Monday, October 3, 2022

टीवी चैनलों पर जारी हेट स्पीच को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पूछा- सरकार क्यों नहीं कर रही है कार्रवाई

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सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच से भरे टॉक शो और रिपोर्ट टेलीकास्ट करने पर टीवी चैनलों को जमकर फटकार लगाई है। हेट स्पीच से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस ऋषिकेश रॉय की पीठ ने  बुधवार को कहा कि यह एंकर की जिम्मेदारी है कि वह किसी को नफरत भरी भाषा बोलने से रोके। पीठ ने पूछा कि इस मामले में सरकार मूकदर्शक क्यों बनी हुई है, क्या यह एक मामूली मुद्दा है?पीठ ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जरूरी है, लेकिन टीवी पर अभद्र भाषा बोलने की आजादी नहीं दी जा सकती है। ऐसा करने वाले यूनाइटेड किंगडम के एक टीवी चैनल पर भारी जुर्माना लगाया गया था। पीठ ने केंद्र को निर्देश दिया है कि वह ये स्पष्ट करे कि क्या वह हेट स्पीच पर अंकुश लगाने के लिए विधि आयोग की सिफारिशों पर कार्रवाई करने का इरादा रखती है।

पीठ ने कहा कि मेनस्ट्रीम मीडिया या सोशल मीडिया चैनल बिना रेगुलेशन के हैं। यह देखना एंकर्स की जिम्मेदारी है कि कहीं भी हेट स्पीच न हो। प्रेस की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है। उन्हें अमेरिका जितनी आजादी नहीं है, लेकिन यह पता होना चाहिए कि सीमा रेखा कहां खींचनी है।

पीठ ने बुधवार को मौखिक रूप से मीडिया में हेट स्पीच के अनियंत्रित होने पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए तल्ख़ टिप्पणी की कि हमारा देश किस ओर जा रहा है। हेट स्पीच के खिलाफ एक मजबूत नियामक तंत्र की आवश्यकता पर जोर देते हुए, कोर्ट ने भारत सरकार से पूछा कि जब यह सब हो रहा है तो यह एक मूक गवाह के रूप में क्यों खड़ी है। पिछली सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने कहा था कि हेट स्पीच से संबंधित देश में कोई स्पष्ट कानून नहीं है ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में आदेश पारित करना चाहिए।

जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस हृषिकेश रॉय की पीठ 11 रिट याचिकाओं के एक बैच की सुनवाई कर रही थी, जिसमें हेट स्पीच को नियंत्रित करने के निर्देश देने की मांग की गई है। बैच में सुदर्शन न्यूज टीवी द्वारा प्रसारित यूपीएससी जिहाद शो के खिलाफ दायर याचिकाएं, धर्म संसद की बैठकों में दिए गए भाषण, और सोशल मीडिया संदेशों के नियमन की मांग करने वाली याचिकाएं हैं, जो कोविड महामारी को सांप्रदायिक बना रहे थे।

जस्टिस जोसेफ ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि एंकर का रोल बेहद महत्वपूर्ण है। हेट स्पीच या तो मेन स्ट्रीम टीवी के जरिये या फिर सोशल मीडिया के जरिये आ रहा है। मेन स्ट्रीम मीडिया में कम से कम एंकर का रोल अहम है। जैसे ही कोई हेट स्पीच देने की कोशिश करता है एंकर की ड्यूटी है कि उसे तुरंत रोक दे।

हेट स्पीच को लेकर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया पर सवाल उठाए हैं। पीठ ने कहा कि सबसे ज्यादा हेट स्पीच मीडिया और सोशल मीडिया पर है, हमारा देश किधर जा रहा है? टीवी एंकरों की बड़ी जिम्मेदारी है। टीवी एंकर गेस्ट को टाइम तक नहीं देते, ऐसे माहौल में केंद्र चुप क्यों है ?  एक सख्त नियामक तंत्र स्थापित करने की जरूरत है। पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार से दो सप्‍ताह में जवाब मांगा है। मामले में अब 23 नवंबर को सुनवाई होगी।

जस्टिस जोसेफ ने कहा कि राजनीतिक दल इससे पूंजी बनाते हैं और टीवी चैनल एक मंच के रूप में काम कर रहे हैं। सबसे ज्यादा नफरत भरे भाषण टीवी, सोशल मीडिया पर हो रहे हैं। दुर्भाग्य से हमारे पास टीवी के संबंध में कोई नियामक तंत्र नहीं है। इंग्लैंड में एक टीवी चैनल पर भारी जुर्माना लगाया गया था। दुर्भाग्य से वह प्रणाली भारत में नहीं है। एंकरों को यह बताना चाहिए कि अगर आप गलत करते हैं तो परिणाम भुगतने होंगे। समस्या तब होती है जब आप किसी कार्यक्रम के दौरान किसी व्यक्ति को कुचलते हैं। जब आप टीवी चालू करते हैं तो हमें यही मिलता है। हम इससे जुड़ जाते हैं। हर कोई इस गणतंत्र का है। यह राजनेता हैं जो लाभ उठा रहे हैं। लोकतंत्र के स्तंभ स्वतंत्र माने जाते हैं। टीवी चैनलों को इन सबका शिकार नहीं होना चाहिए।

