राय है कि हम पांच प्रतिष्ठित नागरिकों की एक समिति नियुक्त करें जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए कुछ मानकों के साथ आ सकते हैं। हम कोई राजनीतिक विभाजनकारी प्रकृति नहीं चाहते हैं और हमें ऐसे सदस्यों की आवश्यकता है जो प्रशंसनीय कद के हों। सुदर्शन टीवी के प्रोग्राम यूपीएससी जिहाद’ के खिलाफ याचिका दाखिल की गई है।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस इन्दु मल्होत्रा और जस्टिस के एम जोसफ की पीठ ने सुदर्शन टीवी के कार्यक्रम पर सवाल उठाते हुए मंगलवार 15 सितम्बर को कहा कि मीडिया में स्व नियंत्रण की व्यवस्था होनी चाहिए। इस टीवी कार्यक्रम के प्रोमो में दावा किया गया था कि सरकारी सेवा में मुस्लिम समुदाय के सदस्यों की घुसपैठ की साजिश का पर्दाफाश किया जा रहा है। पीठ ने इस कार्यक्रम के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि कुछ मीडिया हाउस के कार्यक्रमों में आयोजित होने वाली बहस चिंता का विषय है क्योंकि इसमें हर तरह की मानहानि कारक बातें कहीं जा रही हैं।

पीठ ने कहा यह उन्माद पैदा करने वाला कार्यक्रम है जिसमें कहा गया है कि एक समुदाय प्रशासनिक सेवाओं में प्रवेश कर रहा है। पीठ ने कहा कि देखिये इस कार्यक्रम का विषय कितना उकसाने वाला है कि मुस्लिमों ने सेवाओं में घुसपैठ कर ली है और यह तथ्यों के बगैर ही संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं को संदेह के दायरे में ले आ देता है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और केएम जोसेफ की पीठ ने कहा कि याचिका ने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा पर महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए हैं। मुक्त भाषण और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार के साथ, न्यायालय को स्व-विनियमन के मानकों की स्थापना पर एक विचारशील बहस को बढ़ावा देने की आवश्यकता होगी। मुक्त भाषण के साथ, ऐसे अन्य संवैधानिक मूल्य हैं, जिन्हें संतुलित और संरक्षित करने की आवश्यकता है, जिसमें नागरिकों के हर वर्ग के लिए समानता और निष्पक्ष उपचार का मौलिक अधिकार शामिल है।

सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से कहा कि पत्रकारों की स्वतंत्रता सर्वोच्च है और प्रेस को नियंत्रित करना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक होगा। सुदर्शन टीवी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने पीठ से कहा कि चैनल इसे राष्ट्रहित में एक खोजी खबर मानता है। इस पर पीठ ने दीवान से कहा कि आपका मुवक्किल देश का अहित कर रहा है और यह स्वीकार नहीं कर रहा कि भारत विविधता भरी संस्कृति वाला देश है। आपके मुवक्किल को अपनी आजादी के अधिकार का इस्तेमाल सावधानी से करना चाहिए।

