Subscribe for notification

देश की सर्वोच्च अदालत का धनुष योग

कल न्यायपालिका से जुड़े एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन के दौरान सुप्रीम कोर्ट में नंबर तीन के जज जस्टिस अरुण मिश्रा ने पीएम मोदी की तारीफ में जो कसीदे पढ़े हैं उसको सुनकर कोई भी लोकतंत्र पसंद और जनता के हित में सोचने वाला शख्स यही कहा होगा कि ऐसा सुनने से पहले धरती क्यों नहीं फटी वह उसमें समा गया होता। जस्टिस मिश्रा के इस धनुषी रूख पर चारण भाट भी शर्मा गए होंगे। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं और ग्लोबल स्तर की सोच के साथ स्थानीय स्तर पर उसे लागू करने का हुनर रखते हैं।

एक ऐसे मौके पर जब न केवल पूरे देश बल्कि दुनिया में भारतीय लोकतंत्र को लेकर तमाम आशंकाएं जाहिर की जा रही हैं। सत्ता की निरंकुशता आए दिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बन रही हैं। संविधान को सत्ता के पैरों तले कुचला जा रहा है। तब लोग उसकी रक्षा की जिम्मेदारी लेने वाली आशा की एकमात्र केंद्र न्यायपालिका की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहे थे।

लेकिन न्यायपालिका के पक्ष से आवश्यक हस्तक्षेप न होने पर लोग अचरज में भी थे। अब जबकि उसने अपनी असलियत खुद अपने मुंह से बयान कर दी है। फिर उसके आगे कहने-सुनने के लिए कुछ बचता भी नहीं है। जस्टिस मिश्रा का नकाब पहली बार नहीं उतरा है। इनको जाना ही सत्ता के एजेंट के तौर पर जाता है। जजगिरी इनकी खानदानी विरासत है। पिता हरगोविंद मिश्रा मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के जज थे। और वह इस विरासत को आगे बढ़ाने से भी नहीं चूके हैं। ग्वालियर के रहने वाले इन मी लॉर्ड ने अभी अपने भाई विशाल मिश्र को भी हाईकोर्ट का जज बनवा दिया है। दिलचस्प बात यह है कि जिस कॉलेजियम ने उनके भाई के जज बनने का प्रस्ताव पारित किया है वह खुद उसके सदस्य थे। जबकि ऐसा आम तौर पर नहीं होना चाहिए।

बीजेपी नेताओं के साथ इनके नाभि-नाल के रिश्ते हैं। यह बात विवादों के इस राजा के बारे में किसी से छुपी नहीं है। अक्सर इन्हें बीजेपी नेताओं के परिवारों की शादियों और या फिर किसी दूसरे आयोजनों में देखा जा सकता है। लोया मामले की सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट दुश्यंत दवे ने उनके इन छुपे रिश्तों की खुली बयानी की थी। सुप्रीम कोर्ट में जजों की हुई ऐतिहासिक प्रेस कांफ्रेंस से इनका सीधा रिश्ता है। उस समय जजों ने एकमात्र जो सवाल उठाया था वह यह था कि तत्कालीन चीफ जस्टिस याचिकाओं को पक्षपातपूर्ण तरीके से बेंचों को आवंटित कर रहे हैं।

दरअसल जिन मामलों में चीफ जस्टिस अपने या फिर सरकार के हितों के मुताबिक फैसला चाहते थे उन्हें तत्कालीन समय में 10वें नंबर के इस जज के पास भेज दिया जाता था। दिलचस्प बात यह है ऐसे केसेज ज्यादातर हाई प्रोफाइल हुआ करते थे। जिनकी आमतौर पर सुनवाई का हक न्यायालय के वरिष्ठ जजों का बनता था। जजेज इसी बात को लेकर नाराज थे। और जब जज लोया का मामला भी इन्हीं के पास भेजा गया तब पानी सिर से ऊपर चला गया। उसका नतीजा विद्रोह के तौर पर सामने आया जो प्रेस कांफ्रेंस में दिखा।

सत्ता से इनका रिश्ता किस स्तर तक घनिष्ठ है यह एडवोकेट दुश्यंत दवे के एक दूसरे आरोप में भी दिखा जब उन्होंने बताया कि उद्योगपति अडानी से जुड़े कई मामलों को गर्मी की छुट्टी के दौरान की उस बेंच से निपटवाया गया जिसकी यह अगुआई कर रहे थे। अब यह किसी को नहीं पूछना चाहिए कि अडानी के कंधे पर किसका हाथ है। और किस सत्ता की गर्भ में पलकर वह पल्लवित और पुष्पित हुए हैं।

