“देश में क्या हो रहा है? कानून है भी या नहीं? अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अफसर लगाएंगे स्टे?”

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नई दिल्ली। इस देश में क्या हो रहा है? कानून क्या है? सुप्रीम कोर्ट के आदेश का क्या सम्मान है? हम लोगों ने पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया था उसके बावजूद एक पैसे भी जमा नहीं हुए। और उस पर आपके एक डेस्क अफसर ने स्टे पारित कर दिया है। ये बातें कल सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अरुण मिश्रा ने टेलीकाम कंपनियों के एक मामले की सुनवाई करते हुए कही। दरअसल निजी टेलीकाम कंपनियों के ऊपर सरकार के डीओटी (डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकाम) का तकरीबन 1.47 लाख करोड़ रुपये बकाया है। और सु्प्रीम कोर्ट ने उसे तत्काल जमा करने का आदेश दिया था।

लेकिन टेलीकाम डिपार्टमेंट के एक अफसर ने अपनी तरफ से पत्र लिखकर दी गयी समय सीमा के भीतर न जमा करने पर भी कार्रवाई नहीं होने का टेलीकाम कंपनियों को भरोसा दे दिया। जस्टिस मिश्रा ने कहा कि उन्हें पता है कि ऐसा क्यों हो रहा है। यह पैसे की ताकत है जिसके सामने नौकरशाही ने समर्पण कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश 24 अक्तूबर, 2019 को दिया था। उसके बाद से निजी टेलीकाम कंपनियों ने एक भी पैसा जमा नहीं किया।

जस्टिस मिश्रा ने कहा कि जिस तरह से हर कोई व्यवहार कर रहा है उससे लगता है कि देश में कानून नाम की चीज नहीं रह गयी है। बेंच में जस्टिस मिश्रा के अलावा दूसरे दो जज जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस एमआर शाह शामिल थे। इस मसले पर कोर्ट ने कंपनियों की तरफ से किसी भी तरह की सुनवाई करने से मना कर दिया। कोर्ट इस मामले को लेकर खासा नाराज था। जस्टिस मिश्रा का कहना था कि कोर्ट के आदेश पर किसी विभाग का कोई अफसर कैसे रोक लगा सकता है। गौरतलब है कि टेलीकाम डिपार्टमेंट के डेस्क अफसर ने कंपनियों को पत्र लिखकर कह दिया था कि अगले आदेशों तक कंपनियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।

जस्टिस मिश्रा ने सालीसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि ‘आप के डेस्क अफसर को हमारे आदेश को रोकने की इतनी जल्दबाजी थी? आपके डेस्क अफसर इस तरह से व्यवहार नहीं कर सकते हैं। वे सु्प्रीम कोर्ट के आदेश को खारिज नहीं कर सकते हैं। यह पैसे की ताकत का नतीजा नहीं है तो और क्या है’? उन्होंने बिल्कुल नाराजगी भरे लफ्जों में कहा कि अगर अगले 30 मिनट में संबंधित आदेश वापस नहीं लिया जाता है। तो मैं इस बात को सुनिश्चित करूंगा कि वह अफसर जेल की सींखचों के पीछे हो।

डीओटी के अलावा इस मामले से जुड़ी कंपनियों को भी बेंच ने जमकर तलाड़ लगाई। 40 मिनट की इस सुनवाई में जस्टिस मिश्रा ने इन कंपनियों के खिलाफ अवमानना का केस चलाने की चेतावनी दी। उन्होंने सभी कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी करने का आदेश दिया जिसमें पूछा गया है कि उनके खिलाफ क्यों नहीं कार्रवाई शुरू की जाए।

उसके बाद तीनों जजों की बेंच ने कंपनियों को 17 मार्च तक अपने सभी बकाए जमा करने का आदेश दिया। ऐसा न कर पाने पर अगली सुनवाई में इन कंपनियों के प्रबंध निदेशकों को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में मौजूद रहने का आदेश दिया। अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केस बेहद परेशान करने वाली तस्वीर पेश कर रहा है। जहां कंपनियों ने इस कोर्ट द्वारा दिए गए आदेशों का उल्लंघन किया है। पुनर्विचार याचिका के खारिज होने के बाद भी उन्होंने कोई रकम जमा नहीं की। जिस तरह से चीजें घटित हो रही हैं उसमें यह बात दावे के साथ कही जा सकती है कि कंपनियों और उनके संचालकों के भीतर कोर्ट के आदेशों को लेकर रत्ती भर सम्मान नहीं है।

इस मामले में जब सालीसीटर जनरल मेहता ने बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की और कहा कि डीओटी को इस मामले में सफाई देने के लिए कहा जाना चाहिए तो कोर्ट ने उसे सिरे से खारिज कर दिया। उसका कहना था कि “उनको जो करना था उन्होंने कर दिया है। अब हमें उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई करनी है। मैं इस मामले में किसी को भी नहीं छोड़ूंगा। इसको बेहद हल्के तरीके से लिया गया है”। इस पर जब तुषार मेहता ने हस्तक्षेप करने की कोशिश की तो जस्टिस मिश्रा और भड़क गए उन्होंने कहा कि ‘किसी को नहीं छोड़ेंगे हम….किसी को नहीं छोड़ेंगे इसमें’।

सुप्रीम कोर्टे के आदेश के बाद 23 जनवरी को डीओटी के लाइसेंस फाइनेंस पालिसी विंग के एक निदेशक के हस्ताक्षर से जारी आदेश में कहा गया था कि अगले आदेश तक टेलीकाम कंपनियों के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। लेकिन कल के सु्प्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद ही डीओटी ने उसे वापस ले लिया। साथ ही यह आदेश दिया कि 24 अक्तूबर 2019 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का संज्ञान लेते हुए तत्काल जरूरी कार्यवाही की जानी चाहिए।

टेलीकाम कंपनियों पर डीओटी का कुल बकाया 1.47 लाख करोड़ रुपये है। जिसमें वोडाफोन आइडिया पर 53000 करोड़, भारती एयरटेल पर 35 हजार करोड़ और टाटा टेलीसर्विसेज पर जिसे भारती को बेच दिया गया है, 14000 करोड़ का बकाया है।

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