पीठ ने कहा कि देश के सर्वोच्च न्यायालय के रूप में हम आपको यह कहने की अनुमति नहीं दे सकते कि मुस्लिम नागरिक सेवाओं में घुसपैठ कर रहे हैं। आप यह नहीं कह सकते कि पत्रकारों को यह करने की पूर्ण स्वतंत्रता है। इस दौरान जस्टिस जोसेफ ने कहा, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ समस्या टीआरपी के बारे में है और इस तरह अधिक से अधिक सनसनीखेज हो जाता है तो कई चीजें अधिकार के रूप में सामने आती हैं।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि केंद्र की 9 सितंबर की अधिसूचना के बाद उसी थीम पर आधारित कार्यक्रम के एपिसोड प्रसारित किए गए हैं और 5 एपिसोड बचे हुए हैं।याचिकाकर्ताओं ने कार्यक्रम की सामग्री यूपीएससी में आतंक या जिहाद को मुसलमानों के खिलाफ हेट स्पीच करार दिया है। पूर्व प्रसारण प्रतिबंध के चरण से स्थिति बदल गई है। याचिकाकर्ता यह कहते हैं कि कार्यक्रम से फर्जी खबरें और कार्यक्रम के स्क्रीनशॉट दिखाए गए हैं और टेप में कहा गया है कि यह कार्यक्रम सिविल सेवा में घुसपैठ की साजिश बताता है।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि यह तर्क दिया गया है कि यह कार्यक्रम देश में घृणास्पद भाषण का केंद्र बिंदु बन गया है। उन्‍होंने कहा, ‘लोग शायद आज अखबार नहीं पढ़ते, लेकिन टीवी देखते हैं। फिर स्थानीय भाषाओं में स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं की पहुंच मुख्यधारा के अंग्रेजी अखबारों से ज्यादा है। टीवी देखने का एक मनोरंजन मूल्य है जबकि समाचार पत्र के पास कोई नहीं है। इसलिए हम मानक रखना चाहते हैं। इस दौरान जस्टिस जोसेफ ने कहा कि प्रोग्राम कोड के नियम 6 में कहा गया है कि केबल टीवी कार्यक्रम कुछ भी ऐसा नहीं दिखा सकते हैं जो किसी विशेष धर्म या समुदाय को लक्षित करता है।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की शक्ति बहुत बड़ी है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विशेष समुदायों या समूहों को लक्षित करके केंद्र बिंदु बन सकता है । इससे प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया जा सकता है, छवि धूमिल की जा सकती है। इसे कैसे नियंत्रित करें? क्या राज्य ऐसा नहीं कर सकते? क्या ऐसे मानक नहीं होने चाहिए जिन्हें मीडिया स्वयं लागू करे और जो अनुच्छेद 19 (1) (ए) यानी बोलने की आजादी को बरकरार रखे।

इससे पहले टीवी के लिए श्याम  दीवान ने कहा, ‘मैं इसे प्रेस की स्वतंत्रता के रूप में दृढ़ता से विरोध करूंगा। कोई पूर्व प्रसारण प्रतिबंध नहीं हो सकता है। हमारे पहले से ही चार प्रसारण हो चुके हैं इसलिए हम विषय को जानते हैं। विदेशों से धन पर एक स्पष्ट लिंक है। इस पर जस्टिस  चंद्रचूड़ ने कहा कि हम चिंतित हैं कि जब आप कहते हैं कि विद्यार्थी जो जामिया मिलिया का हिस्सा हैं।

सिविल सेवाओं में घुसपैठ करने के लिए एक समूह का हिस्सा हैं तो हम उसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। देश के उच्चतम न्यायालय के रूप में हम आपको यह कहने की अनुमति नहीं दे सकते कि मुस्लिम नागरिक सेवाओं में घुसपैठ कर रहे हैं। आप यह नहीं कह सकते कि पत्रकारों को यह करने की पूर्ण स्वतंत्रता है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि यह बहुत ही कपटपूर्ण है। एक विशेष समुदाय के नागरिक जो एक ही परीक्षा से गुजरते हैं और एक ही पैनल को साक्षात्कार देते हैं। यह यूपीएससी परीक्षा पर भी सवाल उठाता है। हम इन मुद्दों से कैसे निपटते हैं? क्या इसे बर्दाश्त किया जा सकता है?

इसके पहले 28 अगस्त को उच्चतम न्यायालय ने शो का प्रसारण रोकने के लिए पूर्व-प्रसारण निषेधाज्ञा जारी करने से इनकार कर दिया था। उच्चतम न्यायालय  ने यूनियन ऑफ इंडिया, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन और सुदर्शन न्यूज को नोटिस जारी किए थे।

इससे पहले, दिल्ली हाईकोर्ट ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों और पूर्व छात्रों के एक समूह द्वारा दायर याचिका का निपटारा किया था, सूचना और प्रसारण मंत्रालय को कार्यक्रम कोड के कथित उल्लंघन के लिए चैनल को भेजे गए नोटिस पर निर्णय लेने के लिए कहा था। शो के टेलीकास्ट पर मंत्रालय के अंतिम निर्णय तक रोक थी। अपने आदेश में हाईकोर्ट के जस्टिस नवीन चावला एक प्रथम दृष्ट्या अवलोकन किया था कि शो के ट्रेलर ने प्रोग्राम कोड का उल्लंघन किया है। 10 सितंबर को केंद्र ने यह देखने के बाद कि सामग्री को प्रोग्राम कोड का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, शो के प्रसारण की अनुमति दी थी। इसके बाद 11 सितंबर को इस शो का प्रसारण हुआ।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

This post was last modified on September 15, 2020 7:26 pm

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