और इसके पहले जब चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया तो उसको रफा-दफा करने के लिए भी इन्हें ही याद किया गया। चीफ जस्टिस बोबडे के बाद दूसरे नंबर के जज यही थे। और मामले में जो फैसला आया वह अद्भुत था। चीफ जस्टिस को भी बरी कर दिया गया और आरोप लगाने वाली महिला को भी पाक-साफ बता दिया गया। और जस्टिस गोगोई साहब के रिटायर होने के बाद अब उस महिला को फिर से सुप्रीम कोर्ट में बहाल कर दिया गया। यह पूरी कहानी उस फैसले की कलई खोल देती है जिसको सुनाने वाली बेंच के यह सदस्य थे।

सत्ता के पक्ष में अपनी सरपरस्ती दिखाने के लिए इन जनाब ने निर्लज्जता की सारी सीमाएं तोड़ दीं। भूमि अधिग्रहण का जब मामला सामने आया तो पता चला कि रिव्यू याचिका भी इन्हीं जनाब के नेतृत्व में गठित संविधान पीठ को सौंप दिया गया है। जिसने इसके पहले उस पर फैसला सुनाया था। पूरे देश में और खासकर सोशल मीडिया पर बवाल मचने के बावजूद वह इस केस से अलग होने के लिए तैयार नहीं हुए।

एक समय ऐसा आ गया कि जब सरकार को किसी मामले में राहत देने की बात होती थी तो चीफ जस्टिस उसे इन्हीं के हवाले कर दिया करते थे। और इस तरह से एक सरकारी बेंच कहें या फिर उनका कोर्ट रूम सुप्रीम कोर्ट में पीएमओ के एक्सटेंशन दफ्तर के तौर पर जाना जाने लगा था।

धर्म के काम में जस्टिस मिश्रा की विशेष रुचि होती है। ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर के आस-पास कुछ मंदिरों को ढहाए जाने के मामले में उन्होंने सरकार पर तीखी टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि धर्मों के कर्मकांड और परंपराओं को नहीं जानने वाली सरकारों को उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

इसी तरह से केरल के एक चर्च का मामला सामने आया था जिसमें हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले से कुछ अलग बात कर दी थी। इस पर उन्होंने भरी कोर्ट में कहा कि यह बेहद आपत्तिजनक आदेश है। और किस जज ने दिया है उसका नाम कोर्टरूम में जोर-जोर से लिया जाना चाहिए जिससे सभी को पता चल सके।

बहरहाल अकेले मिश्रा जी नहीं हैं इन सबके लिए जिम्मेदार। इनके ऊपर मौजूद जनाब तो बिल्कुल सत्ता की ही गोद में बैठ गए हैं। मौजूदा सत्ता और उसके नेतृत्व के साथ रिश्तों की कहानियों में वह जस्टिस मिश्रा को भी मात देते दिखते हैं। लेकिन उस पर फिर कभी।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

This post was last modified on February 23, 2020 9:43 am

Leave a Comment
Disqus Comments Loading...
Share

Recent Posts

सुदर्शन टीवी मामले में केंद्र को होना पड़ा शर्मिंदा, सुप्रीम कोर्ट के सामने मानी अपनी गलती

जब उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से जवाब तलब किया कि सुदर्शन टीवी पर विवादित…

2 hours ago

राजा मेहदी अली खां की जयंती: मजाहिया शायर, जिसने रूमानी नगमे लिखे

राजा मेहदी अली खान के नाम और काम से जो लोग वाकिफ नहीं हैं, खास…

3 hours ago

संसद परिसर में विपक्षी सांसदों ने निकाला मार्च, शाम को राष्ट्रपति से होगी मुलाकात

नई दिल्ली। किसान मुखालिफ विधेयकों को जिस तरह से लोकतंत्र की हत्या कर पास कराया…

5 hours ago

पाटलिपुत्र की जंग: संयोग नहीं, प्रयोग है ओवैसी के ‘एम’ और देवेन्द्र प्रसाद यादव के ‘वाई’ का गठजोड़

यह संयोग नहीं, प्रयोग है कि बिहार विधानसभा के आगामी चुनावों के लिये असदुद्दीन ओवैसी…

6 hours ago

ऐतिहासिक होगा 25 सितम्बर का किसानों का बन्द व चक्का जाम

देश की खेती-किसानी व खाद्य सुरक्षा को कारपोरेट का गुलाम बनाने संबंधी तीन कृषि बिलों…

7 hours ago