जस्टिस जोसेफ ने कहा कि आप मेहमानों को बुलाते हैं और उनकी आलोचना करते हैं। हम किसी खास एंकर के नहीं बल्कि आम चलन के खिलाफ हैं, एक सिस्टम होना चाहिए। पैनल डिस्कशन और डिबेट्स, इंटरव्यू को देखें। अगर एंकर को समय का एक बड़ा हिस्सा लेना है तो कुछ तरीका निर्धारित करें। सवाल लंबे होते हैं जो व्यक्ति उत्तर देता है उसे समय नहीं दिया जाता। गेस्ट को शायद ही कोई समय मिलता है। केंद्र चुप क्यों है आगे क्यों नहीं आता? राज्य को एक संस्था के रूप में जीवित रहना चाहिए। केंद्र को पहल करनी चाहिए। एक सख्त नियामक तंत्र स्थापित करें।

इससे पहले चुनाव के दौरान हेट स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग ने  हलफनामा दाखिल किया था और कहा था कि उम्मीदवारों को तब तक प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता जब तक केंद्र “हेट स्पीच” या “घृणा फैलाने” को परिभाषित नहीं करता। आयोग केवल आईपीसी या जनप्रतिनिधित्व कानून का उपयोग करता है। उसके पास किसी राजनीतिक दल की मान्यता वापस लेने या उसके सदस्यों को अयोग्य घोषित करने का कानूनी अधिकार नहीं है। अगर कोई पार्टी या उसके सदस्य हेट स्पीच में लिप्त होते हैं तो उसके पास डी रजिस्टर करने की शक्ति नहीं है।

चुनाव आयोग ने केंद्र के पाले में गेंद डाल दी थी। चुनाव आयोग ने कहा था कि हेट स्पीच और अफवाह फैलाने वाले किसी विशिष्ट कानून के अभाव में, चुनाव आयोग आईपीसी के विभिन्न प्रावधानों को लागू करता है जैसे कि धारा 153 ए- समुदायों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम. समय-समय पर एडवाइजरी भी जारी कर पार्टियों से प्रथाओं से दूर रहने की अपील करते हैं। यह चुनाव आचार संहिता का भी हिस्सा है।

आयोग ने अपने इस हलफनामे में कहा है कि हेट स्पीच को लेकर स्पष्ट कानून नहीं है। और मौजूदा दौर में हेट स्पीच के जरिए नफरत फैलाने वाले भड़काऊ भाषण या बयान देने वालों पर समुचित कार्रवाई करने में मौजूदा कानून सक्षम नहीं हैं।

हेट स्पीच और अफवाहों को रोकने के लिए कोई विशिष्ट और निर्धारित कानून नहीं है। सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में समुचित आदेश देना चाहिए क्योंकि, विधि आयोग ने पिछले साल यानी 2017 के मार्च में सौंपी 267वीं रिपोर्ट में यह सुझाव भी दिया है कि आपराधिक कानून में हेट स्पीच को लेकर जरूरी संशोधन किए जाने चाहिए।

इससे पहले जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच मामले में केन्द्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया था। कोर्ट ने दोनों से तीन हफ्ते के भीतर जवाब देने को कहा। भड़काऊ और घृणित भाषण (हेट स्पीच) को लेकर भाजपा  नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने याचिका दायर की है, इसमें कथित घृणित और भड़काऊ भाषण पर विधि आयोग की 267वीं रिपोर्ट को तुरंत लागू करने का निर्देश जारी करने का कोर्ट से अनुरोध किया गया है।

दरअसल, साल 2017 में  विधि आयोग ने घृणित एवं भड़काऊ भाषण को परिभाषित किया था। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और आपराधिक प्रक्रिया संहिता में धारा 153 सी और 505 ए को जोड़ने का सुझाव दिया था।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि हेट स्पीच से राजनेताओं को सबसे ज्यादा फायदा होता है और टेलीविजन चैनल उन्हें इसके लिए मंच देते हैं। सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े ने कहा कि चैनल और राजनेता ऐसी हेट स्पीच से ही चलते हैं। चैनलों को पैसा मिलता है, इसलिए वे दस लोगों को बहस में रखते हैं।

देश में हेटस्पीच से निपटने के लिए 7 तरह के कानून इस्तेमाल किया जाते हैं, लेकिन इनमें से किसी में भी हेटस्पीच को परिभाषित नहीं किया गया है। इसीलिए, सोशल मीडिया प्लेटफार्म अपने यूजर्स को मनमानी भाषा बोलने से नहीं रोक रहे हैं। ये हैं मौजूदा प्रावधान

1. भारतीय दंड संहिता

धारा 124ए (राजद्रोह): इस पर रोक लगाई जा चुकी है।

धारा 153ए: धर्म, नस्ल आदि के आधार पर वैमनस्य।

धारा 153बी: राष्ट्रीय एकता के खिलाफ बयान।

295ए और 298: धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना।

धारा 505 (1) और (2) अफवाह या नफरत भड़काना।

2. जन प्रतिनिधित्व कानून

धार्मिक, जातीय या भाषायी आधार पर चुनावी दुराचरण।

3. नागरिक अधिकार अधिनियम, 1955

4. धार्मिक संस्था कानून

5. केबल टेलीविजन नेटवर्क नियमन कानून

6. सिनेमैटोग्राफी कानून

7. आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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